Ittefaq movie review: क्या फिर इत्तेफाक होगा? - Jansatta
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Ittefaq movie review: क्या फिर इत्तेफाक होगा?

साल 1969 में एक फिल्म आई थी ‘इत्तेफाक’। राजेश खन्ना उसके हीरो थे। नई फिल्म एक तरह से उसी का रीमेक है।

Author November 4, 2017 1:41 AM

साल 1969 में एक फिल्म आई थी ‘इत्तेफाक’। राजेश खन्ना उसके हीरो थे। नई फिल्म एक तरह से उसी का रीमेक है। पहले वाली फिल्म ने दर्शकों के दिल में एक खास जगह बनाई थी, लेकिन 2017 वाली ‘इत्तेफाक’ के साथ वैसा ही होगा? क्या यह नई फिल्म भी पहले जैसा कारनामा कर पाएगी? कहना कठिन है।
भारत में आम दर्शक अक्सर यह पसंद करता रहा है कि अपराधी आखिर में पकड़ा जाए। लेकिन कई बार यह भी होता रहा है कि अपराधी बच निकला और दर्शकों के दिल में उसके लिए सहानुभूति हो गई है। जैसे कि शाहरुख खान की ‘बाजीगर’। इसलिए अपवाद भी रहे हैं। कभी-कभी दर्शकों का दिमाग दूसरी तरफ भी मुड़ जाता है। इसलिए इस नई ‘इत्तेफाक’ में यह इत्तेफाक होगा, कहना कठिन है। पर इतना तय है कि फिल्म सिद्धार्थ मल्होत्रा शाहरुख की तरह भाग्यशाली नहीं होंगे। क्या ऐसा हो सकता है कि एक शख्स दो-दो हत्याएं कर दे, पुलिस और कानून की पकड़ से साफ-साफ बच जाए और दर्शक उसके लिए ताली बजाएं?

‘इत्तेफाक’ में दो हत्याएं होती हैं- एक विदेशी मूल की महिला की और एक वकील की। अलग-अलग। पर दोनों के लिए शक एक ही आदमी पर जाता है- विक्रम (सिद्धार्थ मल्होत्रा), जो विदेशी औरत का पति है और एक लेखक भी। मरने वाली विदेशी औरत उसकी पत्नी होने के साथ-साथ एक प्रकाशक भी है। जिस दूसरे पुरुष की हत्या होती है उसकी पत्नी माया (सोनाक्षी सिन्हा) पर भी पुलिस को शक है। देव (अक्षय खन्ना) नाम का पुलिस अधिकारी सारी तहकीकात कर रहा है और उसे तीन दिन में अपनी तहकीकात पूरी करनी है।

फिल्म पूरी तरह इसी गुत्थी पर केंद्रित है कि हत्यारा कौन या किसका हत्यारा कौन? क्या दोनों हत्याओं को अंजाम देनेवाला शख्स एक ही है या अलग-अलग? और विक्रम का शेखर के यहां पाया जाना महज इत्तेफाक है या सोची समझी तैयारी? फिल्म के नायक सिद्धार्थ मल्होत्रा हैं लेकिन सारा फोकस देव यानी अक्षय खन्ना पर है। हालांकि वे भी बड़ा तीर नहीं मार पाते। फिल्म जिस तरह से बनाई गई है उसमें आखिर के दस मिनट पहले तक यह सस्पेंस बरकरार रहता है कि हत्या किसने की। पर आखिर में दर्शक को लगता है कि न सिर्फ पुलिस बेवकूफ बन गई है बल्कि वह खुद भी। सिर्फ बड़े स्टारों को फिल्म में रख लेने पर सफलता की गारंटी नहीं मिल जाती है।

जब राजेश खन्ना वाली ‘इत्तेफाक’ आई थी, तब दर्शकों पर उनका जादू बरकरार था। वे जिस भूमिका में होते थे लोग उन्हें पसंद करते थे। लेकिन सिद्धार्थ का वैसा करिश्मा नहीं है। ये पहलू भी निर्णायक साबित होने वाला है और सोनाक्षी सिन्हा के चरित्र के साथ भी अन्याय ही हुआ है। माया हत्या की गुनहगार भले न हो लेकिन दुष्चरित्र तो साबित हो ही जाती है।

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