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फिल्म काला की समीक्षा : अशुभ नहीं शुभ का पर्याय ‘काला’

दक्षिण भारत में रजनीकांत के लाखों फैन हैं, लेकिन उत्तर भारत में भी उनके कम मुरीद नहीं है। ऐसे लोग, जो सिनेमाघर में सिर्फ रजनीकांत को देखने जाते हैं। उनको यह फिल्म अच्छी लगेगी क्योंकि रजनीकांत की सभी चिर-परिचित अदाएं फिल्म में हैं। दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में तो उनके फैन उनकी अदाओं पर मर-मिटने तक को तैयार रहते है।

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सुपरस्टार रजनीकांत की नई फिल्म ‘काला’ देखने के बाद दिमाग में दो बातें ठहर जाती हैं। एक तो यह कि रजनीकांत किस कंपनी का च्यवनप्राश खाते हैं? मतलब यह है कि उनमें जबरदस्त ऊर्जा है और इस उम्र में भी वे अपनी उस चुंबकीय ताकत को बचाए हुए हैं जो हर उम्र के दर्शकों, खासकर युवाओं को लुभाती है। रजनीकांत हर वक्त यह साबित करने में लगे रहते हैं कि अभी ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप’ जैसी फिल्म करने का उनका वक्त नहीं आया है। और करें भी क्यों जब वे ‘अभी तो मैं जवान हूं’ जैसे नाम की फिल्म कर सकते हैं। दिमाग में ठहर जाने वाली दूसरी बात यह है कि अस्सी के दशक की फिल्मों के विषय का जादू अभी भी दर्शकों को बांधने में सफल है, बशर्ते उसे परोसने का तरीका और सलीका नया हो। ऐसा ही एक विषय है शहर की झुग्गी-झोपड़ी हटाने को लेकर नायक और खलनायक की जंग। यानी उस बस्ती पर किसी अमीर बिल्डर या भूमाफिया की नजर है, जहां गरीब लोग रहते हैं।

वो भूमाफिया वहां बुलडोजर चलवाकर उस जमीन का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करना चाहता है और ऐसे में उसी बस्ती से एक शख्स सामने आता है जो गरीबों का रहनुमा है और बस्ती पर नापाक नजर रखनेवालों की ऐसी की तैसी कर देता है। ‘काला’ की कहानी भी कमोबेश ऐसी ही है। रजनीकांत ने इसमें कारीकाला उर्फ काला नाम के शख्स का किरदार निभाया है जो तमिलनाडु से मुंबई के धारावी में आकर अपनी धाक जमा लेता है। यहां के लोगों के लिए वह माई-बाप की तरह है। इसी बीच हरि दादा (नाना पाटेकर) जैसे भूमाफिया की लालची नजर धारावी के एक हिस्से पर पड़ती है। हरि दादा उस इलाके में एक बड़ा साफ-सुथरा रिहायशी मकान बनवाना चाहता है ताकि उस जगह को मुंबई की गंदगी यानी झुग्गी-झोपड़ी से मुक्त किया जा सके। ऐसे में हरि दादा और काला के बीच टक्कर तो होगी ही। वो होती भी है और जम के होती है। इस लड़ाई में टैक्सीवाले से लेकर नगर निगम के कर्मचारी तक काला के साथ आ जाते हैं। कौन जीतेगा यह अनुमान आप लगा सकते हैं क्योंकि काला के कारनामों पर लोग फिदा हो जाते हैं। हालांकि मंझे हुए अभिनेता नाना पाटेकर ने भी अपना किरदार बखूबी निभाया है, लेकिन फिल्म में ‘रजनीकांत’ हैं तो जाहिर सी बात है कि उनके आगे कोई टिक नहीं सकता। काला नाम का यह बंदा हरि दादा पर भारी पड़ता है।

दक्षिण भारत में रजनीकांत के लाखों फैन हैं, लेकिन उत्तर भारत में भी उनके कम मुरीद नहीं है। ऐसे लोग, जो सिनेमाघर में सिर्फ रजनीकांत को देखने जाते हैं। उनको यह फिल्म अच्छी लगेगी क्योंकि रजनीकांत की सभी चिर-परिचित अदाएं फिल्म में हैं। दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में तो उनके फैन उनकी अदाओं पर मर-मिटने तक को तैयार रहते है। वहीं जो दर्शक कोई नई चीज या नया अनुभव लेना चाहते हैं, उनके लिए फिल्म में कुछ नहीं है। ‘काला’ पूरी तरह से रजनीकांत मार्का मनोरंजक फिल्म है। निर्देशक ने फिल्म में रोमांस का भी तड़का लगाया है। हुमा कुरैशी (जरीना) के साथ, लेकिन वो हिस्सा ज्यादा बड़ा नहीं है। हुमा उस फिल्म में सिर्फ यह जताने के लिए हैं कि रजनीकांत इस उम्र में भी इश्क कर सकते हैं। लेकिन काला का असली मकसद इश्क नहीं है। वो तो गरीबों की रक्षा के लिए पैदा हुआ है और ज्यादा समय तक प्यार-व्यार के झमेले में नहीं पड़ सकता है! निर्देशक पा रंजीत ने फिल्म में रंगों की भी कलाकारी दिखाई है। हरि दादा नेता है इसलिए सफेद कपड़े पहनता है और काला तो है ही काला। इसके जरिए निर्देशक ने यह बताने की कोशिश की है कि जरूरी नहीं कि काला रंग हमेशा नकारात्मक ही हो जैसा कि आम लोग समझते हैं। काला रंग भी शुभ का पर्याय हो सकता है और सफेद अशुभ का। रजनीकांत ने इससे पहले निर्देशक पा रंजीत के साथ ‘काबली’ फिल्म की थी जोकि बहुत ज्यादा सफल नहीं रही। अब देखना यह है कि ‘काला’ दर्शकों को सिनेमाघर तक लाने में कामयाब रहती है या नहीं।

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