आज महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के मौके पर लोक गायिका नेहा सिंह राठौर ने उनकी तस्वीर छपी टी-शर्ट पहने हुए एक तस्वीर शेयर की। उन्होंने महात्मा गांधी जिंदाबाद के नारे भी लगाए, लेकिन साथ ही नाथूराम गोडसे को मुर्दाबाद बोला। जिसके बाद उनकी पोस्ट पर लोग दो पक्षों में बंट गए। कोई उनका समर्थन कर रहा है तो वहीं तमाम लोगों को उनकी ये हरकत कतई पसंद नहीं आई।

नेहा सिंह राठौर की पोस्ट और कमेंट्स

नेहा ने एक्स पर जो तस्वीर शेयर की है, उसमें वो लाल रंग की टी-शर्ट के साथ डेनिम पैंट्स और सफेद रंग के जूते पहने हुए नजर आ रही हैं। उनकी टी-शर्ट पर महात्मा गांधी बने हैं और उनकी तस्वीर के साथ लिखा है Father of Nation यानी राष्ट्र पिता लिखा है। इस पोस्ट में कैप्शन देते हुए नेहा ने लिखा है, “महात्मा गांधी जिंदाबाद!नाथूराम गोडसे मुर्दाबाद! #MahatmaGandhi” ये पोस्ट सामने आते ही यूजर्स के कमेंट्स की लाइन लग गई है।

गौरव करिवाल नाम के यूजर ने इस पोस्ट पर लिखा, “नाथूराम गोडसे अमर रहे।” मुकुट चौहान नाम के यूजर ने लिखा, “नेहा, हमसे उस आदमी की और ज्यादा छीछालेदर कराने से तुम्हें क्या हासिल होगा। जो अब इस दुनिया मैं ही नहीं है? मुझे तो लगता है, 2 अक्टूबर 2025 को तुम्हें खाने को गुलदानी नहीं मिली थी!इसलिए रहने दो, मत करो ये नौटंकी।” चंदन नाम के यूजर ने लिखा, “इतना खुश हो रही है, जैसे गांधी जीवित होते तो तुम्हारे साथ मिलकर आंदोलन करते।” इनके अलावा एक कपिल गौर नाम के यूजर ने तंज भरा कमेंट करते हुए लिखा, “विडंबना देखिए कि जो लोग अफजल गुरु की बरसी पर ‘इंशाल्लाह’ के नारे लगाते हैं और याकूब मेमन की फांसी पर आधी रात को कोर्ट खुलवाते हैं, वही लोग गोडसे का नाम आते ही ‘संविधान और अहिंसा’ की दुहाई देने लगते हैं। गोडसे ने गांधी को क्यों मारा, इसके पीछे उनके अपने तर्क थे जो उन्होंने अदालत में दिए थे (जिसे सालों तक छपने नहीं दिया गया)। लेकिन एक हत्या को ‘आतंकवाद’ कहना और नरसंहारों को ‘गलती’ या ‘क्रांति’ कहना, यह बताता है कि दिमागी संतुलन किसका बिगड़ा हुआ है।”

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UGC पर लगी रोक तो नेहा ने मारा ताना

UGC कानून को लेकर हो रहे विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस बिल पर रोक लगा दी है। इस खबर को शेयर करते हुए नेहा ने एक वीडियो शेयर किया है और साथ ही लंबा चौड़ा कैप्शन भी लिखा है। जो है- “बाटो और राज करो” का जो खेल अंग्रेजों ने शुरू किया था, आजाद भारत में वही खेल भाजपा खेल रही है। ये अपने ही नागरिकों को कभी धर्म तो कभी जाति के नाम पर आपस में लड़वा रही है। अब कोई गिरते रुपये का हाल नहीं पूछ रहा…अस्पतालों में बिना इलाज मरते मरीजों पर किसी को दया नहीं आ रही…मिड-डे मील काग़ज़ पर परोसा जाए चाहे दूषित पानी पीकर जान निकल जाये… सोसाइटी पर खाद मिले या न मिले…फसल का दाम पाताल में चला जाये…पुल रहे चाहे बह जाये…सड़क रहे चाहे धंस जाये…कोई फर्क नहीं पड़ता…।”

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