रील गाथा: हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में सिर्फ अपनी कहानी या गानों की वजह से याद नहीं की जातीं, बल्कि उनके बनने के पीछे की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प होती है। ऐसी ही एक फिल्म है ‘पाकीज़ा’ जिसे बनने में पूरे 14 साल लग गए। इस फिल्म को बनाने में देरी होने के पीछे सबसे बड़ा कारण था मीना कुमारी और निर्देशक कमल अमरोही के रिश्ते में आई दूरी।
‘पाकीज़ा’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसे अधूरे रिश्ते की कहानी भी बन गई, जिसने फिल्म की शूटिंग को सालों तक रोक दिया। लेकिन सालों बाद यह फिल्म पूरी हुई और हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार क्लासिक फिल्मों में शामिल हो गई।
1958 में शुरू हुआ ‘पाकीज़ा’ का सपना
कमल अमरोही अपने समय के बेहद संवेदनशील और परफेक्शनिस्ट निर्देशक माने जाते थे। उन्होंने ‘पाकीज़ा’ की कहानी 1950 के दशक में लिखी थी। यह कहानी एक तवायफ के जीवन, उसके दर्द, उसके संघर्ष और उसके भीतर छिपे प्यार की कहानी थी। कमल अमरोही चाहते थे कि यह फिल्म बेहद भव्य तरीके से बनाई जाए। उस समय तक वह Meena Kumari से शादी कर चुके थे और उन्हें ही फिल्म की मुख्य नायिका के रूप में चुना गया।
रिश्ते में आई खटास और रुक गई फिल्म
1958 में फिल्म की शूटिंग शुरू हुई। भव्य सेट बनाए गए, शानदार कॉस्ट्यूम तैयार किए गए और संगीतकार गुलाम मोहम्मद को फिल्म का संगीत तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई। फिल्म के कई गाने जैसे ‘चलते चलते’, ‘इन ही लोगों ने’ और ‘मौसम है आशिकाना’ रिकॉर्ड भी हो गए थे। शुरुआत में सब कुछ सही चल रहा था और उम्मीद थी कि फिल्म जल्दी ही पूरी हो जाएगी। लेकिन फिल्म की शूटिंग के दौरान ही मीना कुमारी और कमल अमरोही के रिश्ते में तनाव बढ़ने लगा। दोनों के बीच कई बातों को लेकर मतभेद होने लगे और आखिरकार स्थिति इतनी बिगड़ गई कि दोनों अलग रहने लगे।
इस विवाद का असर सीधे फिल्म पर पड़ा। चूंकि ‘पाकीज़ा’ की पूरी कहानी और निर्माण मीना कुमारी के इर्द-गिर्द ही था, इसलिए उनके बिना फिल्म की शूटिंग आगे नहीं बढ़ सकती थी। नतीजा यह हुआ कि फिल्म की शूटिंग बीच में ही रुक गई। सेट वैसे ही खड़े रहे, गाने रिकॉर्ड हो चुके थे, लेकिन फिल्म अधूरी रह गई। धीरे-धीरे साल बीतने लगे और इंडस्ट्री में यह चर्चा होने लगी कि शायद ‘पाकीज़ा’ कभी पूरी नहीं हो पाएगी।
कई साल तक अधूरी रही ‘पाकीज़ा’
फिल्म के रुक जाने के बाद करीब 8–9 साल तक ‘पाकीज़ा’ पर कोई काम नहीं हुआ। इस दौरान मीना कुमारी अपनी निजी जिंदगी और करियर की मुश्किलों से जूझ रही थीं। उनकी तबीयत भी धीरे-धीरे खराब रहने लगी। दूसरी तरफ कमल अमरोही भी इस फिल्म को लेकर बेहद भावुक थे, क्योंकि यह उनका ड्रीम प्रोजेक्ट था। फिल्म के सेट लंबे समय तक स्टूडियो में वैसे ही पड़े रहे। कई लोग कहते हैं कि यह फिल्म उस समय हिंदी सिनेमा की सबसे दुर्भाग्यशाली फिल्मों में गिनी जाने लगी थी।
