हिंदी सिनेमा में कई ऐसे सुपरस्टार हुए हैं जिन्होंने अपने करियर में 100 से 200 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, राज कपूर, शशि कपूर और श्रीदेवी जैसे सितारों की लंबी फिल्मोग्राफी इसका उदाहरण है। लेकिन दिग्गज अभिनेता और फिल्मकार मनोज कुमार उन चुनिंदा सितारों में शामिल रहे जिन्होंने कम फिल्मों में काम करके भी बड़ी पहचान बनाई।

4 अप्रैल 2025 को दुनिया को अलविदा कहने वाले मनोज कुमार ने अपने करियर में सीमित फिल्मों में ही काम किया, जबकि उनके समकालीन अभिनेता सैकड़ों फिल्मों में नजर आए। एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने इसका कारण भी बताया था और इसी दौरान उन्होंने हल्के अंदाज में धर्मेंद्र और शशि कपूर पर तंज भी कस दिया था।

धर्मेंद्र और शशि कपूर को बताया ‘लालची’

मनोज कुमार का मानना था कि वह फिल्मों की संख्या बढ़ाने के बजाय अच्छी कहानी और प्रभावशाली किरदारों पर ध्यान देते थे। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि वह फिल्मों के मामले में लालची नहीं रहे। उनके मुताबिक, उनके समकालीन धर्मेंद्र और शशि कपूर ने लगभग 300-300 फिल्मों में काम किया, जबकि उन्होंने अपने पूरे करियर में करीब 35 मुख्य फिल्में ही कीं।

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हालांकि उनके करियर की कुल फिल्में लगभग 80 के आसपास बताई जाती हैं, जिनमें शुरुआती दौर की छोटी भूमिकाएं भी शामिल हैं। इसके बावजूद उनकी फिल्मों का इंतजार दर्शक लंबे समय तक करते थे और रिलीज होते ही उन्हें शानदार प्रतिक्रिया मिलती थी।

फ्लॉप फिल्मों के बाद कम कर दी थी एक्टिंग

1980 के दशक के आखिर और 90 के शुरुआती दौर में ‘कलयुग और रामायण’, ‘संतोष’ और ‘क्लर्क’ जैसी फिल्मों के बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन न करने के बाद मनोज कुमार ने फिल्मों में अपनी मौजूदगी काफी कम कर दी।

उन्होंने आखिरी बार 1995 में आई फिल्म ‘मैदान-ए-जंग’ में अभिनय किया। इसके बाद 1999 में उन्होंने फिल्म ‘जय हिंद’ का निर्देशन किया, जो उनके करियर की आखिरी डायरेक्टोरियल फिल्म रही। लगभग चार दशक लंबे करियर में उन्होंने अभिनय और निर्देशन दोनों में खास पहचान बनाई।

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अपनी पसंदीदा फिल्म बताई ‘शोर’

मनोज कुमार ने अपने करियर में कई यादगार फिल्में दीं, जिनमें ‘शहीद’, ‘उपकार’, ‘पूरब और पश्चिम’ और ‘रोटी कपड़ा और मकान’ जैसी फिल्में शामिल हैं। देशभक्ति से जुड़ी फिल्मों के कारण ही उन्हें ‘भारत कुमार’ के नाम से भी जाना जाने लगा।

लेकिन जब उनसे उनकी पसंदीदा फिल्म के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने 1972 में आई फिल्म ‘शोर’ का नाम लिया। उनके अनुसार यह एक पिता और बेटे की भावनात्मक कहानी थी, जिसमें बेटा बोल नहीं सकता और पिता उसकी आवाज सुनने के लिए तरसता है, लेकिन जब बेटा बोल पाता है तब तक पिता सुनने की क्षमता खो देता है।

कैसे बने निर्देशक

मनोज कुमार ने यह भी बताया था कि वह शुरू में निर्देशक बनने की योजना नहीं बना रहे थे। फिल्म ‘शहीद’ के दौरान परिस्थितियों के कारण उन्हें अनौपचारिक रूप से निर्देशन संभालना पड़ा। बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के ‘जय जवान जय किसान’ नारे से प्रेरित होकर उन्होंने 1967 में फिल्म ‘उपकार’ बनाई, जिसने उन्हें सफल निर्देशक के रूप में भी स्थापित कर दिया।

मनोज कुमार का मानना था कि उनकी सफलता में उनके माता-पिता का सबसे बड़ा योगदान रहा। कम फिल्में करने के बावजूद उन्होंने भारतीय सिनेमा पर जो छाप छोड़ी, वह आज भी याद की जाती है। अधिक पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…