मोरी अंखियां प्यासी रे…

सिनेमा और समाज के संबंध के बीच कई ऐसे धागे हैं, जिनसे हमारी आधुनिक सांस्कृतिक बनावट पूरी होती है।

सिनेमा और समाज के संबंध के बीच कई ऐसे धागे हैं, जिनसे हमारी आधुनिक सांस्कृतिक बनावट पूरी होती है। पर इस पूर्णता को तब बड़ी ठेस भी लगती है जब सिनेमा को एक संवेदनशील कला माध्यम की जगह सीधे-सीधे कारोबारी नजरिए से देखे जाने का दबाव हावी हो जाता है। इससे शब्द और संस्कृति की दुनिया किस तरह दूर तक आहत होती है, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। फिल्म ‘स्लमडाग मिलनेयर’ की चर्चा भारत सहित पूरी दुनिया में एक ऐसे फिल्म के तौर पर होती है, जिसने हर लिहाज से कीर्तिमान रचा।

हिंदी गीतों के राजकुमार कहे गए गोपाल सिंह नेपाली का लिखा एक गीत है- दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अंखियां प्यासी रे…।’ उत्तर भारत में पारंपरिक भजन की तरह गाए जाने वाले इस गीत का उपयोग फिल्म ‘स्लमडाग मिलनेयर’ में भी हुआ पर बिना इसके सही रचनाकार के उल्लेख के। बताया गया कि यह भक्तकवि सूरदास की रचना है। यह अज्ञानता एक संवेदनशील रचनाकार के लिए पीड़ा और अपमान से भरी है। अलबत्ता सुखद पक्ष यह भी है कि रचनाकार की कल्पना और कलम की ही ताकत है कि उसकी रचना लोकप्रिय और कालजयी बनी हुई है।

हिंदी गीतों की परंपरा में नेपाली एक बड़ा नाम है। बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के बेतिया में 11 अगस्त, 1911 को जन्मे नेपाली की काव्य प्रतिभा बचपन में ही दिखाई देने लगी थी। साहित्य की लगभग सभी विधाओं में पारंगत नेपाली की पहली कविता ‘भारत गगन के जगमग सितारे’ 1930 में रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा संपादित बाल पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। पत्रकार के रूप में उन्होंने कम से कम चार हिंदी पत्रिकाओं- रतलाम टाइम्स, चित्रपट, सुधा और योगी का संपादन किया। युवावस्था से ही नेपाली अपने गीतों के लिए हर तरफ लोकप्रिय होने लगे थे। उन्हें आदर के साथ कवि सम्मेलनों में बुलाया जाने लगा। उस दौरान एक कवि सम्मेलन में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ उनके एक गीत को सुनकर गदगद हो गए। गीत था

सुनहरी सुबह नेपाल की, ढलती शाम बंगाल की
कर दे फीका रंग चुनरी का, दोपहरी नैनीताल की
क्या दरस परस की बात यहां, जहां पत्थर में भगवान है
यह मेरा हिंदुस्तान है, यह मेरा हिंदुस्तान है।

1944 में वे अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में भाग लेने के लिए मुंबई (तब बंबई) आए। उस कवि सम्मेलन में फिल्म निर्माता शशधर मुखर्जी भी मौजूद थे, जो उनकी कविता सुनकर बेहद प्रभावित हुए। उसी दौरान उनकी ख्याति से प्रभावित होकर फिल्मिस्तान के मालिक सेठ तुलाराम जालान ने उन्हें दो सौ रुपए प्रतिमाह पर गीतकार के रूप में चार साल के लिए अनुबंधित कर लिया। नेपाली ने सबसे पहले 1944 में फिल्मिस्तान के बैनर तले बनी ऐतिहासिक फिल्म ‘मजदूर’ के लिए गीत लिखे। इस फिल्म के गीत इतने लोकप्रिय हुए कि बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन की ओर से उनको 1945 का सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार मिला।

फिल्मी गीतकार के तौर पर अपनी कामयाबी से उत्साहित होकर नेपाली मुंबई में ही जम गए और लगभग दो दशक 1944 से 1962 तक गीत लेखन करते रहे। इस दौरान उन्होंने 60 से अधिक फिल्मों के लिए 400 से ज्यादा गीत लिखे, जिनमें कई गीत खासे मकबूल हुए। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकतर गीतों की धुनें भी खुद उन्होंने बनाई। फिल्म नगरी में नेपाली की भूमिका गीतकार तक ही सीमित नहीं रही।

उन्होंने गीतकार के रूप में स्थापित होने के बाद फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रखा और हिमालय फिल्म्स और नेपाली पिक्चर्स फिल्म कंपनी की स्थापना कर उसके बैनर तले तीन फिल्मों नजराना (1949), सनसनी (195।) और खूशबू (1955) का निर्माण किया, लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म कामयाब नहीं हो पाई। उन्हें बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। इसके बाद उन्होंने फिल्म निर्माण से तौबा कर ली। अपने गीतों को लोकप्रियता का पर्याय बना देने वाले इस महान गीतकार के गीतों को गुनगुनाने वालों की गिनती आज भी कम नहीं है।

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