‘वैज्ञानिक समझ ही नहीं पाए कि कृपा यहां रुकी है’, प्रज्ञा ठाकुर बोलीं कोरोना खत्म करने के लिए हनुमान चालीसा पढ़ें तो कुमार विश्वास ने दिया जवाब

एक यूजर ने कुमार विश्वास को जवाब देते हुए कहा कि इसमें हर्ज ही क्या है? लिखा, कुमार साहब अगर घर पर रह कर हनुमान चालीसा पढ़ते भी हैं तो इसमें बुराई क्या है? प्रज्ञा ठाकुर ने कहा है तो इसका उपहास उड़ाना ही है, यह कहां तक उचित है...

Kumar Vishwas, bjp mp Pragya singh Thakur, Hanuman Chalisa.साध्वी के बयान पर तंज सकते हुए कुमार विश्वास ने कहा कि मैंने भी सदा ही कहा है सरकारों से किसी भी प्रकार की उम्मीद लगाना अपने आप से बेईमानी होगी

भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने शनिवार को लोगों से आह्वान करते हुए कहा कि देश से कोरोना महामारी को समाप्त करने के लिए वे ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ करें। बीजेपी सांसद के इस बयान को लेकर उनकी सोसश मीडिया पर काफी खिंचाई हो रही है। वहीं कुमार विश्वास ने भी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के इस आह्वान का तंज लहजे में जवाब दिया है।

प्रज्ञा ठाकुर ने शनिवार ट्वीट किया, ‘आइए हम सब मिलकर कोरोना महामारी को समाप्त करने व लोगों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए आध्यात्मिक प्रयास करें। 25 जुलाई से 5 अगस्त तक प्रतिदिन शाम 7:00 बजे अपने घरों में हनुमान चालीसा का 5 बार पाठ करें।’ कुमार विश्वास ने इसके जवाब में तंज कसते हुए लिखा कि मैंने तो सदा ही कहा है कि हमारे टैक्स से पल रही निर्वाचित-सरकारों से उम्मीद लगाना बेमानी है।

कुमार विश्वास ने आगे लिखा, ‘विश्वविद्यालय,रूस, USA,चीन व भारत सहित वैक्सीन की खोज में लगे दुनिया-भर के वैज्ञानिकों के लिए राहत की खबर। बेचारे वैज्ञानिक जान ही न पाए कि बड़ी वाली कृपा यहाँ रुकी हुई थी। कुमार विश्वास के इस ट्वीट पर यूजर्स की भी खूब प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।’

एक यूजर ने कुमार विश्वास को जवाब देते हुए लिखा, ‘मैंने भी सदा ही कहा है सरकारों से किसी भी प्रकार की उम्मीद लगाना अपने आप से बेईमानी होगी। क्योंकि सरकार कोई सी भी हो कोई ना कोई ऐसे मिल ही जाते हैं या तो पानी से करंट निकाल देते हैं या तो ऐसे बचकाने बयान देते हैं बचना है तो खुद उपाय करो।’

इसके साथ ही एक यूजर ने कुमार विश्वास को जवाब देते हुए कहा कि इसमें हर्ज ही क्या है? लिखा, ‘कुमार साहब अगर घर पर रह कर हनुमान चालीसा पढ़ते भी हैं तो इसमें बुराई क्या है? प्रज्ञा ठाकुर ने कहा है तो इसका उपहास उड़ाना ही है, यह कहां तक उचित है, फिर जहाँ दवा काम नहीं करती है वहा दुआ काम करती है। यही तो हमारी संस्कृति है। नहीं तो फिर मंदिरों की भी जरूरत ही क्या है?’

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