आज के दौर में फिल्मों के एक्शन सीन पहले से कहीं ज्यादा एडवांस हो गए हैं। जहां 70 के दशक में सब कुछ असली जोखिम के साथ किया जाता था, वहीं अब टेक्नोलॉजी ने इसे काफी हद तक सुरक्षित और शानदार बना दिया है।
70 का दशक भारतीय सिनेमा के लिए एक्शन और रियलिज्म का दौर था। उस समय न वीएफएक्स था, न सीजीआई और न ही ग्रीन स्क्रीन। जो कुछ पर्दे पर दिखता था, वह ज्यादातर असली होता था। इसलिए हर खतरनाक सीन के पीछे कलाकारों और स्टंट टीम की जबरदस्त मेहनत और रिस्क छिपा होता था।
असली स्टंट के साथ होता था असली खतरा
उस दौर में कार चेज, आग में कूदना, ऊंचाई से गिरना जैसे सीन सच में शूट किए जाते थे। उस वक्त आज की तरह कंप्यूटर से कुछ जोड़ने या हटाने का ऑप्शन नहीं था।
‘शोले’ फिल्म में ट्रेन डकैती वाला सीन असली लोकेशन पर शूट हुआ था, जहां कलाकारों और स्टंटमैन को पूरी सावधानी के साथ रियल एक्शन करना पड़ा था।
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कैमरा ट्रिक्स और एडिटिंग का होता था कमाल
उस वक्त भले ही वीएफएक्स नहीं था, लेकिन फिल्ममेकर्स कैमरा एंगल और एडिटिंग का शानदार इस्तेमाल करते थे। लो एंगल और क्लोज शॉट्स से सीन को ज्यादा खतरनाक दिखाया जाता था। कट्स और स्लो मोशन से इम्पैक्ट बढ़ाया जाता था। फिर भी, हालांकि बेसिक एक्शन असली ही होता था।
बॉडी डबल्स, लेकिन सीमित इस्तेमाल
आज की तरह हर सीन में बॉडी डबल्स नहीं होते थे। कई एक्टर्स खुद ही स्टंट करना पसंद करते थे ताकि सीन ज्यादा रियल लगे। इसके कई उदाहरण हैं, लेकिन सबसे बड़ा उदाहरण अमिताभ बच्चन हैं।
फिल्म ‘कूली’ की शूटिंग के दौरान एक फाइट सीन में अमिताभ बच्चन को गंभीर चोट आई थी। यह हादसा इतना बड़ा था कि पूरे देश में उनके लिए दुआएं मांगी गईं।
धर्मेंद्र और ही-मैन एक्शन
धर्मेंद्र को यूं ही ‘ही-मैन’ नहीं कहा जाता। उन्होंने कई फिल्मों में अपने स्टंट खुद किए। ‘शोले’ में पानी की टंकी वाला सीन और फाइट सीक्वेंस आज भी यादगार हैं। धर्मेंद्र ने कई इंटरव्यू में बताया है कि उस समय सेफ्टी के साधन कम होते थे, इसलिए हर सीन में डर और रिस्क बना रहता था।
धर्मेंद्र ने बताया था कि उस दौर में कलाकारों को खुद ही स्टंट करने पड़ते थे चाहे घुड़सवारी हो, फाइट सीन हो या ऊंचाई से कूदना। स्टंटमैन जरूर होते थे, लेकिन हर सीन में उनका इस्तेमाल नहीं किया जाता था। इसलिए कई बार चोट लगना भी आम बात थी। उन्होंने खुद भी कई फिल्मों में बिना डुप्लीकेट के खतरनाक सीन किए, जिससे उनके एक्शन में असलीपन नजर आता था।
विनोद खन्ना के साथ भी हुआ था हादसा
‘मुकद्दर का सिकंदर’ फिल्म की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन को गुस्से में कांच का गिलास विनोद खन्ना की तरफ फेंकना था। यह सीन टाइमिंग और सटीकता पर पूरी तरह निर्भर था, जैसे ही गिलास फेंका जाए, सामने वाले को तुरंत झुकना था। लेकिन शूट के दौरान जरा-सी चूक हो गई। विनोद खन्ना सही समय पर झुक नहीं पाए और गिलास सीधे उनकी ठोड़ी पर जा लगा। कांच टूटने से उन्हें गहरी चोट आई और हालत ऐसी हो गई कि तुरंत मेडिकल मदद बुलानी पड़ी। उनकी ठोड़ी पर करीब 16 टांके आए।
सुनील दत्त की फिल्म के सेट पर लगी थी आग
‘मदर इंडिया’ की शूटिंग में एक सीन के लिए आग लगाई गई थी, लेकिन अचानक आग बेकाबू हो गई और पूरे सेट पर फैलने लगी। उस समय नरगिस आग में फंस गईं और उनकी जान खतरे में पड़ गई। तभी सुनील दत्त बिना अपनी जान की परवाह किए आग में कूद पड़े और उन्हें बचाने लगे। इस दौरान वह खुद बुरी तरह जल गए और उन्हें गंभीर चोटें आईं। इस बहादुरी से उन्होंने नरगिस की जान बचाई। यही घटना दोनों को करीब ले आई और बाद में दोनों ने शादी कर ली।
आज फिल्मों में हार्नेस, वायर, CGI और मेडिकल टीम हर समय रहती है मौजूद लेकिन 70 के दशक में इतने इंतजाम नहीं थे। उस वक्त बेसिक सेफ्टी गियर ही होता था। कई बार बिना प्रॉपर प्रोटेक्शन के शूट होता था और इसलिए एक्टर्स को चोट लगना आम बात थी।
