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हमारी याद आएगी: आखिरी जन्मदिन का अनोखा तोहफा

तब सुब्बुलक्ष्मी तमिल फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री और गायिका थीं। पूरा दक्षिण उनका दीवाना था।

तमिलभाषी सुब्बुलक्ष्मी ने संदेश भिजवाया,‘यह भजन मैंने कभी गाया नहीं, न इसकी धुन बनाई है। बेहतर होगा कि दिल्ली में ही किसी गायिका से यह भजन गवा लिया जाए।’

वाकया 1947 की उतरती बरसात का है। देश को आजादी मिले एकाध महीना हुआ था। विभाजन के बाद फैले कौमी दंगों से देश गुजर रहा था। हिंसा उफान पर थी। इस मारकाट के बीच सितंबर में ऑल इंडिया रेडियो के मद्रास स्टेशन पर दिल्ली से एक संदेश आया। क्या इस साल दो अक्तूबर को महात्मा गांधी के जन्मदिन पर कर्नाटक और हिंदुस्तानी संगीत की मशहूर गायिका एमएस सुब्बुलक्ष्मी (कुंजम्मा) कुछ भजन गा सकती हैं? तब सुब्बुलक्ष्मी तमिल फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री और गायिका थीं। पूरा दक्षिण उनका दीवाना था। उनके कार्यक्रमों की टिकटें मिलना मुश्किल हो जाता था। सुब्बुलक्ष्मी ने पारिवारिक कारणों से असमर्थता जताई। बात आई गई हो गई।

एक अक्तूबर, 1947 की सुबह मद्रास स्टेशन में फिर संदेश आया। बापू चाहते हैं कि सुब्बुलक्ष्मी उनके जन्मदिन पर मीराबाई का मशहूर भजन, ‘हरि तुम हरो जन की पीर’ गाएं। तमिलभाषी सुब्बुलक्ष्मी ने संदेश भिजवाया,‘यह भजन मैंने कभी गाया नहीं, न इसकी धुन बनाई है। बेहतर होगा कि दिल्ली में ही किसी गायिका से यह भजन गवा लिया जाए।’ उसी शाम रेडियो स्टेशन पर गांधीवादी नेता सुचेता कृपलानी का संदेश आया,‘बापू चाहते हैं कि जन्मदिन पर भजन कोई और नहीं सुब्बुलक्ष्मी ही गाएं।’

बापू के प्रति सम्मान के कारण सुब्बुलक्ष्मी इनकार न कर सकीं। शाम को रेडियो स्टेशन के स्टूडियो में जाकर ‘हरि तुम हरो…’ की धुन बनाई। आधी रात के आसपास यह भजन रेकॉर्ड किया। सुबह भजन का टेप हवाई जहाज से दिल्ली भेजा। 2 अक्तूबर की शाम को बापू ने अपने 78वें जन्मदिन पर यह भजन सुना, तब उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि यह उनके अंतिम जन्मदिन का तोहफा होगा। चार महीने भी नहीं बीते होंगे कि 30 जनवरी, 1948 को उनकी हत्या कर दी गई। शोक में डूबे पूरे देश में धीर-गंभीर आवाज में सुब्बुलक्ष्मी का ‘हरि तुम हरो…’ देश में गूंज रहा था।

कुंजम्मा के गले में कोयल विराजती थी। देश-विदेश में वह अपने हुनर का प्रदर्शन कर चुकी थीं। गांधीजी ने पहली बार उन्हें 1941 में सुना था। सेवाग्राम में प्रार्थना के दौरान सुब्बुलक्ष्मी ने कुछेक भजन गाए थे, जिसके बाद गांधी उनके मुरीद बन गए थे। सुब्बुलक्ष्मी ने कस्तूरबा मेमोरियल में फंड जुटाने के लिए कुछ कार्यक्रम भी किए। बापू ने इसके लिए उनकी तारीफ भी की। फंड जुटाने का काम कुंजम्मा ने कमला नेहरु अस्पताल के लिए भी किया। तिरुपति तिरुमला बोर्ड की चलाई जा रही वेद पाठशाला के लिए भी उन्होंने मुफ्त में अपने कार्यक्रम किए।

प्राचीन शुद्ध तमिल संगीत को संभालने के काम में लगी संस्था तमिल इसाई संगम के लिए तो कुंजम्मा ने लगातार 13 सालों तक मुफ्त गायन किया और संस्था को आर्थिक तौर पर मजबूत बनाया। यह वह संस्था है जहां देश के राष्ट्रपति रहे एपीजे अब्दुल कलाम ने खुद का बनाया गाना गाकर सुनाया था। इसलिए कि वह चाहते थे कि देश के स्कूली पाठ्यक्रम में संगीत को शामिल करने को लेकर देश में जागरुकता फैले, जिससे जीवन में शांति और सुकून आए।

कुंजम्मा को 1998 में भारत रत्न मिला। भारत में संगीत क्षेत्र की किसी प्रतिभा को पहली बार यह सम्मान मिला था। यह सम्मान कुंजम्मा से ज्यादा उस भारतीय संगीत को मिला था, जिसकी मधुरता और विविधता की आज भी दुनिया कायल है।

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