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मनोज कुमार: लड़की की डांट खाकर छोड़ी सिगरेट की लत, अधूरी ही रही एक ख्‍वाहिश

फिल्मों के जरिये देश की आत्मा से दर्शकों को रूबरू कराने वाले मनोज कुमार 24 जुलाई 2018 को 81 वर्ष के हो गए। मनोज कुमार का असली नाम हरिकिशन गिरि गोस्वामी है लेकिन उन्हें भारत कुमार भी कहा जाता है और इस नाम को वह एक ऐसा बोझ मानते है जो ईश्वर और जनता का दिया हुआ आशीर्वाद भी है। मनोज कुमार ने राज्यसभा टीवी को दिए एक इंटरव्यू में इस नाम से जुड़ी दिलचस्प कहानी सुनाई थी जिसकी वजह से उनकी सिगरेट पीने की आदत छूट गई थी।

Author Published on: July 24, 2018 12:39 AM
अभिनेता मनोज कुमार की फाइल फोटोज। (फोटो सोर्स- Facebook/Manoj Kumar)

फिल्मों के जरिये देश की आत्मा से दर्शकों को रूबरू कराने वाले मनोज कुमार 24 जुलाई 2018 को 81 वर्ष के हो गए। मनोज कुमार का असली नाम हरिकिशन गिरि गोस्वामी है लेकिन उन्हें भारत कुमार भी कहा जाता है और इस नाम को वह एक ऐसा बोझ मानते है जो ईश्वर और जनता का दिया हुआ आशीर्वाद भी है। मनोज कुमार ने राज्यसभा टीवी को दिए एक इंटरव्यू में इस नाम से जुड़ी दिलचस्प कहानी सुनाई थी जिसकी वजह से उनकी सिगरेट पीने की आदत छूट गई थी। इंटरव्यू में मनोज कुमार एक जगह बताते हैं, ”बहुत साल पहले मैं परिवार के साथ रेस्टोरेंट में खाना खाने गया, सिगरेट का तब शौक था, सिगरेट पिया.. एक नौजवान लड़की आई और उसने मुझे डांटा- ”आप भारत होकर सिगरेट पी रहे हो, आर्न्ट यू असेम्ड?”, उसके बाद जो फिल्में कीं, उसमें मैंने एक हीरोइन को टच भी किया.. कि सीरियस बात कर रहा है.. तो ये चीप न हो जाए, जब सिगरेट पीता था तो छुपके.. कोई फोटोग्राफर फोटो न खींच ले। उन्होंने सुधारा मेरे को.. बड़ा बोझ है इस नाम का मुझ पे, जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारियां डालता है ये, डालो.. भारत कुमार भी आशीर्वाद है, ईश्वर का, जनता का, बोझ भी आशीर्वाद है, तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा।”

भारतीय सिनेमा को अर्से तक देशभक्ति का पर्याय बनाए रहे मनोज कुमार ने ‘शहीद’, ‘उपकार’, ‘पूरब और पश्चिम’ और ‘क्रांति’ जैसी देशभक्ति पर आधारित एक से बढ़कर एक फिल्में कीं, जिसका नतीजा यह हुआ कि फैन्स उन्हें भारत कुमार पुकारने लगे। जी तोड़ संघर्ष के बाद सिनेमा ने मनोज कुमार को गले लगा लिया और उनके पास शोहरत और दौलत की फिर कभी कमी नहीं रही लेकिन एक ख्वाहिश बनी ही रही जो कभी पूरी न हो सकी।

राज्यसभा टीवी को दिए इंटरव्यू में मनोज कुमार ने इसका जिक्र किया था। एक जगह वह बताते हैं, ”मैं दिल्ली में अपनी चाची से कहता था.. मैं बंबई जाऊंगा, एक्टर बनूंगा, सफेद बंगला होगा, सफेद गाड़ी होगी, सफेद कुर्ता होगा, सफेद धोती होगी और एक कमरे में बैठके सितार बजाया करूंगा, बांसुरी बजा लेता था, जब सबकुछ हो गया तो चाची मेरी कहने लगीं, ”सितार बाकी रह गई”। बाकी जो सोचा था वो पूरा हो गया.. सितार बजाना बाकी रह गया। अब लगता है ऊपरवाला मेरी सितार बजा रहा है.. पीठ दर्द देके..।”

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