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मोहम्मद रफी का मुंबई का सफर नहीं था आसान, लाहौर में काटते थे बाल, पिता नहीं चाहते थे बनें सिंगर, दोस्त और भाई ने पहचानी थी प्रतिभा

रफी जब 14 साल के थे तो उनका परिवार लाहौर चला आया। रफी के पिता कभी नहीं चाहते थे कि वह एक गायक बनें।

Author नई दिल्ली | December 24, 2017 8:57 AM
प्रोफेशनल लाइफ से हट कर अगर बात करें तो रफी एक बहुत ही पारिवारिक शख्स थे। जब भी उन्हें काम से वक्त मिलता वह अपने परिवार के साथ वक्त बिताते।

गायकी के लीजेंड मोहम्मद रफी का जन्म 24 दिसंबर 1924 को अमृतसर के पास कोटला सुल्तान सिंह में हुआ था। मोहम्मद रफी के बड़े भाई की नाई की दुकान थी और वह अपना काफी वक्त उसी दुकान पर गुजारा करते थे। रफी के पहले गुरू की बात करें तो कहा जाता है कि रफी जब 7 साल के थे तो अपने भाई की दुकान के पास से गुजरने वाले एक फकीर का पीछा किया करते थे। उन्हें उस फकीर की आवाज बहुत पसंद थी और वह उसके द्वारा गाई जाने वाली नज्में सुना करते थे। रफी उस फकीर के गानों की नकल करते थे और धीरे-धीरे उन्होंने फकीर के गानों की अच्छी नकल करना सीख लिया। अब वह अपने भाई की दुकान पर बैठ कर फकीर के गाने गाया करते और लोग उनकी खूब तारीफें करते। लेकिन रफी को इससे तारीफों के सिवा कुछ नहीं मिला।

रफी जब 14 साल के थे तो उनका परिवार लाहौर चला आया। रफी के पिता कभी नहीं चाहते थे कि वह एक गायक बनें। उन्होंने कई बार उनके गायन की आलोचना भी की। लेकिन रफी के भाई ने अपने हुनरमंद भाई के टैलेंट को ध्यान में रखते हुए उन्हें उस्ताद अब्दुल वाहिद खान के पास गाना सीखने भेजा। इसके साथ साथ उन्होंने उस्ताद बरकत अली खान से भी ट्रेनिंग ली थी। इसी सब के बीच लाहौर में उस वक्त के जाने-माने गायक-अभिनेता कुन्दन लाल सहगल परफॉर्म करने ऑल इंडिया रेडियो आए। रफी और उनके भाई भी इस कार्यक्रम में पहुंचे हुए थे। लाइट नहीं होने के चलते सहगल ने गाने से मना कर दिया और भीड़ में व्याकुलता को ध्यान में रखते हुए आयोजकों से रफी को गाने का मौका देने की दरखास्त की जो कि स्वीकार कर ली गई।

रफी ने जब गाना शुरू किया तो ऑडियंस झूम उठी। यह परफॉर्मेंस रफी की पहली पब्लिक परफॉर्मेंस थी। दर्शकों की भीड़ में उस समय के प्रसिद्ध संगीतकार श्याम सुन्दर भी थे। श्याम काफी ज्यादा प्रभावित हुए उन्होंने रफ़ी को अपने लिए गाने का न्यौता दिया। जिसके बाद उन्होंने फिल्म गुल बलोच में पहली बार गाना गाया। यह गाना था सोनिये नी हीरिए नी.. तेरी याद सताए।

धीरे-धीरे उन्हें नौशाद, फिरोज नाजमी और श्री राम चंद्र चैसे कंपोजर्स के लिए गाने का मौका मिला। उन्हें फिल्म बैजू बावरा के लिए बहुत तारीफें मिलीं। एक बार जब रफी ने गायन को अलविदा कहा तो दोबारा मुड़ कर नहीं देखा। लेकिन इसके बाद रफी की डिमांड वक्त के साथ बहुत ज्यादा बढ़ने लगी और देखते ही देखते कई निर्देशकों ने रफी की आवाज को अपनी फिल्मों में इस्तेमाल किया। अब हर कंपोजर रफी को अपनी फिल्म के गानों में काम देना चाहता था।

प्रोफेशनल लाइफ से हट कर अगर बात करें तो रफी एक बहुत ही पारिवारिक शख्स थे। जब भी उन्हें काम से वक्त मिलता वह अपने परिवार के साथ वक्त बिताते। उन्हें बच्चों के साथ कैरम, क्रिकेट और बैडमिंटन खेलना पसंद था। वह अपनी बोलचाल के जरिए सभी का दिल जीत लेते थे। वह वक्त के बहुत पाबंद थे और न तो सिगरेट और ना ही शराब का सेवन करते थे। उनकी मौत 31 जुलाई 1980 को दिल का दौरा पड़ने से हुई।

https://www.youtube.com/watch?v=U5Gyw-nGf1I

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