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हमारी याद आएगीः नीली आंखों की चाहत में

कपूर परिवार की दूसरी पीढ़ी फिल्मों में आई तब स्टार सिस्टम नहीं था, स्टार संस का सिस्टम भी नहीं था। स्टूडियो सिस्टम था और स्टार उनमें मासिक तनख्वाह पर काम करते थे।
शशि कपूर की यादें

18 मार्च, 1938- 4 दिसंबर, 2017
पृथ्वीराज कपूर ने अपनी पत्नी रामशरणी देवी से टूट कर प्यार किया। दोनों के बीच इतना गहरा जुड़ाव था कि वे ज्यादा दिन एक दूसरे से अलग नहीं रह सकते थे। तो हुआ यह कि 1972 में 29 मई को पृथ्वीराज कपूर का निधन हुआ और इसके 16वें दिन, 14 जून को, रामशरणी देवी ने दुनिया छोड़ दी। पृथ्वीराज कपूर के पांच बेटे और एक बेटी यानी छह संतानें हुईं। इनमें दो बेटों नहीं रहे। बचे तीन बेटों-राज कपूर, शम्मी कपूर और शशि कपूर- ने फिल्मों में काम किया। शशि कपूर के निधन से कपूर परिवार की फिल्मों में सक्रिय रही दूसरी पीढ़ी का अस्तित्व खत्म हो गया।

कपूर परिवार की दूसरी पीढ़ी फिल्मों में आई तब स्टार सिस्टम नहीं था, स्टार संस का सिस्टम भी नहीं था। स्टूडियो सिस्टम था और स्टार उनमें मासिक तनख्वाह पर काम करते थे। समय के साथ पौराणिक, अर्धऐतिहासिक कहानियों से आगे बढ़कर मुख्यधारा का हिंदी सिनेमा प्रेम और संगीत के दो ट्रेकों पर फिट हो गया और फिल्मों की ज्यादातर कहानियां इसके इर्दगिर्द घूमने लगी। 1940 के बाद स्टूडियो सिस्टम टूटा और स्टार सिस्टम हावी होने लगा। इस स्टार सिस्टम में शशि कपूर ने व्यस्तता का ऐसा रेकॉर्ड बनाया था कि उनके बड़े भाई राज कपूर को ‘सत्यं शिवम सुंदरम’ के लिए शशि की तारीखें नहीं मिल सकीं। तब शोमैन को कहना पड़ा कि यह तो टैक्सी बन गया है, जो चाहे वो इसका मीटर डाउन कर बैठ जाता है।
अनियंत्रित स्टार सिस्टम का नतीजा बाद में यह हुआ था कि निर्माताओं को सितारों पर 12 फिल्मों का प्रतिबंध लगाना पड़ा था। एक समय में वे 12 से ज्यादा फिल्मों में काम नहीं कर सकते थे। इसके चलते शशि कपूर के हाथों से कई अच्छी फिल्में निकल गई थीं। समय के साथ राज कपूर फिल्मजगत में शोमैन बन चुके थे और प्रेम-संगीत के साथ भावनाओं के इस कारोबार की नब्ज पहचान चुके थे। राज कपूर ने अभिनेत्रियों से प्रेम किया, जिसके लिए पृथ्वीराज कपूर कभी नहीं जाने गए। उनसे एक कदम आगे बढ़ कर शम्मी कपूर और शशि कपूर ने अभिनेत्रियों से शादियां कीं। बहू बेटियों को सिनेमा से दूर रखने की जो कोशिश कपूर में अब तक चल रही थी, दूसरी पीढ़ी ने उसके खिलाफ सीधी-सीधी बगावत की। कपूर परिवार की तीसरी पीढ़ी ने इसे जारी रखा और चौथी पीढ़ी उससे भी एक कदम आगे बढ़ी।

‘मेरा नाम जोकर’ में सिमी ग्रेवाल और ऋषि कपूर के किरदारों के बीच (छोटी उम्र के लड़के का बड़ी उम्र की महिला के प्रति खिंचाव) जो आकर्षण था, कुछ वैसा ही शशि कपूर में देखा जा सकता है। इसे ही राज कपूर ने परदे पर अपनी तरह से ‘मेरा नाम जोकर’ में पेश किया था। छह साल के शशि कपूर का हीरोइन वनमाला के प्रति आकर्षण इसका नमूना है। शशि कपूर ने पापाजी यानी पृथ्वीराज कपूर की फिल्म ‘सिकंदर’ (1941) देखी और उसकी हीरोइन वनमाला की नीली आंखों की मोहब्बत में ऐसे गिरफ्तार हुए कि पापाजी के पास पहुंच गए और कहा कि वनमाला से शादी करेंगे। पापाजी खूब हंसे और शशि कपूर परिवार में हंसी का पात्र बन गए। इसे पृथ्वीराज कपूर ने नाटक में जगह दी, तो राज कपूर ने सिनेमा में।
वनमाला छोटी मोटी हस्ती नहीं थीं। उनके पिता मालवा के कलेक्टर और शिवपुरी के कमिश्नर रहे थे। ग्वालियर में राजसी शानो शौकत से उनका पालन पोषण हुआ था। पुणे में वह शिक्षिका थीं। पढ़े लिखे लोगों को फिल्मों में आना चाहिए, इस बात का ध्यान रखकर उन्हें फिल्मों में लाया गया था। वी शांताराम उन्हें अपनी सहायक निर्देशक बनाना चाहते थे मगर वनमाला ने इनकार कर दिया था। देश में जब राष्ट्रीय पुरस्कार देना शुरू हुआ तो पहला राष्ट्रीय पुरस्कार वनमाला की मराठी फिल्म ‘श्यामची आई’ को मिला था। इस फिल्म के बाद उन्होंने फिल्मी दुनिया छोड़ दी और वृंदावन जाकर आध्यात्मिक और सामाजिक जीवन जिया।
वनमाला की नीली आंखों के प्रति शशि कपूर के आकर्षंण की वजह भी थी। शशि कपूर के आदर्श नीली आंखों वाले उनके बड़े भाई राज कपूर थे। शशि कपूर की इसी चाहत का विस्तार था वनमाला के प्रति आकर्षण और इसी का अतिविस्तार था गोरे रंग और नीली आंखों वाली ब्रिटिश जेनिफर कैंडल, जिनसे शशि कपूर ने शादी की।

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