फिल्म: जीवन या भीमा कॉन
कलाकार: अरशद वारसी, विजय राज, संजीदा शेख
समय: 1 घंटा 55 मिनट
निर्देशक: अभिषेक डोगरा
रेटिंग: 2.5/5

कभी-कभी जिंदगी से बच निकलने के लिए इंसान ऐसा प्लान बना लेता है, जो उसे मुसीबत से निकालने के बजाय और बड़ी परेशानी में फंसा देता है। अरशद वारसी की ‘जीवन या भीमा कॉन’ भी कुछ ऐसी ही कहानी लेकर आती है, जहां नकली मौत, हमशक्ल, इंश्योरेंस का पैसा और क्राइम मिलकर ऐसा खेल रचते हैं कि कौन किसे धोखा दे रहा है, समझना आसान नहीं रहता। फिल्म का आइडिया दिलचस्प है और कॉमेडी के साथ क्राइम का तड़का भी लगाया गया है, लेकिन क्या ये पूरी कहानी दर्शकों को आखिर तक बांधकर रख पाती है? चलिए जानते हैं।

क्या है फिल्म की कहानी?

मूवी की कहानी जीवन (अरशद वारसी) की मौत से शुरू होती है, जो एक झूठा नाटक होता है ताकि वह इंश्योरेंस की रकम हासिल कर सके। जीवन के इस पूरे नाटक में उसकी पत्नी योजन (संजीदा शेख) उसका साथ देती है। दरअसल, जीवन एक आम आदमी है, जो अपनी सारी कमाई रेस्टोरेंट खोलने में लगा देता है। लेकिन हालत बिगड़ जाते हैं और सब काम बंद हो जाता है।

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इसके बाद जीवन पर कर्ज बढ़ने लगता है और उसे पैसों की जरूरत होने लगती है। फिर जब कर्जदार उसके घर तक आ जाते हैं, तो वह एक प्लान बनाता है। कहानी में मोड़ तब आता है, जब जीवन को अपना हमशक्ल भीमा मिलता है। भीमा डायमंड स्मगलर होता है, जिसका संबंध गैंगस्टर विनायक (विजय राज) से है। आगे क्या होता है इसके लिए तो फिल्म देखनी होगी।

कॉमेडी कैसी है?

फिल्म में कॉमेडी के कुछ अच्छे पल जरूर हैं, लेकिन हर मजाक काम नहीं करता। कुछ वन-लाइनर्स और परिस्थितिजन्य कॉमेडी हंसाती है, जबकि कई जगह जबरदस्ती के जोक्स और टॉयलेट ह्यूमर फिल्म की कॉमेडी को कमजोर कर देते हैं।

कैसा है सितारों का अभिनय

अरशद वारसी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। डबल रोल में वह अपने दोनों किरदारों के बीच फर्क दिखाने में कामयाब रहते हैं। उनका स्वाभाविक कॉमिक अंदाज कई कमजोर हिस्सों को भी संभाल लेता है। संजीदा शेख भी उनका अच्छा साथ देती हैं और दोनों की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री सहज लगती है।

विजय राज अपने खास अंदाज में गैंगस्टर के किरदार में कॉमेडी और डर दोनों का संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं। बृजेंद्र काला और पूजा चोपड़ा भी सपोर्टिंग रोल में ठीक हैं, हालांकि, उनके किरदारों को ज्यादा गहराई नहीं मिलती।

कहां रह गई कमी

फिल्म का मजबूत पहलू इसका कंसेप्ट है। हमशक्ल, नकली मौत और इंश्योरेंस फ्रॉड को क्राइम-कॉमेडी के साथ जोड़ने का आइडिया दिलचस्प है। शुरुआत में फिल्म इसी वजह से दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखती है। लेकिन आगे बढ़ते-बढ़ते कहानी कई बार एक ही तरह के कन्फ्यूजन और घटनाओं को दोहराती हुई नजर आती है।

फिल्म का बड़ा हिस्सा एक ही घर के अंदर सेट है। शुरुआत में यह सेटिंग मजेदार लगती है, लेकिन लगातार एक ही जगह पर किरदारों की आवाजाही और बार-बार होने वाले झगड़ों से कहानी की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ जाती है। इंश्योरेंस इंस्पेक्टर और गैंगस्टर वाले ट्रैक कहानी में सस्पेंस बढ़ाने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनका असर उतना मजबूत नहीं बन पाता।

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