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फिल्म समीक्षा: प्रधानमंत्री पर भारी मीडिया सलाहकार

हफ्ते की दूसरी बहुचर्चित फिल्म है ‘दि एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’। कहा जा रहा था कि यह फिल्म अनुपम खेर की है, जिन्होंने फिल्म में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का किरदार निभाया है। लेकिन इसमें केंद्रीय भूमिका अक्षय खन्ना की है जिन्होंने संजय बारू की भूमिका निभाई है।

THE ACCIDENTAL PRIME MINISTER फिल्म का पोस्टर।

दि एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर

निर्देशक- विजय रत्नाकर गुट्टे

कलाकार-अक्षय खन्ना, अनुपम खेर, सुजान बर्नेट, अर्जुन माथुर

हफ्ते की दूसरी बहुचर्चित फिल्म है ‘दि एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’। कहा जा रहा था कि यह फिल्म अनुपम खेर की है, जिन्होंने फिल्म में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का किरदार निभाया है। लेकिन इसमें केंद्रीय भूमिका अक्षय खन्ना की है जिन्होंने संजय बारू की भूमिका निभाई है। बारू प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल में उनके मीडिया सलाहकार थे। यह फिल्म बारू की इसी नाम की किताब पर आधारित है। इसलिए स्वाभाविक है कि फिल्म में बारू के किरदार को ज्यादा तरजीह दी गई। फिल्म देखकर यही यही लगता है कि मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल के दौरान बारू प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव और रार्ष्टÑीय सुरक्षा सलाहकार पर भारी थे और दस जनपथ (यानी सोनिया गांधी केंद्रित रार्ष्टीय सलाहकार परिषद) की योजनाओं में अड़चनें डालने वाले असल शख्स भी। फिल्म में बारू मीडिया एडवाइजर कम, राजनीतिक सलाहकार ज्यादा दिखते हैं।

बहरहाल, सच्चाई जो भी हो, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि अक्षय खन्ना ने यह भूमिका बखूबी निभाई है। एक स्मार्ट मीडिया सलाहकार के रूप में वे काफी चुस्त दिखे हैं। चूंकि यह फिल्म बारू की किताब पर आधारित है और इसमें उन्हीं के किरदार को उभारा जाना था, इसलिए फिल्म में अनुपम खेर की भूमिका काफी कमजोर हो गई है। उन्हें वास्तविक मनमोहन सिंह वाली दृढ़ता दिखाने का मौका ही नहीं दिया गया है, खासकर अमेरिका से हुई परमाणु संधि के मामले में दिखाई गई दृढ़ता। यह प्रसंग फिल्म में दिखाई देता है, लेकिन लोकसभा में विश्वासमत प्रस्ताव पेश होने के दौरान यूपीए सरकार की जीत फिल्म में नहीं दिखाई गई है, शायद इसलिए कि इससे बारू के बजाय मनमोहन सिंह ज्यादा प्रभावशाली नजर आते।

यह फिल्म पूरी तरह डॉक्यू-ड्रामा शैली में है। मशहूर अमेरिकी फिल्म ‘जेएफके’ और कुछ अन्य फिल्में इसी शैली में बनी हैं। हालांकि निर्देशक का इरादा शायद एक बेहतर फिल्म बनाने का नहीं बल्कि संजय बारू को चाणक्य की भूमिका में दिखाने का था। एक ऐसा चाणक्य जिसका चंद्रगुप्त कमजोर है। इसलिए उनका सारा फोकस उधर ही चला गया। फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि सोनिया गांधी राहुल को प्रधानमंत्री बनाने के लिए बेताब थीं और वो बारू ही थे, जिनके कारण यह नहीं हो सका।

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