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Firangi Movie Review: हंसोड़ की फिल्म में हंसी गायब

इस फिल्म में तीन चीजें नहीं है- इंटरटेनमेंट, इंटरटेनमेंट और इंटरटेनमेंट। फिर आप पूछ सकते हैं कि क्या है इसमें? तो जवाब में यह कहूंगा कि इसमें तीन चीजें हैं- बोरियत, बोरियत और बोरियत।

फिल्म का दृश्य

इस फिल्म में तीन चीजें नहीं है- इंटरटेनमेंट, इंटरटेनमेंट और इंटरटेनमेंट। फिर आप पूछ सकते हैं कि क्या है इसमें? तो जवाब में यह कहूंगा कि इसमें तीन चीजें हैं- बोरियत, बोरियत और बोरियत। फिल्म के हीरो कपिल शर्मा हैं जो टीवी शो में सफल कॉमेडियन है। लेकिन अगर इस फिल्म में आप हास्य खोजेंगे, तो बहुत ढूंढने पर मिलेगा। कपिल शर्मा ने संजीदा भूमिका निभाने की कोशिश की है और उनकी यह कोशिश बुरी तरह असफल हुई है। आखिर जानी लीवर संजीव कुमार तो नहीं बन सकते। यह एक पीरियड फिल्म है और 1921 के इर्दगिर्द की कहानी रखी गई है। फिल्म के केंद्र में पंजाब के एक इलाके में रहनेवाला मंगा (कपिल शर्मा) है, जो आजादी की लड़ाई के उस दौर में अंग्रजों की नौकरी करने लगा है। इसी कारण समाज में उसकी साख कम हो जाती है और उसे अंग्रेजों का पिट्टू समझ लिया जाता है।

मंगा इश्क भी करता है और उसकी प्रेमिका है सरगी (इशिता दत्ता)। यानी हीरो है और हीरोइन भी। खलनायक की कमी है और उसे पूरा किया है कुमुद मिश्रा ने, जिन्होंने राजा इंदरवीर सिंह की भूमिका निभाई है। राजा की निगाह एक गांव की जमीन पर है। वह अंग्रेज अफसर डेनियल ( एडवर्ड सोनेनब्लिक) के साथ मिलकर इस जमीन को हड़पना चाहता है। मंगा डेनियल का मातहत है। जिस जमीन को हड़पने की योजना बनाई जा रही है उसी गांव में मंगा की प्रेमिका सरगी की जमीन भी है। ऐसे में मंगा का दायित्व बनता है वह इस जमीन हड़प अभियान को रोकने की कोशिश करे। क्या वह इसमें कामयाब हो सकेगा? इसी सवाल के इर्दगिर्द फिल्म चलती है।

आप ये भी कह सकते हैं कि घिसटती है। कपिल शर्मा चूंकि खुद इस फिल्म के निर्माता भी है इसलिए इसमें उन्होंने अपने को केंद्र में रखा है और फिल्म के ज्यादातर हिस्से पर उनका ही कब्जा है, यानी अधिकतर वही दिखते हैं। इस वजह से भी फिल्म कमजोर हो गई है। इशिता दत्ता फिल्म की हीरोइन है पर मध्यांतर के बाद लगभग गायब ही हो जाती है और आखिर में आती है। लेकिन राजा की रहमदिल बहन श्यामली की भूमिका में (मोनिका गिल) कुछ बेहतर लगी हैं। हालांकि उनकी अंग्रेजी उस समय के अंग्रजों की तरह नहीं बल्कि आज के अमेरिकियों की तरह है। फिल्म आशुतोष गोवारीकर निर्देशित ‘लगान’ की कहानी की पैरोडी की तरह है। इसकी एक बड़ी कमी ये है कि पीरियड फिल्मों की तरह इसमें तत्कालीन वातावरण को पकड़ने का प्रयास नहीं है। जो गांव है वह भी पूरी तरह का उस वक्त का गांव नहीं लगता।

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