आमिर खान की सुपरहिट फिल्म ‘लगान’ अपनी रिलीज के 25 साल पूरे करने जा रही है। इस खास मौके पर ऑस्कर के लिए नॉमिनेट हुई यह पीरियड स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्म 12 से 14 जून तक फिर से सिनेमाघरों में दिखाई जाएगी।

पिछले 25 सालों में ‘लगान’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की पहचान बन गई है। फिल्म की कहानी के साथ-साथ इसका संगीत भी लोगों के दिलों में खास जगह रखता है। ‘चले चलो’ जैसा जोश भर देने वाला गाना हो या ‘राधा कैसे न जले’ जैसा मस्तीभरा गीत, ए.आर. रहमान का संगीत आज भी उतना ही पसंद किया जाता है जितना फिल्म की रिलीज के समय था।

इसी खास मौके पर मई में स्पॉटिफाई ने ‘लगान’ के 25 साल पूरे होने का जश्न मनाते हुए अपनी वीडियो सीरीज ‘बिहाइंड द बीट्स’ का पहला लाइव रिकॉर्डिंग एपिसोड आयोजित किया। इस सीरीज में भारतीय सिनेमा के यादगार गानों और फिल्मों के पीछे की कहानियां सामने लाई जाती हैं। साथ ही, उन कलाकारों और संगीतकारों से बातचीत की जाती है जिन्होंने इन शानदार साउंडट्रैक्स को तैयार किया और अपनी रचनात्मक यात्रा के दिलचस्प अनुभव साझा किए।

फिल्म के संगीत से जुड़े कई दिलचस्प किस्सों पर बात करते हुए आमिर खान, ए.आर. रहमान और बाकी टीम ने रचनात्मक प्रयोगों, आपसी मतभेदों और एल्बम के सबसे लोकप्रिय गानों के पीछे की कहानियां शेयर कीं। इस बातचीत ने दर्शकों को यह जानने का मौका दिया कि भारतीय सिनेमा के सबसे यादगार म्यूजिक एल्बमों में से एक को बनाने का सफर कैसा रहा था।

साउंडट्रैक को याद करते हुए आमिर खान ने बताया कि ‘घनन घनन’ वह पहला गाना था जो उन्होंने फिल्म के लिए सुना था और पहली ही बार में यह उनके दिल को छू गया था। आमिर ने कहा कि इस गीत ने उन्हें तुरंत महसूस करा दिया था कि ‘लगान’ का संगीत कुछ बेहद खास होने वाला है।

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द हॉलीवुड रिपोर्टर इंडिया के मुताबिक, आमिर ने कहा, “यह ‘लगान’ का पहला गाना था जो मैंने सुना था और इसे सुनते ही मैं इसका फैन हो गया। यह गाना फिल्म के लिए बहुत अहम था, क्योंकि इसकी मदद से दर्शकों को शुरुआत में ही समझाना था कि पानी गांववालों के लिए कितना जरूरी है। पूरी कहानी इसी मुद्दे के इर्द-गिर्द घूमती है।”

उन्होंने यह भी कहा कि ए.आर. रहमान की धुन ने बारिश के बादलों को देखकर पैदा होने वाली उम्मीद और बारिश न होने पर होने वाली निराशा, दोनों भावनाओं को बेहद खूबसूरती से पेश किया है।

वहीं, निर्देशक आशुतोष गोवारिकर ने ए.आर. रहमान के काम करने के अनोखे अंदाज को याद करते हुए बताया कि संगीतकार ने उन्हें कोई तैयार गाना नहीं सुनाया था। इसके बजाय उन्होंने करीब तीन घंटे का संगीत सुनाया और टीम से कहा कि जो हिस्से पसंद आएं, उन्हें चुन लें। गोवारिकर के मुताबिक, गाने की धुन काफी पहले तैयार हो चुकी थी, लेकिन उसके बोल बाद में आए।

उन्होंने कहा, “फिर मुझे जावेद साहब का फोन आया और उन्होंने गीत के बोल सुनाए। वह अनुभव अविश्वसनीय था।” गोवारिकर के अनुसार, जब जावेद अख्तर ने धुन पर लिखे गए शब्द सुनाए, तब जाकर गाना पूरी तरह जीवंत हो उठा और टीम को एहसास हुआ कि वे कुछ बेहद खास रच रहे हैं।

इस बातचीत में सबसे दिलचस्प खुलासों में से एक ‘ओ रे छोरी’ को लेकर हुआ। ए.आर. रहमान ने बताया कि यह गाना शुरुआत में ‘लगान’ के लिए नहीं, बल्कि उनके मशहूर एल्बम ‘मां तुझे सलाम’ के लिए तैयार किया गया था।

