मकबूल फिदा हुसैन, जिन्हें दुनिया एम. एफ. हुसैन के नाम से जानती है, भारतीय आधुनिक कला के सबसे प्रभावशाली नामों में से एक थे। उनकी पेंटिंग्स में भारत की मिट्टी की सादगी, लोक संस्कृति की गर्माहट और बॉलीवुड की रंगीन दुनिया एक साथ दिखाई देती थी।

यही वजह है कि उनकी कृतियाँ सिर्फ देखने भर की नहीं, बल्कि महसूस करने और भीतर तक उतर जाने वाला अनुभव बन जाती थीं।आज, 9 जून को उनकी पुण्यतिथि है। इस मौके पर हम उनकी कला और काम पर नजर डालते हैं।

मकबूल फिदा हुसैन भारत के उन चुनिंदा कलाकारों में से थे, जिन्होंने पेंटिंग को सिर्फ दीवारों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे फिल्मों, भावनाओं और आम जिंदगी से जोड़ दिया। उनकी कला में भारत की संस्कृति थी और साथ ही भारतीय सिनेमा की चमक भी साफ नजर आती थी।

एक ऐसा कलाकार, जिसने कला को कहानी बना दिया

वे भारतीय जीवन, परंपरा और फिल्मों से गहराई से जुड़े हुए थे। यही वजह है कि उनकी कला को समझने के लिए सिर्फ देखने से ज्यादा महसूस करना पड़ता था। हुसैन भारतीय फिल्मों के बड़े प्रशंसक थे। वे सिनेमा को एक कला मानते थे, सिर्फ मनोरंजन नहीं।

उनकी पेंटिंग्स में कई बार फिल्मी दुनिया की झलक दिखती थी- कभी भावनाएं, कभी नृत्य, तो कभी किरदारों की झलक। यही वजह है कि उन्हें अक्सर ऐसा कलाकार कहा जाता है जिनकी कला में फिल्मी कहानी दिखती थी।

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माधुरी दीक्षित थीं उनकी कला की प्रेरणा

हुसैन की कला में सबसे ज्यादा चर्चा माधुरी दीक्षित को लेकर होती है। वे उन्हें अपनी प्रेरणा (म्यूज) मानते थे। उन्होंने माधुरी दीक्षित को लेकर कई पेंटिंग्स बनाई, जिनमें उन्हें भारतीय सौंदर्य और अभिव्यक्ति का प्रतीक दिखाया गया।

एम. एफ. हुसैन ने पेंटिंग के साथ-साथ सिनेमा में भी अपनी क्रिएटिविटी दिखाई। उन्होंने तीन फिल्मों का निर्देशन किया था। उनके लिए फिल्में भी एक चलती-फिरती पेंटिंग की तरह थीं, जहां हर फ्रेम में रंग, भावना और कहानी एक साथ दिखाई देती है।

हुसैन की पहली फिल्म ‘थ्रू द आइज ऑफ अ पेंटर’ थी, ये एक शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री थी, जिसे उन्होंने 1967 में भारत सरकार के निमंत्रण पर बनाया था। यह फिल्म भारतीय जीवन और संस्कृति को एक कलाकार की नजर से दिखाती है और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना भी मिली थी, यहां तक कि इसने गोल्डन बेयर पुरस्कार भी जीता।

इसके बाद उन्होंने फीचर फिल्मों की दुनिया में कदम रखा और साल 2000 में ‘गज गामिनी’ बनाई, जो बॉलीवुड अभिनेत्री माधुरी दीक्षित को समर्पित थी। यह फिल्म पारंपरिक कहानी से अलग थी और इसमें कला, प्रतीक और कल्पना को ज्यादा महत्व दिया गया था।

उनकी आखिरी फिल्म साल 200 में आई, जिसका नाम था ‘मीनाक्षी: ए टेल ऑफ 3 सिटीज’। इस फिल्म में तब्बू मुख्य भूमिका में नजर आईं। यह फिल्म भी हुसैन की आर्टिस्टिक सोच का विस्तार थी, जिसमें कहानी से ज्यादा भाव और विजुअल एक्सप्रेशन पर ध्यान दिया गया।

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एम.एफ. हुसैन की पेंटिंग के बारे में

एम. एफ. हुसैन की पेंटिंग्स की खास बात ये थी कि उनके कैनवास एक चलती हुई कहानी लगती थी। उनकी पेंटिंग्स में घोड़े दौड़ते हुए दिखते थे, जो उनमें एक अलग ही एनर्जी भर देते थे। महिलाओं के अलग-अलग भाव उनके चित्रों को और भी जीवंत बना देते थे। उनके रंग बहुत तेज और चमकदार होते थे, जो देखते ही ध्यान खींच लेते थे।

हुसैन की कला में सबसे खास बात ये थी कि वे पुराने भारतीय तौर-तरीकों और आज की सोच को एक साथ जोड़ देते थे। उनकी पेंटिंग्स में गांव-देहात की सादगी भी दिखती थी और मॉडर्न आर्ट का अंदाज भी। वे मानते थे कि भारत की पहचान उसकी कहानियों, रंगों और भावनाओं से है और यही सब उनकी हर पेंटिंग में साफ दिखाई देता था।

विवादों के बावजूद मजबूत पहचान

अपने लंबे करियर में एम. एफ. हुसैन कई विवादों का भी हिस्सा रहे। उनकी कुछ पेंटिंग्स को लेकर देश में बहसें हुईं, जिसके बाद उन्होंने भारत से बाहर रहना चुना। लेकिन इसके बावजूद उनकी कला की पहचान कभी कमजोर नहीं हुई। वे दुनिया भर में एक बड़े आधुनिक कलाकार के रूप में जाने जाते रहे।

1970 और 1990 के दशक में उनकी कुछ पेंटिंग्स को लेकर बड़ा विवाद हुआ, जिनमें हिंदू देवी-देवताओं जैसे सरस्वती और दुर्गा को लेकर बनाई गई पेंटिंग्स पर लोगों ने कड़ा विरोध जताया। बाद में 2006 में उनकी एक पेंटिंग ‘भारत माता’ को लेकर भी काफी बवाल हुआ, जिसमें भारत माता को नग्न रूप में दिखाने के आरोप लगे और देशभर में प्रदर्शन हुए।

इन विवादों के चलते उनके खिलाफ कई कानूनी मामले दर्ज हुए, हजारों एफआईआर तक दर्ज होने की बात सामने आई और कई जगह उनकी कला प्रदर्शनियों पर भी विरोध और तोड़फोड़ हुई। उनकी फिल्म ‘मीनाक्षी: ए टेल ऑफ थ्री सिटीज’ (2004) के एक गाने को लेकर भी धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप लगे, जिसके बाद उसे हटाना पड़ा। लगातार बढ़ते विवाद, धमकियों और कानूनी परेशानियों की वजह से हुसैन को 2006 में भारत से बाहर रहना पड़ा, जिसे उनका स्व-निर्वासन कहा जाता है। बाद में उन्होंने कतर की नागरिकता ली और 2011 में लंदन में उनका निधन हो गया।