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जब सुरैया ने देव आनंद को फिल्म सेट से बाहर निकलवाया

सुरैया और देव आनंद के करियर व निजी जीवन में प्रताप ए राणा (राणा प्रताप सिंह) का क्या योगदान है? राणा प्रताप सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज से जुड़े रहे।

सुरैया और देव आनंद के करियर व निजी जीवन में प्रताप ए राणा (राणा प्रताप सिंह) का क्या योगदान है? राणा प्रताप सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज से जुड़े रहे। बाद में निर्देशक मोहन सिन्हा के सहायक बने और उनकी बेटी से शादी की। इस शादी से जो संतान हुई, वह अभिनेत्री विद्या सिन्हा थीं। लेखक-निर्माता राणा ने अपने जीवन में कुल तीन फिल्में बनाईं। तीनों में सुरैया हीरोइन थीं। सुरैया के जीवन में इन तीन फिल्मों का बहुत महत्त्व था। तीन में से पहली फिल्म 1947 की ‘परवाना’ केएल सहगल की आखिरी फिल्म थी। बचपन से सहगल की प्रशंसक रही सुरैया की सहगल के साथ काम करने की इच्छा इस फिल्म से पूरी हुई थी। 1948 की ‘विद्या’ के सेट पर देव-सुरैया का प्यार फला फूला। 1949 की ‘जीत’ के सेट पर देव ने सुरैया को तीन हजार रुपए की हीरे की अंगूठी दी। इस निशानी को सुरैया को समुंदर में फेंकना पड़ा क्योंकि उनकी नानी बादशाह बेगम को देव-सुरैया का साथ पसंद नहीं था। कारण देव हिंदू थे और सुरैया मुसलमान।

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1947 में विभाजन के बाद हुए कौमी दंगों ने हिंदू-मुसलमान के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया था। ‘विद्या’ के सेट पर सुरैया शूटिंग कर रही थीं और कोने में बैठा एक खूबसूरत युवक उन्हें घूरे जा रहा था। सुरैया उसके घूरने से असहज थीं। आखिर उन्होंने निर्देशक गिरीश त्रिवेदी से कहा कि इस युवक को तुरंत सेट से बाहर निकाला जाए। त्रिवेदी ने उस युवक को बुलाया और सुरैया से कहा,‘यह हैं इस फिल्म और आपके नए हीरो देव आनंद।’ सुरैया ने कहा, ‘ठीक है… आज तो इनका काम है नहीं। इसलिए आप इन्हें सेट से बाहर निकालिए।’ देव ने मुस्कराते हुए कहा,‘अभी से मोहतरमा का यह हाल है, तो आगे क्या होगा।’ देव के यह कहते ही सुरैया मुस्करा दीं। यह दोनों की पहली मुलाकात थी।

फिर विद्या के ही गाने ‘किनारे किनारे चले जाएंगे…’ के दौरान वह नाव उलट गई जिसमें देव-सुरैया बैठे थे। तैरना न जानने वाली सुरैया को देव ने बचाया जिसके बाद देव सुरैया के चांद बन गए और सुरैया उनकी चांदनी। मगर सुरैया की नानी ने दोनों के मेलजोल पर खूब कड़े पहरे लगवाए। कैमरामैन लारका दिवेचा तेज गति से कार चला कर देव-सुरैया की मुलाकात करवाते थे। देव-सुरैया की आखिरी मुलाकात करवाई थी सुरैया की मां मुमताज बेगम ने, जो चाहती थीं कि देव-सुरैया की शादी हो जाए। 1951 के बाद देव-सुरैया अलग हो गए।
सुरैया ने देव को टूट कर चाहा था इसलिए अलग होने के बाद उन्होंने जीवन भर शादी नहीं की। मगर देव ने 1954 में एक पंजाबी क्रिश्चियन तहसीलदार की बेटी कल्पना कार्तिक (मोना सिंह) से शादी कर ली, जिनके प्रति देव के बड़े भाई चेतन आनंद आकर्षित हो चुके थे। मोना को कल्पना नाम चेतन आनंद ने ही दिया था।

15 जून,1929 – 31 जनवरी, 2004

अभिनेता धर्मेंद्र ने सुरैया की ‘दिल्लगी’ 40 बार देखी थी, वह भी मीलों पैदल चलकर। मोरारजी देसाई के बेटे की निजी पार्टी के निमंत्रण को सुरैया ने कभी विनम्रता से इनकार कर दिया था। सुरैया का एक प्रशंसक उनके घर बारात लेकर आ गया था। 40 और 50 के दशक की मशहूर अभिनेत्री सुरैया पहली मलिका-ए-तरन्नुम के साथ ही फिल्मजगत में सबसे ज्यादा मेहनताना लेने वाली हीरोइन थीं। सुरैया ने ‘अनमोल घड़ी’, ‘मिर्जा गालिब’, ‘परवाना’, ‘नाटक’, ‘विद्या’, ‘जीत’, ‘दिल्लगी’ जैसी कई हिट फिल्मों में काम किया।

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