मिर्जापुर सीरीज पिछले 7 सालों से दर्शकों की फेवरेट बनी हुई है। ऐसे में जब इसके मेकर्स ने ऐलान किया कि वो सीरीज को एक फिल्म के रूप में थिएटर में लेकर आने वाले हैं। तो जाहिर है कि फैंस के बीच इसे लेकर उत्साह अलग ही था। आज, 4 सितंबर को सिनेमाघरों में ‘मिर्जापुर द मूवी’ अपना भौकाल दिखाने के लिए आ गई है और इसे देखने के बाद मैं कह सकती हूं कि हम सभी को अपने सब्र का मीठा फल मिल गया है।
क्या है फिल्म की कहानी?
पिक्चर की शुरुआत कालीन भैया (पंकज त्रिपाठी) आपको मिर्जापुर और उसमें चलने वाली वर्चस्व और गद्दी की लड़ाई के बारे में बताने से होती है। कालीन भैया कहते हैं कि गद्दी पर अपनी जगह बनाए रखने के लिए बाहुबल लगता है और ये डर पर टिकी है। कालीन भैया को अपनी गद्दी प्यारी है, मगर उन्हें अपने उत्तराधिकारी की चिंता भी है। वो अपने बेटे मुन्ना (दिव्येंदु) को नालायक और रोतड़ू समझते हैं। ऐसे में उनके राइट और लेफ्ट हैंड गुड्डू भैया (अली फजल) और बबलू पंडित (जितेंद्र कुमार) ही उनका साम्राज्य चलाने में उनका साथ दे रहे हैं।
मिर्जापुर को चलाने के लिए कालीन भैया यानी अखंडानंद त्रिपाठी सिर्फ कालीन का बिजनेस ही नहीं करते। वर्चस्व कायम रखने के लिए उन्हें अपने हाथ खून से भी रंगने पड़ते हैं। अफीम के बिजनेस में उतरे हुए कालीन भैया को एक नए डीलर की जरूरत है। ऐसे में एंट्री होती है बब्बन बबुआ (रवि किशन) की। बब्बन, जैसलमेर से अफीम लेकर भागा हुआ है। वो मिर्जापुर में अपने माल का कारोबार करना चाहता है। मिर्जापुर आकर उसे गद्दी के खेल में कूदने का मोटिवेशन मिलता है। बस यहीं से वो कालीन भैया और उनसे जुड़े सभी लोगों के खात्मे का स्वांग रचने लगता है। लेकिन मिर्जापुर की गद्दी हथियाना इतनी आसान बात कहां हैं!
फर्स्ट हाफ में गुड्डू भैया का दम आपको देखने को मिलता है। वो लोगों को ऐसे धोते हैं कि देखकर आपका दिल खुश हो जाए। मगर उनका खेल यहीं खत्म नहीं होता। गुड्डू भैया के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी है, और उनके पीछे मुन्ना भैया भी पड़े हुए हैं। मुन्ना भैया वर्सेस गुड्डू भैया, पिक्चर की यूएसपी है। दोनों सेकेंड हाफ में हीरो बनकर उभरते हैं। दोनों की जुगलबंदी, मस्ती और तकरार कमाल की है।
परफॉरमेंस
पंकज त्रिपाठी मिर्जापुर का चेहरा हैं, इस बात में कोई दोराय नहीं है। उनका जलवा सीरीज के बाद फिल्म में भी कायम है। लेकिन अगर ये कहा जाए ये पिक्चर अली फजल की है तो गलत नहीं होगा। अली फजल, गुड्डू पंडित के रोल में हमेशा से चमकते आ रहे हैं। फिर भी उन्होंने फिल्म में ऐसी बेहतरीन परफॉरमेंस दी है कि आप अपने आप को उनके लिए सीटी मारने और हूटिंग करने से नहीं रोक पाएंगे। ऐसा ही कुछ मुन्ना भैया के किरदार में दिव्येंदु के लिए भी कहा जा सकता है। दिव्येंदु, मुन्ना त्रिपाठी के स्वैग को जबरदस्त तरीके से पर्दे पर लेकर आए हैं। उनकी मस्ती और डायलॉगबाजी ने दिल खुश कर दिया।
इस पिक्चर की बची हुई जान रवि किशन भी हैं। विलेन बब्बन बबुआ के रोल में उन्होंने जो कमाल किया है, वो शायद ही कोई और कर पाता। हर डायलॉग के साथ रवि किशन अपने चेहरे के एक्सप्रेशन यूं बदलते हैं कि देखकर मजा ही आ जाता है। हमारे मिर्जापुर के ‘अवेंजर्स’ को बब्बन बने रवि किशन तगड़ी फाइट देते हैं। उनके राइट हैंड मैन बने मोहित मलिक भी कमाल हैं। इन सभी के अलावा पिक्चर में रसिका दुग्गल, शीबा चड्ढा, सुशांत सिंह, राजेश तैलंग, कुलभूषण खरबंदा, श्वेता त्रिपाठी और श्रिया पिलगांवकर ने अपने किरदारों को बखूबी निभाया है।
डायरेक्शन
मिर्जापुर द मूवी में मेकर्स ने फैंस को वो सबकुछ दिया है, जो सीरीज में मिस किया जाता था। पिक्चर में खून-खराबा और एक्शन तो भरपूर है ही, साथ ही इसमें बढ़िया कॉमेडी से भरे पल भी हैं। मिर्जापुर की गद्दी की लड़ाई की इस कहानी में कई बड़े ट्विस्ट आते हैं। कहानी मोड़ लेती है, तो आपका उत्साह भी बढ़ता जाता है। सेकेंड हाफ तक आते-आते आप मिर्जापुर के हो जाते हैं। जैसलमेर के रेगिस्तान में हो रहे खुनी खेल को देखकर आपका खून भी उबाल मारने लगता है। आपके मूवी एक्सपीरियंस में इजाफा करता है पिक्चर का जबरदस्त म्यूजिक। ये फिल्म पूरी तरह से दर्शकों के लिए है और इसे मिस करना गलती होगी।
