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हमारी याद आएगी: फिल्म तो बोली, मगर हीरो नहीं बोला

आलम आरा’ ने दो चीजें फिल्म जगत में और स्थापित कर दीं, जो सिनेमा कारोबार का एक हिस्सा ही बन गईं। एक तो ब्लैक में सिनेमा टिकटों की बिक्री और दूसरी स्टार सिस्टम। इससे पहले भी दोनों काम छिटपुट होते थे। मगर आलम आरा से ये मुख्यधारा में आ गईं। ‘आलम आरा’ की टिकटें 20 गुना ज्यादा दामों पर बेची गईं।

आर्देशीर ईरानी ने पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ को रिलीज किया था। (Image Source: Twitter/@FilmHistoryPic)

आर्देशीर ईरानी ने 1930 के जाड़ों में हॉलीवुड से साउंड इंजीनियर विल्फ्रेड को ‘आलम आरा’ की रेकॉर्डिंग के लिए बुलाया, जो इतने महंगे साबित हुए कि फिल्म के अधबीच में ही उन्हें विदा कर ईरानी ने साउंड रेकॉर्डिंग भी खुद ही करना तय किया। इंपीरियल और मदान थियेटर्स की होड़ आखिर 14 मार्च 1931 को खत्म हुई, जब ईरानी ने पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ रिलीज कर इतिहास रच दिया। मदान थियेटर्स की ‘जमाई शष्ठि’ महीने भर बाद 11 अप्रैल 1931 को रिलीज हुई। मगर दूसरे नंबर को कौन याद रखता है। ‘आलम आरा’ ने दो चीजें फिल्म जगत में और स्थापित कर दीं, जो सिनेमा कारोबार का एक हिस्सा ही बन गईं। एक तो ब्लैक में सिनेमा टिकटों की बिक्री और दूसरी स्टार सिस्टम। इससे पहले भी दोनों काम छिटपुट होते थे। मगर आलम आरा से ये मुख्यधारा में आ गईं। ‘आलम आरा’ की टिकटें 20 गुना ज्यादा दामों पर बेची गईं। लोग आश्चर्यचकित थे कि परदे पर जो परछाइयां अब तक सिर्फ हिलती-डुलती नजर आ रही थीं, वे बोलने कैसे लगीं? उनमें इसका आकर्षण इतना ज्यादा था कि भीड़ के कारण दो महीने तक लोगों को फिल्म की टिकटें ही नहीं मिलीं और ब्लैक मार्केटिंग करने वालों ने खूब चांदी काटी।

‘आलम आरा’ ने भारतीय सिनेमा की दुनिया को स्टार सिस्टम भी दिया। इससे पहले मूक फिल्मों में भी पृथ्वीराज कपूर और मास्टर विट्ठल जैसे स्टार थे, जिनका लोगों में क्रेज था। ‘आलम आरा’ के लिए स्टारों को व्यावसायिक फायदे के लिए अपनी फिल्म में लेने का झगड़ा इतना बढ़ा कि मामला अदालत तक जा पहुंचा था। इसकी खूब चरचा हुई। ईरानी चतुर कारोबारी थे। वे ‘आलम आरा’ में महबूब खान (‘मदर इंडिया’ के निर्माता-निर्देशक) को हीरो बनाने वाले थे। महबूब खान ने तो फिल्म के लिए अपनी पोशाक तक दर्जी को सिलने दे दी थी। ईरानी ने गुणा भाग कर देखा और उन्हें लगा कि अगर वह उन दिनों लोकप्रिय अभिनेता मास्टर विट्ठल (अभिनेत्री नंदा के पिता) को अपनी फिल्म में लेते हैं, तो इसका कारोबारी फायदा उन्हें हो सकता है। मराठीभाषी विट्ठल की मूक फिल्मों में धूम थी। वे पहलवान थे और मारधाड़ भरी फिल्मों में काम कर रहे थे।

परेशानी यह थी कि मास्टर विट्ठल शारदा स्टूडियो के मुलाजिम थे और अनुबंध (दूसरे स्टूडियो के लिए काम नहीं करने का लिखित आश्वासन) में बंधे थे। विट्ठल को ईरानी ने इतना आकर्षक प्रस्ताव दिया कि वे न नहीं कर सके। उन्होंने शारदा स्टूडियो छोड़ दिया और ‘आलम आरा’ साइन कर ली, तो स्टूडियो ने उन्हें अदालत में खींच लिया। विट्ठल ने तब इंग्लैंड से बैरिस्टर बनकर लौटे मोहम्मद अली जिन्ना (पाकिस्तान के संस्थापक) को अपना वकील बनाया। जिन्ना की दलीलों ने विट्ठल का काम बना दिया। वे केस जीत गए।

विट्ठल केस जीत गए हों मगर उन्हें ‘आलम आरा’ में साइन कर ईरानी ने मुसीबत मोल ले ली थी। विट्ठल की हिंदी-उर्दू बहुत कमजोर थी। फिल्म में जो मारधाड़ के दृश्य थे, उनके लिए तो विट्ठल एकदम फिट थे मगर संवाद बोलना उनके लिए मुश्किल काम बन गया था। तब ईरानी ने पटकथा में बदलाव किया और हीरो को लगभग गूंगा बना दिया और चार महीने में ‘आलम आरा’ पूरी कर रिलीज कर दी। लोगों ने पहली बार परदे पर हीरो विट्ठल के बजाय चरित्र अभिनेता डब्ल्यू एम खान को ‘दे दे खुदा के नाम पर…’ गाते हुए देखा।

पहली बोलती फिल्म के हीरो बनने के बावजूद हिंदी सिनेमा में मास्टर विट्ठल चल नहीं पाए और वापस मराठी फिल्मों की दुनिया में लौट गए और खूब नाम कमाया। दूसरी ओर इतिहास में पहली बोलती फिल्म के हीरो बनने से चूक गए महबूब खान ने बाद में ‘अंदाज’ ‘आन’ और ‘मदर इंडिया’ जैसी फिल्में बना कर एक अलग ही इतिहास रच दिया।

आर्देशीर ईरानी पुणे में पैदा हुए बहुधंधी पारसी थे। कई धंधों में उन्होंनें सफलता प्राप्त की। शिक्षक रहे, ग्रामोफोन बेचे, कारें बेचीं, फिल्में बेचीं। यूनिवर्सल स्टूडियो के भारतीय प्रतिनिधि रहे। सिनेमाघर खरीदे। सिनेमा की दुुनिया में कोलकाता की मदान थियेटर्स उनकी सबसे बड़ी मुकाबलेबाज कंपनी थी, जिसके सिनेमाघर श्रीलंका से बर्मा तक फैले थे। दोनों पारसियों में पहली बोलती फिल्म बनाने को लेकर जबरदस्त होड़ थी। मदान महीने भर पिछड़ गए और बाजी मारी ईरानी ने, जिनकी बुधवार 132वीं जयंती थी।

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