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किशोर कुमार, मधुबाला के प्यार में क्या था कैमरा मैन का रोल? क्यों अंतिम समय में मधुबाला से मिलने भी नहीं जाते थे किशोर?

23 फरवरी, 1969…. मुंबई के जेवीपीडी स्कीम स्थित गौरी कुंज बंगले में मातम पसरा था…घर की मालकिन और इंडियन सिनेमा की मार्लिन मुनरो के नाम से पहचानी जाने वाली मधुबाला अंतिम सांसें ले रहीं थीं… नीयती इस खूबसूरत आंखों को हमेशा हमेशा के लिए बंद करने को तैयार बैठी थी, मगर मधुबाला को ज़िद थी […]

Author Updated: February 18, 2021 10:59 AM

23 फरवरी, 1969…. मुंबई के जेवीपीडी स्कीम स्थित गौरी कुंज बंगले में मातम पसरा था…घर की मालकिन और इंडियन सिनेमा की मार्लिन मुनरो के नाम से पहचानी जाने वाली मधुबाला अंतिम सांसें ले रहीं थीं… नीयती इस खूबसूरत आंखों को हमेशा हमेशा के लिए बंद करने को तैयार बैठी थी, मगर मधुबाला को ज़िद थी कि मरने से पहले अपने प्यार, अपने पति किशोर कुमार को एक नज़र जी भर के देख ले…मगर वो हसरत दिल ही में लिए मधुबाला महज 36 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गई…किशोर नहीं आए…दरअसल किशोर पिछले कई हफ्तों से बीमारी से तड़पती मधुबाला को देखने नहीं आए थे…उस मधुबाला को जिसे वो खुद से भी ज्यादा प्यार करने का दावा करते थे…उस मधुबाला को जिसने अपनी सारी ज़िंदगी किशोर के नाम निछावर कर दी थी… आखिर इन दोनों की प्रेम कहानी का ऐसा ट्रैजिक अंत कैसे हुए…या फिर असलियत कुछ और है…

किशोर और मधुबाला की ज़िंदगी के इसी राज़ से पर्दा उठाने के लिए बरसों पहले फिल्म जर्नलिस्टों की एक टीम मधुबाला की बहन मधुर भूषण से मिली….बेहद ही सौम्य महिला। बातचीत के दौरान मधुर भूषण जब जब मधुबाला और दिलीप की बात करतीं तो उनकी आंखें चमक उठती । वो बार बार कहती रहीं कि “काश आपने उन्हें साथ देखा होता। वो तो बस एक दूसरे के लिए ही बने थे।” वो उन दोनों के किस्से, उनकी कैमिस्ट्री पर बात करती रही। मगर पत्रकारों ने जब जब किशोर कुमार का जिक्र छेड़ा तो वो गरिमापूर्ण तरीके से किशोर से किनारा कर गईं। क्योंकि किशोर भी इस दुनिया में नहीं हैं तो इसलिए उन पर कुछ बोलना उन्हें ठीक नहीं लगा। ज़ाहिर सी बात थी किशोर के लिए उनके पास कुछ ज्यादा अच्छा बोलने को था नहीं..मगर उनकी बातों से साफ समझा जा सकता था कि किशोर कुमार से मधुबाला के परिवार को कितनी नाराजगी रही होगी। तो क्या यही किशोर-मधुबाला की प्रेम कहानी का सच था…

पत्रकारों की उस टोली को मधुबाला से जुड़े किस्से तो सुनने को मिल गए थे, मगर उनके सवाल का जवाब नहीं मिला था…सवाल किशोर और मधुबाला के रिश्तों की सच्चाई का…मधुबाला की ज़िंदगी का एक हिस्सा मिला था दूसरे हिस्से पर कोई बात करने वाला नहीं था। दिलीप के जाने के बाद किशोर कैसे उनकी ज़िंदगी में आए और फिर आखिर में क्या हुआ ?

वो पत्रकार मुबई की खाक छान रहे थे..कोई मिल नहीं रहा था..। ढूंढने की कोशिश चल रही थी ‘चलती का नाम गाड़ी’ के सिनेमेटोग्राफर आलेके दासगु्प्ता को। सुना था मधुबाला और किशोर कुमार की प्रेम कहानी के सबसे पहले गवाह वही थे। आलोके दासगुप्ता ने शक्ति सामंत के साथ अनेक फिल्में की थी। लेकिन सितारों की नगरी में लगभग 85 साल के उस शख्स को अब कोई नहीं जानता था। वो जीवित हैं या नहीं ये भी किसी को नहीं खबर थी। फिर गूगल पर सर्च के दौरान एक शख्स का ब्लॉग दिखा जिसमें उसने अपने एक पड़ोसी का ज़िक्र किया था ,आलेके दासगुप्ता का। साथ में घर की खड़की से मलाड़ बस अड्डे की तस्वीर डाली हुई थी। तस्वीर से लोकेशन का अंदाज़ा लगा कर एक सोसाइटी वो टीम वहां जा पहुंची। उन्होंने बिल्डिंग के नीचे खड़े हो कर शक्ति सामंत को फोन कर के आलोके के बारे में पूछा…शक्ति सामंत बोले “यार नहीं पता कि आलोके कहां रहते हैं, ज़िंदा हैं भी कि नहीं …सालों पुराना एक नंबर है उसका पता नहीं फोन बजेगा कि नहीं।” फोन नंबर मिला..घंटी भी बजी और आलेके दासगुप्ता ने फोन भी उठाया..। पर कह दिया बिज़ी हूं,शाम को मिलना।

उस दिन शाम को आलेके ने बताया कि कैसे मधुबाला के टूटे हुए दिल को किशोर से प्यार हो गया। उन्होंने बताया कि “मधुबाला हमेशा हंसी ठिठौली करने वाली, चहकती, खिलखिलाती और दिल से बेहद रोमांटिक महिला थी…क्योंकि मैं किशोर का अच्छा दोस्त था इसलिए मधुबाला ने ‘चलती का नाम गाड़ी’ के सेट पर प्यार का पहला पैगाम मेरे हाथों से ही किशोर को पहुंचाया था। मतलब ये कि किशोर से रिश्ते की पहल मधुबाला ने ही की थी। आलोके इस नए रिश्ते के सबसे पहले गवाह थे….लेकिन वो किशोर की पहली पत्नी रोमा के भी अच्छे दोस्त थे और इसलिए उन्होंने ग्लानि वश रोमा से मिलना छोड़ दिया। इस बात का उन्हें अफसोस ज़रूर था।

किशोर-मधुबाला के किस्से सुनाते सुनाते आलोके उस मुश्किल सवाल पर आए और कहा कि “मधुबाला की बीमारी से किशोर बेहद दुखी थे…वो पहले रोज़ मधुबाला से मिलने जाते थे, इलाज के लिए मधुबाला को लेकर विदेश भी गए….मगर जब डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए वो फिर वो मधुबाला को तड़पता नहीं देख पाए। वो इतना टूट गए कि उन्होंने खुद को ही अकेला कर दिया…”

कहानी खत्म होते होते यही समझ आया कि मधुबाला का कोई गुनहगार नहीं था…सच है ‘दिल के दर्द’ ने ही मधुबाला की जान ली है। पत्रकारों की टीम ने उस कब्रिस्तान का चक्कर भी काटा जहां मधुबाला की कब्र तहस नहस होने जा रही थी…। जो बाद में खत्म भी कर दी गई..ताकि नई कब्रों के लिए जगह बन पाए। यानि यह कि उसे ना जीते जी चैन मयस्सर हुआ और ना मर के…

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