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याद हमारी आएगीः जब मुकेश के प्यार पर लगे पहरे

कुंदनलाल सहगल से प्रभावित रहे मुकेशचंद्र माथुर यानी मुकेश को पहली बड़ी सफलता ‘पहली नजर’ फिल्म में आह सीतापुरी के लिखे अनिल बिस्वास के संगीतबद्ध गाने ‘दिल जलता है तो जलने दे...’ से 1945 में मिली थी।

कुंदनलाल सहगल से प्रभावित रहे मुकेशचंद्र माथुर यानी मुकेश को पहली बड़ी सफलता ‘पहली नजर’ फिल्म में आह सीतापुरी के लिखे अनिल बिस्वास के संगीतबद्ध गाने ‘दिल जलता है तो जलने दे…’ से 1945 में मिली थी। तब वह ऐसे उभरते हुए गायक थे, जिसकेभविष्य के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता था।
ऐसे में कोई स्थापित परिवार अपनी लड़की को ऐसे लड़के कोें कैसे सौंपता, जिसके रहने तक का कोई ठिकाना नहीं था। उन दिनों मुकेश अभिनेता मोतीलाल के घर में रहते थे, जिन्होंने उन्हें मुंबई आने के लिए प्रेरित किया था। यही कारण था कि मुकेश को अपना प्यार पाने के लिए काफी इंतजार करना पड़ा।
दरअसल 1943 में मुकेश की मित्रता मनुभाई त्रिवेदी से हुई, जो एक अमीर गुजराती ब्राह्राण रायचंद त्रिवेदी के बेटे थे। मुकेश ने मनु की बहन बची बेन सरल त्रिवेदी को देखा तो पहली ही नजर में उनकी ओर आकर्षित हो गए और तय किया कि वह बची बेन से ही शादी करेंगे। जब मनुभाई को सरल और मुकेश के बीच प्यार का पता चला तो उन्हें अच्छा नहीं लगा और दोनों के संबंधों में दरार पड़ने लगी।

मगर मुकेश बची बेन के प्यार में दीवानगी की हद तक जा पहुंचे थे। वह घंटों बची बेन के घर के सामने खड़े रहने लगे। जब तक वह उन्हें नहीं देख लेते वहां से हटते नहीं थे। बची बेन सोमवार का उपवास करती थीं और शंकरजी के मंदिर जा कर पूजा करती थीं। मुकेश भी मंदिर के पास उनका इंतजार करते रहते थे। वहीं दोनों की मुलाकात और बातचीत होती थी। काफी समय तक दोनों की मुलाकातें इसी तरह होती रहीं।

जब बची बेन के परिवार वालों को पता चला तो उन्होंने उन पर पहरे बिठा दिए। उनका घर से निकलना और मंदिर जाना भी बंद करवा दिया। मुकेश और बची की मुलाकातें बंद हो गईं। ऐसे मुश्किल समय में मुकेश की मदद करने आए अभिनेता मोतीलाल और एचएमवी कंपनी के वीके दुबे। किसी तरह से बची बेन तक संदेश पहुंचाया गया कि वे मंदिर तक आ जाएं। इसके बाद बची बेन ने घर में घोषणा कर दी कि सोमवार को जब तक वह मंदिर जाकर पूजा नहीं कर लेतीं, तब तक कुछ भी नहीं खाएंगी। बची बेन अपनी जिद पर ऐसी अड़ी कि आखिर परिवारवालों को झुकना पड़ा। बची बेन मंदिर के लिए निकलीं।
मंदिर में पहुंच कर उन्होंने पूजा की।

मंदिर के बाहर इंतजार कर रहे दुबे ने पहले बची बेन को टैक्सी में बिठाया और फिर मुकेश के पास पहुंचे। वहीं से सभी मुंबई के उपनगर कांदीवली के हनुमान मंदिर गए, जहां मोतीलाल पहले से ही पंडितजी के साथ इंतजार कर रहे थे। वहां बची बेन और मुकेश की शादी हुई। कन्यादान किया उन्हीं मोतीलाल ने, जो मुकेश को मुंबई लेकर आए थे और अपने घर में जगह दी थी। यह वाकया था 22 जुलाई 1946 का। उस दिन मुकेश का 23 वां जन्मदिन था। बची बेन और मुकेश का वैवाहिक जीवन पूरे तीस साल (मुकेश के निधन, 22 जुलाई, 1976 तक) चला। दोनों की पांच संतानें (रीता, नितिन, नलिनी, मोहनीश और अमृता) हुईं।

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