सिनेमा का सिस्टम: हम कई बार फिल्ममेकर्स से सुनते हैं कि उनकी आने वाली फिल्म पर काम चल रहा है। कहानी लिखी जा चुकी है और जल्द ही शूटिंग शुरू होगी। ऐसे ही कई बार हम शूटिंग का कोई लीक फुटेज देखते हैं। ये सब फिल्म बनने के प्रोसेस के बीच का काम होता है और फिर आती है रिलीज डेट, जब हम जाकर सिनेमाघरों में फिल्म देखते हैं और उसके बारे में अपने रिव्यू देते हैं। लेकिन 2-3 घंटे की फिल्म के पीछे कई सालों और हजारों लोगों की मेहनत होती है। एक फिल्म सिर्फ हीरो-हीरोइन या डायलॉग का नाम नहीं है, बल्कि यह एक पूरा सिस्टम है। आज हम आपको इसी के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं कि स्क्रिप्ट लिखने से लेकर स्क्रीन पर आने तक, फिल्म किन-किन पड़ाव से गुजरती है। फिल्म निर्माण पर बनी किताब ABC of Film Making में भी बॉलीवुड/हिंदी सिनेमा को लेकर जानकारी दी गई है।

1- स्क्रिप्ट से होती है कहानी की शुरुआत

हर फिल्म की जान उसकी कहानी होती है। सबसे पहले किसी लेखक के दिमाग में एक आइडिया आता है। उस आइडिया को कहानी का रूप दिया जाता है और फिर उसे स्क्रीनप्ले में बदला जाता है। ये वो समय होता है जब कहानी के साथ-साथ ये भी सोचा जाता है कि-

किरदार कौन होंगे?

कहानी को कहां शूट किया जाएगा?

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डायलॉग कैसे होंगे?

ये सब स्क्रिप्ट में तय होता है। अगर स्क्रिप्ट मजबूत है, तो आधी जीत यहीं मिल जाती है।

2- प्री-प्रोडक्शन

स्क्रिप्ट तैयार होने के बाद शुरू होता है प्लानिंग का दौर। जिसे फिल्ममेकिंग की भाषा में प्री-प्रोडक्शन बोला जाता है। इसमें तय होता है कास्टिंग यानी किन-किन कलाकारों को किस रोल में लिया जाएगा। फिर लोकेशन फाइनल होती है, फिल्म का बजट तय होता है और शूटिंग का शेड्यूल बनता है। डायरेक्टर और प्रोड्यूसर मिलकर पूरी टीम तैयार करते हैं। यह वह स्टेज है जहां हर कहानी कागज से हकीकत की ओर बढ़ती है।

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3- प्रोडक्शन – लाइट, कैमरा, एक्शन!

  1. इसके बाद शुरू होता है बड़ा खेल यानी फिल्म का निर्माण और शुरू होती है शूटिंग। सेट पर डायरेक्टर एक्शन बोलता है और कैमरा चल पड़ता है। इस स्टेज पर आकर निर्मात, निर्देशक और एक्टर्स के साथ-साथ कई टीमें काम पर लग जाती हैं। जैसे- कैमरा टीम, लाइटिंग टीम,मेकअप और कॉस्ट्यूम की टीम, साउंड रिकॉर्डिंग वाले और आर्ट डायरेक्टर्स। ये पड़ाव काफी मेहनत भरा होता है। एक छोटा-सा सीन भी कई बार रीटेक के बाद परफेक्ट बनता है। जो सीन हमें दो मिनट का दिखता है, उसे शूट करने में पूरा दिन लग सकता है।

4- पोस्ट-प्रोडक्शन

इसके बाद होता है पोस्ट-प्रोडक्शन और इसमें शुरू होती है शूट किए सारे सीन की एडिटिंग। शूटिंग खत्म होने के बाद फिल्म एडिटिंग रूम में जाती है। फालतू हिस्से काटे जाते हैं और सीन को सही क्रम में जोड़ा जाता है। सीन में बैकग्राउंड म्यूजिक डाला जाता है, साउंड इफेक्ट्स और डबिंग होती है, जरूरत हो तो वीएफएक्स जोड़े जाते हैं। ये बेहद जरूरी हिस्सा होता है, क्योंकि एडिटिंग ही तय करती है कि फिल्म दर्शकों को बांधे रखेगी या नहीं।

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5- मार्केटिंग और रिलीज

फिल्म बन जाने के बाद असली परीक्षा शुरू होती है कि इसे दर्शकों तक कैसे पहुंचाया जाए। जो हम फिल्म के टीजर से लेकर ट्रेलर और प्रमोशन देखते हैं ये सब मार्केटिंग ही होती है। इसमें ट्रेलर रिलीज होते हैं, पोस्टर लॉन्च होते हैं, एक्टर्स-डायरेक्टर्स इंटरव्यू देते हैं और अब X, इंस्टाग्राम और फेसबुक के जमाने में सोशल मीडिया कैंपेन भी होते हैं। थिएटर रिलीज या ओटीटी रिलीज का फैसला भी इसी समय होता है।

6- दर्शक

  1. आखिर में फैसला दर्शकों के हाथ में होता है। अगर कहानी दिल छू ले, किरदार याद रह जाएं और गाने जुबान पर चढ़ जाएं, तो फिल्म हिट हो जाती है। वरना बड़े बजट की फिल्म भी फ्लॉप हो सकती है। जी हां! आप हम जैसे लोग भी एक फिल्म के लिए अहम होते हैं।

एक्टिंग के बारे में जानकारी

हम बड़े या छोटे पर्दे पर अक्सर एक्टर्स को एक्टिंग करते देखते हैं और समझते हैं कि वो अभिनय कर रहे हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उनका अभिनय किस तरह का है? ये बात अच्छी या बुरी की नहीं, बल्कि एक्टिंग की अलग-अलग स्टाइल की है।

मनोरंजन की दुनिया में अक्सर कहा जाता है कि कोई अभिनेता कमर्शियल एक्टिंग करता है और कोई मेथड एक्टिंग। दोनों ही तरीके दर्शकों का मनोरंजन करते हैं, लेकिन तरीका और मकसद पूरी तरह अलग होता है। आज हम आसान और सीधे शब्दों में बताते हैं कि ये दो स्टाइल्स कैसे अलग हैं। पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…