फिल्म खत्म होती है, थिएटर की लाइटें जल जाती हैं, लेकिन कुछ कहानियों की यादें हमारे मन में बस जाती हैं और इसे कचोटती रहती हैं। दिलचस्प बात यह है कि ऐसी कई फिल्में अपनी हैप्पी एंडिंग नहीं, बल्कि दुखद अंत की वजह से याद रह जाती हैं। जब कोई पसंदीदा किरदार मर जाता है, प्रेम अधूरा रह जाता है या हीरो अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाता, तो दर्शक भावनात्मक रूप से उससे जुड़ जाते हैं। ऐसे अंत अक्सर सवाल छोड़ जाते हैं, आखिर क्यों?

कुछ लोगों को लगता है कि हर कहानी का अंत सुखद होना चाहिए, जबकि कई फिल्ममेकर मानते हैं कि हर कहानी की अपनी सच्चाई होती है और उसी के अनुसार उसका अंत तय होना चाहिए। साथ ही कुछ का ये भी मानना है कि अंत ऐसा होना चाहिए जो हमें कुछ लोगों के जीवन में बीती हुईं चीजों का एहसास दिला सके।

इस वक्त इम्तियाज अली की फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ अपने अंत को लेकर चर्चा में है। ये फिल्म दिल को छू लेने वाली कहानी दिखाती है, जिसकी हैप्पी एंडिंग नहीं होती। ऐसा क्यों हुआ इसे लेकर इम्तियाज अली ने बताया भी है। ऐसी पहली फिल्म नहीं है जिसमें ऐसा हुआ हो। ऐसी कई फिल्में आईं जो दर्शकों के मन को दुखी कर गईं, मगर एक छाप भी छोड़ गईं।

इम्तियाज अली की फिल्मों की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वे समय के साथ और गहरी होती जाती हैं। कुछ कहानियां पहली ही बार में दिल जीत लेती हैं, जबकि कुछ धीरे-धीरे असर छोड़ती हैं और लंबे समय तक याद रह जाती हैं। ‘मैं वापस आऊंगा’ भी ऐसी ही फिल्म है। बंटवारे के दर्द और पीढ़ियों तक चले आए जख्मों को संवेदनशील अंदाज में दिखाती यह फिल्म निरवैर (दिलजीत दोसांझ) की कहानी है, जो लंदन से चंडीगढ़ अपने दादाजी ईशर (नसीरुद्दीन शाह) से उनकी आखिरी मुलाकात के लिए लौटता है।

ईशर की एक ऐसी अधूरी ख्वाहिश है, जिसे पूरा करने की जिम्मेदारी वह अपने पोते निरवैर को सौंपते हैं। बिखरी हुई यादों के जरिए निरवैर को पता चलता है कि जवानी के दिनों में ईशर, जिन्हें तब कीनू (वेदांग रैना) के नाम से जाना जाता था, जिया (शरवरी) से बेइंतहा प्यार करते थे। लेकिन भारत-पाकिस्तान बंटवारे ने दोनों को उनकी मर्जी के खिलाफ हमेशा के लिए अलग कर दिया। इसके बावजूद कीनू ने जिया से एक दिन लौटने का वादा किया था और उसी वादे को निभाने की उम्मीद ने उन्हें जिंदगीभर जिंदा रहने का हौसला दिया।

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क्लाइमैक्स है बेहद दुखद

फिल्म का क्लाइमैक्स बेहद भावुक है। सालों बाद ईशर अपनी प्रेमिका को देखता है, लेकिन उसकी तस्वीर में। सालों पहले जब उसके पास मौका था तब वो उसे हकीकत में देखने की बजाय वहां से चला जाता है।

फिल्म देखने के बाद कई लोग इस बात को लेकर इम्तियाज अली से सवाल कर रहे हैं कि जब ईशर भारत से पाकिस्तान तक गया था तो जिया से मिला क्यों नहीं? इस बात ने दर्शकों को इस हद तक दुखी किया कि उन्होंने रोते हुए इम्तियाज को इसके बारे में पूछा कि आखिर उन्होंने अपनी फिल्म की कहानी में उनकी मुलाकात क्यों नहीं लिखी थी?

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सोशल मीडिया पर इसका वीडियो भी वायरल हो रहा है। जिसमें एक लड़की ने इम्तियाज से पूछा, “वो गया था जब वहां पर तो वो मिला क्यों नहीं उससे? वो मिल भी तो सकता था ना? मेरी एक शिकायत है कि मिला दे ना था।?”

इम्तियाज अली ने बताया क्यों अधूरी छोड़ी कहानी?

इस पर इम्तियाज ने कहा, “क्योंकि कभी क्या होता है ना कि अगर मिल जाते ना तो वो सामूहिक तरीके से जो तड़प आपके दादू और उनके पीढ़ी ने देखी है वो भुला देते हम लोग। कभी कभी उस खलीश को रख लेना चाहिए ताकि याद रहे कि उन लोगों ने कितनी कुर्बानियां दी हैं। आपके दादू ने कितना कुछ सहा है…”