ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स की नई सीरीज ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ दर्शकों को काफी पसंद आ रही है। यह शो 1999 के कारगिल युद्ध में भारतीय वायुसेना के योगदान को दिखाता है। शो में स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा के बलिदान को भी दिखाया गया है, जिनका किरदार सिद्धार्थ ने निभाया। अजय आहूजा को अपने MiG-17 तब बाहर निकालना पड़ा, जब विमान को सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल ने निशाना बनाया था।

27 मई, 1999 को स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना के एयर ऑपरेशन ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ के तहत बटालिक सेक्टर में फोटो रिकॉनिसेंस मिशन का नेतृत्व कर रहे थे। इसी दौरान फ्लाइट लेफ्टिनेंट के. नचिकेता के MiG-27 में दुश्मन की फायरिंग के बाद तकनीकी खराबी आ गई।

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उन्हें दुश्मन के कब्जे वाले इलाके के पास विमान से इजेक्ट करना पड़ा। नचिकेता को आठ दिनों तक युद्धबंदी (POW) बनाकर रखा गया और बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया। शो में उनकी रिहाई की कुछ असली फुटेज दिखाई गई है, लेकिन उनकी पूरी कहानी विस्तार से नहीं बताई गई। ग्रुप कैप्टन के. नचिकेता राव (रिटायर्ड) ने 2017 में पहली बार युद्धबंदी के तौर पर अपने अनुभव के बारे में खुलकर बात की थी।

विमान के इंजन में आ गई थी खराबी

उन्होंने बताया कि 27 मई 1999 को उन्होंने श्रीनगर से तीन अन्य पायलटों के साथ उड़ान भरी थी। उस समय उनकी उम्र 26 साल थी। उन्होंने एनडीटीवी को बताया था कि उनका टारगेट ‘मुंथु ढालो’ नाम की जगह थी। मिशन के दौरान जब वह रॉकेट फायर कर रहे थे, तभी उनके विमान के इंजन में खराबी आ गई। मिग-27 सिंगल इंजन वाला विमान है, इसलिए नचिकेता को इंजन दोबारा चालू करने के लिए ‘रिलाइट प्रोसेस’ अपनाना था। लेकिन वह काफी ऊंचाई पर थे और उनके पास विमान को संभालने के लिए ऊंचाई कम पड़ने लगी।

जब उनका मिग-27 नीचे जाने लगा तो उनके पास इजेक्ट करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। उस समय वह करीब 15,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे थे। उन्होंने कहा था, “जब मैंने देखा कि पहाड़ मेरे विमान की तरफ तेजी से आ रहे हैं, तो मेरे पास इजेक्ट करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।” उन्होंने इसे एक ‘भाग्यशाली फैसला’ बताया, क्योंकि कुछ सेकंड बाद उन्होंने अपने विमान को पहाड़ी से टकराते देखा। अगर वह इजेक्ट नहीं करते तो उनकी जान भी जा सकती थी।

नचिकेता के लिए फाइटर जेट के कॉकपिट का आराम अब खत्म हो चुका था। वह एक बर्फीले इलाके में थे और उनके पास सिर्फ एक छोटी पिस्तौल और 16 गोलियां थीं। कुछ ही देर बाद उन्हें गोली चलने की आवाज सुनाई दी, लेकिन वह समझ नहीं पा रहे थे कि निशाना उन्हें बनाया जा रहा है या नहीं। इसके बाद उन्होंने पांच-छह सैनिकों को देखा। तब उन्हें समझ आया कि वह ऐसी जगह पहुंच चुके हैं, जहां भारतीय सेना की कोई पोस्ट नहीं थी।

उन्होंने अपनी पिस्तौल से फायर किया, लेकिन आठ गोलियां बहुत जल्दी खत्म हो गईं। इससे पहले कि वह दूसरी मैगजीन लोड कर पाते, उनमें से एक सैनिक उनके पास पहुंच गया। इसके बाद जो हुआ, वह किसी बुरे सपने से कम नहीं था। नचिकेता ने बताया कि वह उस सैनिक की ट्रिगर वाली उंगली को देख रहे थे कि वह गोली चलाएगा या नहीं। लेकिन तभी उस सैनिकों की टुकड़ी के प्रभारी आर्मी कैप्टन ने उसे रोक दिया।

मुंह में घुसा दी थी AK-47

नचिकेता ने बताया कि उसी आर्मी कैप्टन की वजह से उनकी जान बची। उन्होंने कहा था कि 25 साल बहुत लंबा समय होता है, लेकिन आज भी उस सैनिक का चेहरा और उसकी आंखें उन्हें साफ याद हैं। उस सैनिक ने AK-47 की बैरल मुंह में घुसा दी थी और वह सिर्फ उसकी ट्रिगर वाली उंगली को देख रहे थे कि वह गोली चलाएगा या नहीं।

