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Kalank Review: नाम बड़े और दर्शन छोटे

ये किस पर लगा कलंक है, निर्देशक अभिषेक बर्मन पर या इस फिल्म के सितारों पर? ‘कलंक’ देखने के बाद नहीं बल्कि उसे देखने के दौरान ही यह सवाल दर्शकों के मन में तुरंत उठता है। और शायद निर्देशक के मन में भी यही प्रश्न उठे। लेकिन अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत। ‘कलंक’ में कई तरह की बेतरतीबियां हैं। एक तो कहानी का सिरपैर समझ में नहीं आता। या यह कहना चाहिए कि बहुत देर से समझ में आता है।

दर्शकों को नहीं पसंद आ रही आलिया-वरुण को कलंक

कलाकार- वरुण धवन, आलिया भट्ट, सोनाक्षी सिन्हा, आदित्य रॉय कपूर, संजय दत्त, माधुरी दीक्षित, कुणाल खेमू

ये किस पर लगा कलंक है, निर्देशक अभिषेक बर्मन पर या इस फिल्म के सितारों पर? ‘कलंक’ देखने के बाद नहीं बल्कि उसे देखने के दौरान ही यह सवाल दर्शकों के मन में तुरंत उठता है। और शायद निर्देशक के मन में भी यही प्रश्न उठे। लेकिन अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत। ‘कलंक’ में कई तरह की बेतरतीबियां हैं। एक तो कहानी का सिरपैर समझ में नहीं आता। या यह कहना चाहिए कि बहुत देर से समझ में आता है। बहरहाल, फिल्म के मुताबिक एक शहर है हुस्नाबाद, जो कभी अविभाजित भारत में हुआ करता था। यहां की एक अल्हड़ लड़की रूप (आलिया भट्ट) गाती बहुत अच्छा है। एक शादीशुदा औरत सत्या (सोनाक्षी सिन्हा) रूप को अपने पति के साथ शादी के लिए तैयार करती है। इसलिए कि सत्या खुद कैंसर से मरनेवाली है और अपने पति से बेइंतिहा प्यार करती है। वह नही चाहती कि उसका पति उसकी मौत के बाद अकेला रहे। किसी तरह रूप की शादी देव (आदित्य रॉय कपूर) से हो जाती है लेकिन पति महोदय शुरू-शुरू में अपनी दूसरी पत्नी का चेहरा भी नहीं देखते। इसलिए कि वो भी अपनी पहली पत्नी को बहुत चाहते हैं भले ही वह मौत के करीब है। इसलिए पहला झोल तो यही है कि देव ने दूसरी लड़की की मांग भरी ही क्यों, अगर उसका चेहरा भी नहीं देखना है तो।

बहरहाल, ऐसी स्थिति में रूप जफर (वरुण धवन) की ओर आकर्षित होती है। मुसलिम जफर पेशे से लोहार है। ताकतवर इतना कि एक गुस्सैल सांड से भी लड़ पड़ता है। वह नाजायज औलाद की तरह पला-बढ़ा है। वह किसकी नाजायज औलाद है? तवायफ बहार बेगम (माधुरी दीक्षित) और देव के पिता बलराज (संजय दत्त) से उसका क्या रिश्ता है? रूप और जफर की मोहब्बत किस मुकाम पर पहुंचेगी? इन सवालों के जवाब तो मिलते हैं लेकिन ढीलेढाले तरीके से।
यहां सिर्फ रिश्तों की पेचीदगियां नहीं है। चूंकि ये भारत के विभाजन के ठीक पहले का वक्त है इसलिए उस समय हुए दंगों का जिक्र है इसमें। राजनीति और इश्क के दो छोरों से गुजरती ये फिल्म किसी घाट पर टिकती नहीं और दिशाहीन हो जाती है। हां, फिल्म आगे बढ़ती रहती है लेकिन उसी तरह जैसे कोई खराब गाड़ी को धक्के मारमार कर आगे ले जाता है।

वरुण धवन, आलिया भट्ट, संजय दत्त, माधुरी दीक्षित और सोनाक्षी सिन्हा जैसे बड़े सितारों के रहने के बावजूद इस में फिल्म न तो इनके अभिनय का रंग जमता है और न किसी तरह का धमाका है। संजय दत्त जैसा अभिनेता निस्तेज लगा है। आलिया भट्ट का चुलबुलापन भी गायब है। कुछ देर के लिए वरुण धवन छाप छोड़ते हैं लेकिन सांड़ से लड़ने वाला उनका दृश्य मजाकिया ज्यादा लगा है। और जहां तक माधुरी दीक्षित का सवाल है लगता है फिल्म बनने के दौरान उन्होंने मेकअफ करने और गहने पहनने में ज्यादा वक्त लगा दिया। पर ये सब अभिनेताओं की समस्या नहीं है। अभिनेता वही करते हैं जो निर्देशक चाहता है या उनके लिए जैसा स्पेस रचता है।

निर्देशक ने न जाने क्यों इसमें इस्पात की फैक्ट्री का मामला भी बीच में ला दिया है। फिल्म की कहानी में यह भी है कि देव अखबार तो निकालता ही है साथ में अलग से इस्पात की फैक्ट्री भी लगाना चाहता है। स्थानीय मुसलमान कारीगर इसका इसलिए विरोध कर रहे हैं कि उनको भय है कि इससे उनके रोजगार छिन जाएंगे। ये सारा मामला बेमेल है। इस तरह ‘कलंक’ में कई तरह की ईंटे और कई तरह के रोड़े जोड़े गए हैं जिससे फिल्म में कही फोकस नहीं बनता है। हां, फिल्म में सिनेमेटोग्राफी बहुत अच्छी हैं और कुछ दृश्य तो लाजबाब हैं।

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