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Newton movie review: नक्सलियों के बीच

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के बारे में एक धारणा है कि यहां होनेवाले चुनाव को सुरक्षा एजंसियां यानी सेना या सीआरपीएफ अपने तरीके से नियंत्रित करती हैं।

इस साल राजकुमार राव की फिल्म न्यूटन को आॅस्कर के लिए भेजा गया है।

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के बारे में एक धारणा है कि यहां होनेवाले चुनाव को सुरक्षा एजंसियां यानी सेना या सीआरपीएफ अपने तरीके से नियंत्रित करती हैं। निर्देशक अमित मसूरकर की यह फिल्म इसी को दिखाती है। इसमें राजकुमार राव ने न्यूटन नाम के एक ऐसे सरकारी कर्मचारी की भूमिका निभाई है, जो छत्तीसगढ़ के एक नक्सल प्रभावित क्षेत्र में चुनाव अधिकारी बन कर जाता है।

न्यूटन चाहता है कि वहां के मतदाता निडर होकर वोट डालें और तय समय तक यानी तीन बजे तक चुनाव हो। लेकिन वहां तैनात अर्धसैनिक बल का कमांडर (पंकज त्रिपाठी) चाहता है कि या तो उसके अर्धसैनिक बल के जवान ही वोट देकर चुनाव का नाटक पूरा कर लें या अगर वोटिंग हो भी तो शुरुआती कुछ समय के बाद मान लिया जाए कि मतदान पूरा हो गया। लेकिन न्यूटन ऐसा नहीं होने देता और इसके लिए वह हथियार भी उठा लेता है। यानी वह एक जवान की राइफल खींचकर पुरी टुकड़ी पर तान देता है। यह विचित्र किंतु सच्चा वाकया फिल्म के एक दृश्य में होता है।

लगता है कि फिल्म अंतराष्ट्रीय फिल्म समारोहों के लिए बनाई गई है। हालांकि फिल्म में कई तरह के झोल भी हैं। आखिर जब फिल्म में बार-बार बताया गया है कि जिस क्षेत्र में मतदान हो रहा है वह गोंड आदिवासियों का है और वहां कोई हिंदी नहीं जानता, तो फिर वहां शुद्ध हिंदी में दीवार पर नारे क्यों और किसके लिए लिखे गए हैं?

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