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वे गीत जिन्हें बार-बार सुनना चाहेगा हर कोई

1972 की फिल्म पाकीजा और 1974 की रजनीगंधा के गाने भी सदाबहार लगते हैं। मौसम है आशिकाना, अब भी कर्णप्रिय है। रजनीगंधा फिल्म में मुकेश का गाया एक गीत है कई बार यूं ही देखा है, जिसे गीतकार योगेश ने लिखा था।

वर्ष 1955 में आई राजकपूर की श्री 420। इस फिल्म के गाने भी लाजवाब हैं। प्यार हुआ इकरार हुआ, इसी का गीत है।

जयनारायण प्रसाद

हिंदी सिनेमा में कर्णप्रिय गीतों का दौर पचास के दशक के आसपास शुरू होता है। अलबेला पहली ऐसी हिंदी फिल्म है, जिसके गीत सुनने पर कानों को सुकून मिलता है। अलबेला भगवान दादा की फिल्म थी। इसमें एक खूबसूरत गीत है भोली सूरत दिल के खोटे। फिल्म के संगीतकार थे सी रामचंद्र, जो उस जमाने में चितलकर के नाम से गाना भी गाते थे। गीतकार थे राजेंद्र कृष्ण।

वर्ष 1955 में आई राजकपूर की श्री 420। इस फिल्म के गाने भी लाजवाब हैं। प्यार हुआ इकरार हुआ, इसी का गीत है। गीत शैलेंद्र का था और संगीत मदन मोहन का। वर्ष 1957 में आई थी दिलीप कुमार अभिनीत नया दौर। उड़े जब-जब जुल्फें तेरी इसी फिल्म का गीत है। साहिर के लिखे गीतों को ओपी नैयर ने संगीतबद्ध किया था।

गुरुदत्त की फिल्म प्यासा भी 1957 में आई। फिल्म का गीत जाने वो कैसे लोग थे अब भी सुंदर गीतों में से एक माना जाता है। राज खोसला निर्देशित सोलवां साल 1958 में आई। है अपना दिल तो आवारा इसी मूवी का गीत है। फिर आई फिल्म अनाड़ी वर्ष 1959 में। तेरा जाना दिल के अरमानों का जाना अब भी यह सदाबहार लगता है। गीत शैलेंद्र का था। आइए मेहरबां जाइए जाने जां गीत हावड़ा ब्रिज फिल्म का है, जो वर्ष 1958 में रिलीज हुई थी। आशा भोंसले ने गाया था।

संगीतकार थे ओपी नैयर। गीत कमर जलालाबादी के थे। किशोर साहू की फिल्म दिल अपना और प्रीत पराई 1960 में आई। अजीब दास्तां है ये, कहां शुरू कहां खतम इसी फिल्म का गीत है। लता मंगेशकर के गाए और शैलेंद्र के लिखे इस गीत को शंकर-जयकिशन ने संगीतबद्ध किया था। राज खोसला की बंबई का बाबू भी 1960 की है। पारसमणि 1963 की फिल्म है। वो जब याद आए बहुत याद आए इसी फिल्म का गीत है। असद भोपाली के लिखे इस गीत को लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी ने गाया था। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत था।

वो कौन थी फिल्म 1964 में आई। लग जा गले से फिर हंसी रात हो न हो इसी फिल्म का गीत है। राजा मेहंदी अली खां के लिखे गीत को स्वरबद्ध किया था मदन मोहन ने। फिर आई थी हिमालय की गोद में। फिल्म में मुकेश का गाए एक गीत चांद-सी महबूबा हो मेरी आनंद बख्शी ने लिखा था। कल्याणजी आनंदजी का संगीत है। बहारों मेरा जीवन भी संवारो भी इसी दौर का लाजवाब गीत हैं। फिल्म का नाम है आखिरी खत, जो 1966 में आई थी। कैफी आजमी के लिखे गीत को लता मंगेशकर ने स्वर दिया था। संगीत खय्याम का था।

मन्ना डे का एक मशहूर गीत है दिल की गिरह खोल दो, चुप न बैठो कोई गीत गाओ। यह रात और दिन फिल्म का गाना है, जो 1967 में आई थी। गीत शैलेंद्र के थे और संगीत शंकर-जयकिशन का। 1969 की फिल्म चिराग और 1970 में आई खामोशी के गीत भी अब भी सुनने में बेहतरीन हैं। चिराग में तेरी आंखों के सिवा और खामोशी का वो शाम कुछ अजीब थी, काफी लोकप्रिय हुए। फिल्म आनंद और शोर के गीतों की लोकप्रियता भी वैसी ही है।

1972 की फिल्म पाकीजा और 1974 की रजनीगंधा के गाने भी सदाबहार लगते हैं। मौसम है आशिकाना, अब भी कर्णप्रिय है। रजनीगंधा फिल्म में मुकेश का गाया एक गीत है कई बार यूं ही देखा है, जिसे गीतकार योगेश ने लिखा था। आनंद आश्रम, मिली, किनारा, घर और मंजिल फिल्म के गाने भी पसंद किए गए। आहिस्ता-आहिस्ता, साथ-साथ और मासूम फिल्म के गानों में वही माधुर्य है। फिल्म आनंद आश्रम के इस गीत सारा प्यार तुम्हारा में कितनी मिठास है! इंदीवर के लिखे गीत को श्यामल मित्र ने संगीतबद्ध किया था। फिल्म मासूम का तुझसे नाराज नहीं जिंदगी कितना मनभावन गीत है। यह आवाज अनूप घोषाल की है। हिंदी में ऐसे अनेक गीत हैं, जिन्हें बार-बार सुनने की इच्छा होती है। मधुमति, बंदिनी, कोहरा, कोहिनूर, गाइड, हमराज, इज्जत, कन्यादान,आपकी परिछाइयां, मिस्टर एक्स इन बांबे, रामपुर का लक्ष्मण, मेरे हमसफर, कुंवारा बाप आदि ऐसी अनूठी फिल्में हैं, जिनके गीतों को सुनना बहारों में खो जाने जैसा है।

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