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‘सारागढ़ी’ पर बनी अक्षय कुमार की Kesari में बेवजह दिखाई गई हैं ये चंद बातें!

Akshay Kumar KESARI: 3 दिन में ये फिल्म 55 करोड़ से ज्यादा की कमाई कर चुकी है। फिल्म दर्शकों को अंदर तक महसूस हो रही है। फिल्म दर्शकों को हंसा भी रही है रुला भी रही है। फिल्म देखने के बाद फैन्स जब थिएटर्स से बाहर निकल रहे हैं तो जोश और जज्बे से ओतप्रोत दिख रहे हैं। लेकिन...

Author Updated: March 24, 2019 5:20 PM
अक्षय कुमार की फिल्म ‘केसरी’

Akshay Kumar Starrer KESARI: अक्षय कुमार की फिल्म ‘केसरी’ 21 मार्च को रिलीज हो चुकी है। फिल्म ने आते ही सिनेमाघरों में धमाल मचा दिया है। दर्शक इस फिल्म को बेहद पसंद कर रहे हैं। 3 दिन में ये फिल्म 55 करोड़ से ज्यादा की कमाई कर चुकी है। फिल्म दर्शकों को अंदर तक महसूस हो रही है। फिल्म दर्शकों को हंसा भी रही है रुला भी रही है। फिल्म देखने के बाद फैन्स जब थिएटर्स से बाहर निकल रहे हैं तो जोश और जज्बे से ओतप्रोत दिख रहे हैं।

फिल्म की कहानी की बात की जाए तो फिल्म सारागढ़ी युद्ध पृष्ठभूमि पर आधारित है। जानकारों के मुताबिक 21 बहादुर सिख जवानों की इस कहानी को जिसमें वह 10 हजार अफगानी हमलावरों से आखरी सांस तक लड़ते दिखाए गए हैं, इसमें काफी कुछ मॉडीफाई किया गया है। फिल्म के कुछ सीन्स को काल्पनिक रूप दिया गया है और फिर दर्शकों के समक्ष पर्दे पर उतारा गया है।

कैप्टन जय सिंह सोहल ने सारागढ़ी के युद्ध पर किताब लिखी है। Saragarhi: The Forgotten Battle के ऑर्थर का कहना है कि हवलदार ईशर सिंह को सारागढ़ी के लिए अकेले रवाना नहीं किया गया था। फिल्म में दिखाया जाता है कि अंग्रेजी हुकूमत ईशर सिंह को सारागढ़ी अकेले भेज देती है और वह भी अकेले घूमते फिरते किले में पहुंच जाते हैं। सोहल ने बताया- ‘साल 1895 में पूरी सिख रेजीमेंट को उत्तर पश्चिमी फ्रंट पर जाना था। उन्हें आदेश दिया गया था कि वे सभी दिसंबर 1896 तक पेशावर में ही रहेंगे। ऐसे में ईशर सिंह अपने साथियों के साथ वहां पहुंचे थे।’

सोहल ने फिल्म में अक्षय की केसरी पगड़ी के बारे में भी कहा कि जिस केसरी रंग की पगड़ी पहने अक्षय को दिखाया गया है, ऐसा कुछ था ही नहीं। पगड़ी का रंग खाकी ही हुआ करता था। केसरी खालसा का रंग है तो पगड़ी केसरी रंग की पहनने का सवाल ही नहीं था।

फिल्म में कई डायलॉग्स हैं जिन्हें सुनते ही मन जोश से भर जाता है। फिल्म में जंग से पहले सिख सिपाहियों द्वारा स्थानीय लोगों की मदद करने और हाथ बटाने के लिए मस्जिद बनाई जाती है। वहीं जंग के वक्त अफगानी हमलावरों से सिपाही ईशर सिंह की बातचीत दिखाई जाती है। सोहल के मुताबिक उस वक्त जवानों के पास इतना समय ही नहीं था कि वह मस्जिद का निर्माण करते। वहीं सिपाहियों को पठानों से बातचीत करने की भी सख्त मनाही थी।

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