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Mukkabaaz Movie Review: बॉक्सिंग से ज्यादा बयानबाजी

यहां सब कुछ है जो एक अच्छी फिल्म के लिए चाहिए- एक मौलिक कहानी, आज के जमाने के औरत की चाहत, जाति प्रथा के कारण समाज के एक बड़े वर्ग का सामाजिक दमन, खेल यानी मुक्केबाजी की भीतरी दुनिया के दांवपेंच, देसी मिजाज के गाने।

यहां सब कुछ है जो एक अच्छी फिल्म के लिए चाहिए- एक मौलिक कहानी, आज के जमाने के औरत की चाहत, जाति प्रथा के कारण समाज के एक बड़े वर्ग का सामाजिक दमन, खेल यानी मुक्केबाजी की भीतरी दुनिया के दांवपेंच, देसी मिजाज के गाने। बस सिर्फ दो चीजों की कमी रह जाती है। एक तो निर्देशक ने जानबूझकर इसका ऐसा अंत किया है कि दर्शक ठगा-सा रह जाता है कि आखिर हुआ क्या। दूसरा, मुख्य खलनायक की, जिसकी भूमिका जिमी शेरगिल ने निभाई है, कुछ विचित्रताएं। वैसे कश्यप बने बनाए ढांचे को तोड़नेवाले फिल्म निर्देशक रहे हैं और यहां भी उन्होंने इसी तरह की कोशिश की है। पर आधी अधूरी। नतीजा, ढांचा नही टूटा, फिल्म ही टूट गई। हां, इस बात के लिए उनकी तारीफ करनी होगी कि विनीत कुमार सिंह जैसे कम चर्चित अभिनेता को (कहानी भी विनीत की लिखी हुई है) उन्होंने इस फिल्म का नायक बनाया और जोया हसन को इसकी नायिका। वे स्टार सिस्टम को तोड़ने का काम करते रहे हैं और यहां भी उन्होंने यही किया है।

फिल्म के केंद्र में श्रवण कुमार( विनीत कुमार सिंह) नाम का एक युवक है, जो उत्तर प्रदेश के बरेली में रहता है। उसे मुक्केबाज बनने की इच्छा है और इसके लिए भगवान मिश्रा ( जिमी शेरगिल) की शागिर्दी करता है। एक दिन अकस्मात ऐसा होता है कि भगवान मिश्रा की मूक भतीजी सुनैना मिश्रा (जोया हुसैन), जो सुन तो सकती है लेकिन बोल नहीं पाती, श्रवण पर फिदा हो जाती है। श्रवण भी, जैसा कि अपेक्षाकृत छोटे या मझोले शहरों में होता है, प्यार का भूखा है। सो वह भी सुनैना को जी जान से चाहने लगता है। भगवान मिश्रा को ये कैसे बर्दाश्त होता? वह बदले की भावना से श्रवण के मुक्केबाजी के कैरियर को शुरू होने के पहले ही खत्म कर देना चाहता है। क्या वह वैसा कर पाएगा? अनुराग कश्यप का इस फिल्म को लेकर जो बयान आया था, उसके मुताबिक वे अन्य खेल फिल्मों से भिन्न प्रकार की की फिल्म बनाना चाहते थे। ज्यादातर खेल फिल्मों में नायक की जीत होती है। कई तरह की विघ्न-बाधाओं को पार करते हुए।

कश्यप, ऐसी फिल्म बनाना चाहते थे और उसमें सफल भी हुए, जिसमें सामाजिक वास्तविकता अधिक आए और जीत और हार का मसला उस तरह प्रभावी न रहे। ‘मुक्केबाज’ इस तरह की फिल्म है लेकिन इसी प्रकिया में ये फिल्म दर्शक के मन के भीतर उठते जज्बात की धारा को भी ध्वस्त कर देती है। सवाल यह भी कि अगर आप चले आ रहे फिल्मी व्याकरण को ध्वस्त करना चाहते हैं तो खलनायकी की जो बनी-बनाई छवि है, उसमें क्यों फंसे रह जाते हैं? इस प्रसंग में और भी कई तरह के झोल है। एक जगह बताया गया है कि भगवान मिश्रा चुना हुआ जन प्रतिनिधि है। ये अचानक कब हो गया? फिर भगवान मिश्रा कैसा कोच है, जो कभी बॉक्सिंग रिंग में नहीं जाता? फिल्म में सुनैना का मूक होना, एक अर्थ में प्रतीकात्मक भी है। सुनैना उन औरतों की प्रतिनिधि है, जिनकी आवाज दबा दी गई है। वह पढ़ लिख के सिर्फ अपनी आवाज नहीं पाना चाहती बल्कि औरतों की सामाजिक स्थिति बदलने की जरूरत की तरफ संकेत करती है। फिल्म में साइन लैंग्वेज, यानी संकेत लिपि का भी प्रयोग हुआ है। रवि किशन ने एक दलित कोच की भूमिका निभाई है। हालांकि उनको भी कभी बॉक्सिंग रिंग में नहीं दिखाया गया है। फिल्म एक सच्ची घटना पर आधारित बताई गई है।

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