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कला : पीड़ा की श्वेत-श्याम तस्वीरें

लाडो सराय स्थित कलादीर्घा ‘आर्ट डिस्ट्रिक्ट 13’ में इन दिनों सुभाकर ताडी के श्वेत-श्याम चित्रों की प्रदर्शनी चल रही है। प्रदर्शनी का शीर्षक है ‘श्याम आयाम’..

Author नई दिल्ली | December 10, 2015 23:02 pm

लाडो सराय स्थित कलादीर्घा ‘आर्ट डिस्ट्रिक्ट 13’ में इन दिनों सुभाकर ताडी के श्वेत-श्याम चित्रों की प्रदर्शनी चल रही है। प्रदर्शनी का शीर्षक है ‘श्याम आयाम’। ऐसे रंगों के चित्रों को देखकर पिकासो का ‘गेर्निका’ याद आ जाए यह स्वाभाविक है। स्पेन के माड्रिड शहर के संग्रहालय में इसे देखा था। देखते ही मैं ठिठक गई थी। साल 1937 में बना हुआ 39 गुणा 776 सेमी का भीत्तिचित्रनुमा यह तैलचित्र केवल काला, सफेद और धूसर रंगों से बनाया गया था। ये रंग युद्ध के कारण व्याप्त त्रासदी, पीड़ा और दुर्व्यवस्था के परिचायक थे। फ्रांसिस न्यूटन सूजा ने भी काले चित्र बनाए थे।

सुभाकर कहते हैं कि वे खुद छापाकला करते थे। उनके एचिंग श्वेत-श्याम हुआ करते थे। उसी के विस्तार स्वरूप ये चित्र हैं। पिकासो और सूजा की तरह सुभाकर ने भी काले रंग का प्रयोग अपना विरोध दर्ज कराने के लिए किया है। विकास के नाम पर बनाई जाती इमारतें और निरर्थक निर्माण कार्य लोगों के जीवन में अवरोध खड़े करते हैं। जीवन के यथार्थ के इस अंधेरे या काले पहलू को सुभाकर ने कैनवास पर उतारा है। अपने परिवेश और अपने अनुभवों को एक्रिलिक रंगों का स्प्रे करके, छायाचित्र जैसे दिखाई देते चित्रों में चित्रित किया है।

‘काला चित्रकार’ और ‘खिड़की’ शीर्षक के कई चित्र हैं। उनमें से कुछ को देखते हैं। 72 गुणा 54 इंच का एक खड़ा चित्र है ‘खिड़की’। कमरे के भीतर का दृश्य है। बड़ी खिड़की है, अंदर धूसर रंग है और बाहर काला है। खिड़की के ऊपर लगा पर्दा सफेद है। नीचे तीन पहियोंवाला छोटा ट्राइसिकल है। छोटा सा एक जूता पड़ा है। एक टेबिल है। उस पर से काला रंग टपक रहा है। टेबिल के ऊपर सफेद रंग के टोप जैसी एक चीज है। उसके ऊपर काले रंग का एक पक्षी बैठा हुआ है। बड़ा उदास, दुखी नजारा है।
54 गुणा 72 इंच का एक आड़ा चित्र है ‘काला चित्रकार’। चित्र के नीचे के काले हिस्से में और भी घने काले रंग के दो पशुओं के कंकाल चित्रित हैं। ऊपर मकान की दीवार दिख रही है। दीवार के इस सपाट काले खंड के ऊपर स्वच्छ शुभ्र बादल हैं। उस बादल के सामने एक बड़ा काले रंग का पक्षी उड़ रहा है। आकाश में और भी काले पक्षी दूर-दूर उड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। जब रोशनी पीछे हो तो सामने की आकृतियां अंधेरे के कारण काली दिखाई देती हैं, कुछ ऐसा ही, तिमिरचित्र जैसा है यह चित्र। श्वेत-श्याम छायाचित्रों में इस प्रकार की संरचना रोचक लगती है। सुभाकर तो कहते ही हैं कि वे छायाचित्र का आभास उत्पन्न करना चाहते हैं।

वर्ष 1980 में सुभाकर का जन्म आंध्र प्रदेश में हुआ था। विशाखापट्टनम के आंध्र विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग में उन्होंने छापाकला की शिक्षा ली और स्नातक बने। बाद में वडोदरा आए, एमएस विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग में वर्ष 2004 में छापाकला की उच्च शिक्षा प्राप्त की और मास्टर्स आॅफ फाइन आर्ट की डिग्री प्राप्त की। तब से सुभाकर वहीं बस गए हैं। वर्ष 2005 से प्रदर्शनियों में हिस्सा ले रहे हैं, उनकी कलाकृतियों की एकल प्रदर्शनियां भी मुंबई, दिल्ली, वडोदरा में आयोजित हुई हैं।

चित्रों में उड़ते हुए या बैठे हुए काले पक्षी और भीतर की हड्डियों को दिखाते हुए चित्रित प्राणी नकारात्मक भाव को और भी तीव्र कर देते हैं। प्राय: सभी चित्रों में ये उपस्थित हैं। 54 गुणा 90 इंच का एक और चित्र है ‘खिड़की’। इस आड़े चित्र में दो काली खिड़कियां हैं। बीच में एक टेबिल। पीछे की कुर्सी पर एक लड़की बैठी है ऐसा उसके पैरों से पता चलता है। टेबिल के ऊपरी हिस्से में उसके चेहरे और धड़ के स्थान पर एक छोटा सा घर जैसा आकार है जो उस लड़की के एक हाथ के सहारे से टिकाया गया है। उसके बड़े-बड़े दांत और फैले हुए दोनों हाथ मानों अपनी ताकत को प्रदर्शित कर रहे हैं। चित्र में बार्इं ओर एक निरीह कुत्ता बैठा हुआ है, उस लड़की को देख रहा है। सब कुछ आम है, और फिर भी खास है। यह प्रदर्शनी 15 दिसंबर तक चलेगी।

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