मीना कुमारी ने फिर शुरू करवाई शूटिंग
समय बीतने के साथ मीना कुमारी की तबीयत और बिगड़ने लगी। उन्हें महसूस होने लगा कि उनकी जिंदगी ज्यादा लंबी नहीं है। ऐसे समय में उन्होंने खुद पहल की और कमल अमरोही से कहा कि ‘पाकीज़ा’ को पूरा कर लिया जाए। कहा जाता है कि दोनों के रिश्ते पूरी तरह ठीक तो नहीं हुए, लेकिन इस फिल्म के लिए उन्होंने अपने पुराने मतभेद भुला दिए। इसके बाद 1969 के आसपास फिल्म की शूटिंग दोबारा शुरू हुई। हालांकि तब तक मीना कुमारी की तबीयत काफी कमजोर हो चुकी थी।
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बीमारी के बावजूद पूरी की फिल्म
फिल्म की शूटिंग के दौरान मीना कुमारी को कई बार लंबे ब्रेक लेने पड़ते थे। कई सीन ऐसे थे जिन्हें पूरा करना उनके लिए बेहद मुश्किल हो गया था। कुछ सीन बॉडी डबल की मदद से शूट किए गए, जबकि क्लोज-अप शॉट्स मीना कुमारी ने खुद दिए। फिल्म के कई हिस्सों को दोबारा शूट करना पड़ा क्योंकि इतने सालों में तकनीक और फिल्म का लुक भी बदल चुका था।
इसके बावजूद कमल अमरोही ने अपने विजन से कोई समझौता नहीं किया और फिल्म को उसी भव्यता के साथ पूरा किया, जैसा उन्होंने शुरुआत में सोचा था।
1972 में रिलीज हुई ‘पाकीज़ा’
करीब 14 साल के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार 1972 में ‘पाकीज़ा’ रिलीज हुई। फिल्म के रिलीज होते ही इसके गाने और डायलॉग लोगों की जुबान पर चढ़ गए। खास तौर पर ट्रेन वाला मशहूर सीन, जिसमें एक अजनबी मीना कुमारी के पैरों को देखकर चिट्ठी लिखता है- “आपके पांव देखे, बहुत हसीन हैं। इन्हें जमीन पर मत उतारिएगा, मैले हो जाएंगे।” यह डायलॉग हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार डायलॉग्स में गिना जाता है।
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रिलीज के कुछ ही हफ्तों बाद हुआ दुखद अंत
‘पाकीज़ा’ की सफलता का जश्न मीना कुमारी ज्यादा दिन तक नहीं देख सकीं। फिल्म रिलीज होने के कुछ ही हफ्तों बाद, 31 मार्च 1972 को उनका निधन हो गया। उनकी मौत के बाद फिल्म को और भी ज्यादा लोकप्रियता मिली। लोग बड़ी संख्या में सिनेमाघरों में इसे देखने पहुंचे। धीरे-धीरे ‘पाकीज़ा’ को हिंदी सिनेमा की सबसे खूबसूरत और क्लासिक फिल्मों में गिना जाने लगा।
आज भी याद की जाती है ‘पाकीज़ा’
आज भी ‘पाकीज़ा’ को उसकी शानदार सिनेमैटोग्राफी, खूबसूरत संगीत, भव्य सेट और मीना कुमारी की भावुक अदाकारी के लिए याद किया जाता है। लेकिन इस फिल्म की सबसे खास बात यह है कि इसके पीछे एक अधूरी प्रेम कहानी भी छिपी है। एक ऐसी प्रेम कहानी, जिसमें दो लोगों के रिश्ते की दूरी ने फिल्म को सालों तक रोक दिया, लेकिन आखिरकार उसी फिल्म ने हिंदी सिनेमा को एक अमर क्लासिक दे दी। यही वजह है कि ‘पाकीज़ा’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि बॉलीवुड के इतिहास का एक भावुक अध्याय भी है, जिसे आज भी बड़े सम्मान और प्यार के साथ याद किया जाता है।