बाद में स्वप्निल पांडे की किताब ‘विंग्स ऑफ वालोर’ में भी नचिकेता ने इस घटना को याद किया। उन्होंने कहा था कि उस दिन मौत उनके बहुत करीब दो बार आई थी। पहली बार जब उनका विमान क्रैश हुआ और उन्हें इजेक्ट करना पड़ा। दूसरी बार जब पाकिस्तानी सैनिक उन्हें गोली मारने वाले थे और वह अधिकारी ठीक समय पर वहां पहुंच गया।

24 घंटे बाद ले जाया गया रावलपिंडी

नचिकेता ने बताया कि अगर वह अधिकारी एक पल भी देर से आता या उन्हें मारने का आदेश दे देता तो वह जिंदा नहीं बचते। उन्होंने 5th नॉर्थेर्न लाइट इन्फेंट्री के कैप्टन कमर के लिए बहुत सम्मान जताया और बताया कि कैप्टन कमर ने उन्हें प्राथमिक उपचार भी दिया था। इसके बाद नचिकेता को कैंप ले जाया गया और कई दिनों तक कैद में रखा गया। शुरुआत में उनसे ‘सॉफ्ट इंटरोगेशन’ किया गया। करीब 24 घंटे बाद उन्हें इस्लामाबाद और फिर रावलपिंडी ले जाया गया।

नचिकेता के मुताबिक, करीब एक दिन बाद पाकिस्तानी अधिकारियों ने उन्हें ‘असहयोगी’ घोषित कर दिया और इसके बाद उन्हें ISI की स्पेशल सेल को सौंप दिया गया। उन्होंने बताया कि इसके बाद हालात काफी खराब हो गए। उन्हें एक कमरे में अकेले रखा जाता था और कई तरह से पूछताछ की जाती थी। उन्हें खड़े रहने के लिए मजबूर किया जाता, मारा जाता, खाना नहीं दिया जाता और मानसिक दबाव बनाया जाता था। उनका कहना था कि मकसद उन्हें मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से तोड़ना था, ताकि वह जानकारी देने लगें।

नचिकेता ने बताया कि पूछताछ की प्रक्रिया धीरे-धीरे और ज्यादा कठिन होती गई। पहले शारीरिक परेशानी, फिर मानसिक दबाव, गर्मी, तेज रोशनी, खाना और नींद रोकना जैसी चीजें की जाती थीं। उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा आता है जब इंसान सोचने लगता है कि आखिर कौन सा दर्द ज्यादा है—भूख का, नींद न आने का, शरीर पर चोट का या मानसिक तनाव का। जब नचिकेता को भारत वापस भेजने का फैसला हो चुका था, तब उन्हें तुरंत इसके बारे में नहीं बताया गया।

लेकिन उन्हें महसूस होने लगा था कि अधिकारियों का व्यवहार बदल गया है। उन्हें खाना मिलने लगा और जरूरी सुविधाएं वापस मिल गईं। इसके बाद उन्हें इंटरनेशनल रेड क्रॉस सोसाइटी के पास मेडिकल चेकअप के लिए ले जाया गया। कुछ दस्तावेजी प्रक्रिया के बाद उन्हें भारतीय दूतावास को सौंप दिया गया। उन्होंने अपने माता-पिता से फोन पर बात की और बताया कि वह ठीक हैं। इसके बाद उनकी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से भी बात हुई। 3 जून 1999 को नचिकेता अटारी बॉर्डर के रास्ते भारत लौटे।

इस घटना के बाद उन्होंने दोबारा फाइटर जेट नहीं उड़ाया और उन्हें भारतीय वायुसेना की ट्रांसपोर्ट डिवीजन में भेज दिया गया। उन्होंने बताया कि MiG-27 से इजेक्ट करने की वजह से उनकी रीढ़ की हड्डी में कई जगह चोट आई थी। इजेक्शन के बाद आराम न मिलने से उनकी परेशानी और बढ़ गई। करीब तीन से चार साल तक चले इलाज और मेडिकल प्रक्रिया के बाद यह तय हुआ कि वह दोबारा इजेक्शन सीट वाला विमान नहीं उड़ा सकते। इसके बाद उन्हें ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट में भेज दिया गया। इन तीन-चार सालों के दौरान उन्होंने अनमैन्ड एरियल व्हीकल और ट्रांसपोर्ट विमान उड़ाए। 2017 में वह रिटायर हुए और इसके बाद कमर्शियल फ्लाइट्स में चले गए। अब वह 53 साल के हैं।

कैप्टन कमर बाद में मारे गए। नचिकेता ने NDTV को बताया कि जब भारतीय सेना ने इस इलाके पर दोबारा कब्जा कर लिया, तब उन्हें पता चला कि वह पाकिस्तानी अधिकारी मारा जा चुका है। भारतीय सेना की इंटेलिजेंस से उन्हें उसकी डायरी का एक हिस्सा मिला था। नचिकेता ने कहा कि जिस तरह उस अधिकारी ने उनकी जान बचाई और उनके साथ व्यवहार किया, उसके लिए उनके मन में आज भी उसके लिए बहुत सम्मान है। हालांकि, ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में नचिकेता की इस पूरी कहानी पर ज्यादा फोकस नहीं किया गया है।

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