Ishq Dard & Cinema: फिल्में हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी हैं। उन्हें देखकर हम हंसते हैं, रोते हैं, डरते हैं और कभी-कभी देशभक्ति के रस में भी डूब जाते हैं।

क्या आपने कभी खुद से पूछा है- जब हमें पता है कि पर्दे पर दिखाई जा रही कहानी सिर्फ़ कहानी है, किरदार अभिनेता हैं और सब अभिनय कर रहे हैं… तो फिर उन्हें देखकर दिल फूट-फूटकर क्यों रोने लगता है? ‘इश्क दर्द और सिनेमा’ सीरीज़ में आज समझते हैं इसके पीछे का मनोविज्ञान।

दिमाग जानता है सच, लेकिन दिल है कि मानता नहीं

हमारा दिमाग लॉजिक और इमोशन्स को अलग-अलग प्रोसेस करता है। इसलिए दिमाग को पता होता है कि ये कहानी सच्ची नहीं है, लेकिन दिल उसे बिल्कुल असली मान लेता है।

हमारा इमोशनल ब्रेन, जिसे मनोविज्ञान में लिम्बिक सिस्टम कहा जाता है, फैक्ट्स पर नहीं फीलिंग्स पर चलता है। और सिनेमा देखते वक्त यही सिस्टम सबसे ज़्यादा एक्टिव हो जाता है।

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रोना फिल्म की वजह से नहीं, हमारे अधूरे दर्द की वजह से होता है

डीडीएलजे हमारे देश में सिर्फ़ सुपरहिट नहीं हुई थी- वो एक भावना बन गई थी। क्योंकि परदे पर राज और सिमरन में हम खुद को देखते हैं।

उस दौर में बहुत-सी प्रेम कहानियां शुरू तो होती थीं, लेकिन परिवार और समाज के दबाव में अधूरी रह जाती थीं। जब शाहरुख़ खान राज बनकर प्यार से सिमरन के घरवालों को मनाता है, तो हमारे भीतर दबी इच्छाएं जाग उठती हैं।

सख़्त माता-पिता, इमोशनली unavailable पतियों के बीच- जब एक ऐसा प्रेमी दिखता है जो गर्लफ्रेंड के लिए करवा चौथ का व्रत रखता है, तो हम बस यही चाहते हैं कि ये कहानी पूरी हो जाए। असल में हम परदे पर अपनी अधूरी प्रेम कहानियों को पूरा होते देखते हैं।

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सिनेमा एक ट्रिगर बन जाता है

फिल्में हमारे लिए ट्रिगर का काम करती हैं- अधूरा इश्क, प्यार में रिजेक्शन, अनकहा दर्द। ज़िंदगी में जिस दर्द को हम रोज़ छिपाते हैं, वही दर्द सिनेमा देखते वक्त दिल से निकलकर आंखों से बहने लगता है।

बदले का सुख

‘शादी में ज़रूर आना’ में जब सत्तू IAS बनकर आरती के सामने आता है और बैकग्राउंड में बजता है- “ठुकरा के मेरा प्यार, मेरा इंतकाम देखेगी…”

तो सिनेमाहॉल में तालियां क्यों बजती हैं? क्योंकि ये सिर्फ़ सत्तू की जीत नहीं होती- ये हर उस इंसान की जीत लगती है जिसे कभी प्यार में ठुकराया गया था।

असल ज़िंदगी में IAS बनना मुमकिन हो या न हो, लेकिन वो सीन हमारी तरफ से एक जवाब जैसा लगता है।

Titanic हमें इसलिए रुलाती है क्योंकि जैक और रोज़ की कहानी की कहानी भी हमारे उस पहले प्यार की तरह होती है जो पूरा होते-होते बस रह जाता है। हम उस इश्क़ पर रोते हैं जो हमेशा के लिए नहीं मिल सका।

दर्द को मिलता है वैलिडेशन

असल ज़िंदगी में ब्रेकअप पर कहा जाता है- “मूव ऑन करो”, “स्ट्रॉन्ग बनो”, “इतना मत सोचो”

लेकिन फ़िल्में कहती हैं- दर्द है तो रोना गलत नहीं है। हम सिनेमा सिर्फ़ देखते नहीं- महसूस करते हैं, इसलिए फिल्में देखते वक्त हमारी आंखें भर आती हैं, दिल भारी हो जाता है।

कुछ फ़िल्में बार-बार क्यों देखी जाती हैं?

हम सबकी ज़िंदगी में कुछ ऐसी फिल्में होती हैं जो हमारी पसंदीदा होती हैं, और हम बड़े गर्व से बताते हैं कि ये फिल्म हमने इतनी बार देखी है, जानते हैं क्यों? क्योंकि हम उनसे खुद को जोड़ पाते हैं। कई बार एक ही फ़िल्म हर बार हमें कुछ नया सिखाती है- क्योंकि हर बार हम थोड़े बदले हुए होते हैं।

हमारे ज़ख्म बदल जाते हैं, हमारी समझ बदल जाती है। फ़िल्म वही रहती है, लेकिन हमारे इमोशन्स बदल चुके रहते है। इसके नॉस्टैल्जिया भी जुड़ा होता है। पहली बार फ़िल्म देखते वक्त जो महसूस हुआ था, उसकी याद हमें उस पल में वापस ले जाती है।

सिनेमा: एस्केप नहीं, कई बार आईना

कई बार हम अपने दर्द से भागने के लिए फ़िल्में देखते हैं। लेकिन सही फ़िल्में हमें भागने नहीं देतीं- वो हमें हमारी सच्चाई से मिलवाती हैं।

कुछ कहानियां हमें दूर नहीं ले जातीं, वो हमें हमारे पास वापस ले आती हैं। क्वीन जैसी फ़िल्में हिट इसलिए होती हैं क्योंकि वो सिखाती हैं- कि हर बार रिजेक्ट होना बुरा नहीं होता है।

कभी-कभी किसी और का छोड़ देना हमें खुद से मिलवा देता है। हम जब दूसरों में खो जाते हैं, तब अपनी वैल्यू भूल जाते हैं। और ऐसी फ़िल्में हमें धीरे-धीरे खुद से जोड़ती हैं।

आख़िरी बात अगर ये जानते हुए भी कि ये सिर्फ़ कहानी है, आपकी आंखों से आंसू निकल आते हैं- तो खुश हो जाइए। इसका मतलब है- आपके भीतर अब भी कुछ ज़िंदा है।