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Toilet Ek Prem Katha Review: कुछ हंसी, कुछ तंज और कुछ प्रचार

Toilet Ek Prem Katha Review: हिंदी में बनी यह पहली फिल्म है जो शौच या शौचालय के विषय पर आधारित है, लेकिन घबराइए नहीं। सिर्फ विषय की वजह से आपको ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि सिनेमा हॉल में इसे देखते समय आपको नाक पर रुमाल रखना पड़ जाएगा।

हिंदी में बनी यह पहली फिल्म है जो शौच या शौचालय के विषय पर आधारित है, लेकिन घबराइए नहीं। सिर्फ विषय की वजह से आपको ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि सिनेमा हॉल में इसे देखते समय आपको नाक पर रुमाल रखना पड़ जाएगा। दरअसल इस तरह सोचनेवाली कोई बात ही नहीं है। हां, इस फिल्म को देखते हुए आपको ये खयाल जरूर आएगा कि शौच जैसे मसले को भी देश में गंभीरता से लिया जाना चाहिए। पर ऐसा भी बिलकुल नहीं है कि गंभीर मसले पर बनी यह फिल्म गंभीर ही होगी। फिल्म में हंसने और लोटपोट होने के भी अवसर आएंगे। हां, कुछ जगहों पर शौच की समस्या पर लेक्चरबाजी भी झेलनी पड़ेगी और हां, ये शौचगाथा जरूर है लेकिन प्रेम गाथा भी है। शुरू से लेकर अंत तक रोमांटिक मिजाज बना रहेगा। फिल्म में व्यंग्य भी है आखिर आजादी के सत्तर साल बाद भी हम शौच की समस्या हल नहीं कर पाए हैं। देश में ताजमहल तो बहुत पहले बना लिया गया, लेकिन शौचालय बनाने की ओर सोचा ही नहीं गया। महिलाएं खुले में शौच जाती रहीं और परिवार के बड़े-बुजुर्ग परपंरा के गीत गाते रहे। हालांकि एक तरह से यह फिल्म ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का प्रचार भी लगती है।

फिल्म केशव (अक्षय कुमार) और जया (भूमि पेडणेकर) की प्रेम कहानी है। उत्तर प्रदेश के एक गांव में जया के आगे-पीछे घूम कर केशव उसे ब्याह कर अपने घर तो ले आता है, लेकिन ससुराल आकर जया को मालूम होता है कि उसे सुबह-सुबह सूरज उगने के पहले लोटा पार्टी में शामिल होना पड़ेगा। ‘लोटा पार्टी’ यानी गांव की औरतों का सामूहिक शौच अभियान, जिसमें वे लोटा लेकर खेतों में शौच के लिए जाती हैं। जया को ये बात बुरी लगती है और वह कहती है कि ऐसा तो बिल्कुल नहीं चलेगा। पर उसके ससुर (सुधीर पांडे) ये मानने को तैयार नहीं कि घर में शौचालय हो। उनके मुताबिक, खुले में शौच के लिए जाना सदियों पुरानी परंपरा है और उसे कैसे तोड़ा जा सकता है। अब जया की नाराजगी का क्या होगा? क्या वह अपने ससुराल वालों को घर में शौचालय बनाने के लिए मनवा पाएगी? क्या केशव इसमें आखिर तक उसके साथ टिका रहेगा? क्या सरकार भी जया का साथ देगी? फिल्म इन्हीं मसलों के इर्द-गिर्द घूमती है। हां, बीच में नाच-गाने के भी पर्याप्त अवसर हैं।

अक्षय कुमार के बारे में ये बात तो माननी होगी कि पचास की उम्र के बावजूद वे दूल्हे के रूप में असहज नहीं लगते। बात की जाए भूमि पेडणेकर की तो, अपनी पहली फिल्म ‘दम लगा के हइशा’ में वह दुल्हन बनी थीं और यहां भी वही बनी हैं। हालांकि पहली फिल्म में कहानी की मांग पर उन्होंने अपना वजन बढ़ाया था और मोटी लगी थीं। पर इस बार दुल्हन की भूमिका में वह बिल्कुल फिट नजर आई हैंं। केशव के भाई बने दिव्येंदु शर्मा की भूमिका भी हास्य पैदा करनेवाली है।

फिल्म कुछ साल पहले हुई एक वास्तविक घटना पर आधारित है। तीन-चार साल पहले उत्तर प्रदेश में ही प्रियंका भारती नाम की एक नई-नवेली दुल्हन ने इसीलिए अपने ससुराल में रहने से इनकार कर दिया था क्योंकि वहां घर में शौचालय नहीं था। प्रियंका का यह गुस्सा एक छोटा सा सामाजिक अभियान भी बन गया और उनकी जीत भी हुई। उन पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बनी। डॉक्यूमेंट्री के निर्माताओं ने आरोप भी लगाया था कि ‘टॉयलेट : एक प्रेम कथा’ उनकी फिल्म पर आधारित है।
इस फिल्म को दो स्तरों पर देखना चाहिए। एक तो एक ऐसी प्रेम कहानी के रूप में जिसमें एक सामाजिक मुद्दा है। अक्सर कई फिल्मों में सामाजिक मुद्दे होते हैं। जाति, संप्रदाय या पर्यावरणीय रक्षा के। लेकिन बॉलीवुड का ध्यान अभी तक इस पर नहीं गया था कि शौचालय भी एक सामाजिक मुद्दा है। इस रूप में यह एक अच्छी फिल्म है। लेकिन फिल्म की कमजोरी यह है कि यह कुछ ज्यादा ही प्रचारात्मक हो गई है। इसी कारण कुछ ज्यादा लंबी और सुस्त भी। अगर फिल्म आधा घंटा छोटी होती तो चुस्त होती और बेहतर भी।

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