रहमान ने कहा, “असल में यह धुन ‘मां तुझे सलाम’ के लिए बनाई गई थी, ‘लगान’ के लिए नहीं। उस समय इसका टेम्पो भी काफी धीमा था और आमिर को यह खास पसंद नहीं आई थी।”

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रहमान ने याद करते हुए बताया कि आमिर खान ने उनसे इस गाने पर दोबारा काम करने को कहा था। उनका मानना था कि उस दौर की फिल्मों के रोमांटिक गानों का स्तर काफी ऊंचा हो चुका है, इसलिए इस धुन में और ऊर्जा की जरूरत थी। इसके बाद गाने को नया रूप दिया गया और इसका तेज व ज्यादा जीवंत संस्करण फिल्म में शामिल किया गया।

इस दौरान आमिर खान ने भी गाने से जुड़ा एक राज साझा किया। उन्होंने कहा, “शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि इस गाने के अंग्रेजी बोल फरहान और जोया अख्तर ने लिखे थे।”

आमिर की यह बात सुनकर गीतकार जावेद अख्तर ने मजाकिया अंदाज में जवाब दिया, जिसे सुनकर वहां मौजूद दर्शक ठहाके लगाने लगे। जावेद अख्तर ने कहा, “हां, बच्चों को पढ़ाने-लिखाने और कॉलेज भेजने के कुछ फायदे तो होते ही हैं।” उनकी इस टिप्पणी पर पूरा हॉल हंसी से गूंज उठा।

‘मितवा’ का आइकॉनिक हुक कैसे बना?

फिल्म के लोकप्रिय गीत ‘मितवा’ पर बात करते हुए जावेद अख्तर ने एक दिलचस्प खुलासा किया। उन्होंने बताया कि जिस शब्द ने बाद में इस गाने की पहचान बना ली, वह शुरुआत में गीत का हिस्सा ही नहीं था।

जावेद अख्तर ने कहा, “असल में ‘मितवा’ शब्द गाने में रखने का कोई इरादा नहीं था। लेकिन रहमान ने मुझसे कहा कि यहां एक ऐसा शब्द चाहिए जो गाने का हुक बने और लोगों के दिमाग में बस जाए। तभी ‘मितवा’ शब्द आया।”

उन्होंने ए.आर. रहमान की संगीत समझ की तारीफ करते हुए कहा कि उस समय हिंदी पर उनकी पकड़ बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन संगीत को लेकर उनकी समझ और संवेदनशीलता कमाल की थी। जावेद के मुताबिक, रहमान को बखूबी पता था कि गाने में किस जगह किस तरह के शब्द की जरूरत है, और यही उनकी सबसे बड़ी खासियत थी।

यही वजह है कि ‘मितवा’ सिर्फ एक शब्द नहीं रहा, बल्कि गाने की पहचान बन गया और आज भी ‘लगान’ के सबसे यादगार गीतों में गिना जाता है।

‘ओ पालनहारे’ लिखना सबसे मुश्किल था

जावेद अख्तर ने बताया कि पूरे एल्बम में ‘ओ पालनहारे’ वह गीत था, जिसे लिखना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हुआ। उन्होंने कहा, “जब लोग मुझसे पूछते हैं कि कौन-सा गाना लिखना सबसे कठिन था, तो मैं हमेशा ‘ओ पालनहारे’ का नाम लेता हूं।”

जावेद के मुताबिक, रहमान की धुन में ऐसी भक्ति और आध्यात्मिकता थी, जिसे कोई भी व्यक्ति महसूस कर सकता था, चाहे उसकी भाषा या बैकग्राउंड कुछ भी हो।

उन्होंने कहा, “मैं खुद नास्तिक हूं, लेकिन इस गीत को लिखने के लिए मुझे अपने भीतर मासूमियत और समर्पण का भाव ढूंढना पड़ा। ऐसे गाने सिर्फ तकनीक से नहीं, बल्कि सच्चे एहसास और सादगी से लिखे जाते हैं।”

वहीं ए.आर. रहमान ने कहा कि उनकी हमेशा कोशिश थी कि ‘लगान’ का संगीत समय की कसौटी पर खरा उतरे और वर्षों बाद भी उतना ही ताजा महसूस हो।
उन्होंने कहा, “मैं चाहता था कि इस फिल्म का संगीत कालजयी बने और खुशी की बात है कि ऐसा हुआ।” रहमान ने बताया कि इसी सोच के चलते उन्होंने गानों के लिए महान गायिकाओं लता मंगेशकर और आशा भोसले को चुना।

15 जून 2001 को रिलीज हुई ‘लगान’ आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित और पसंदीदा फिल्मों में शुमार है। रिलीज के 25 साल बाद भी इसकी कहानी, किरदार और गाने दर्शकों के दिलों में उसी तरह बसे हुए हैं, जैसे पहली बार रिलीज के समय थे।