“ये इश्क़ नहीं आसां, एक आग का दरिया है और डूब के जाना है…” बचपन से आज तक प्यार को लेकर हमने ऐसी ही पंक्तियाँ सुनी हैं। प्यार को दर्द और कुर्बानी से जोड़ने में अगर किसी एक माध्यम का सबसे बड़ा योगदान रहा है, तो वो है बॉलीवुड।

बॉलीवुड ने बार-बार यह सिखाया कि अगर प्यार है, तो तकलीफ़ होगी। अगर मोहब्बत सच्ची है, तो दर्द सहना पड़ेगा। लेकिन मनोविज्ञान कुछ और ही कहता है- प्यार का मतलब सुकून होता है, ऑब्सेशन नहीं।

जब ऑब्सेशन को प्यार समझ लिया जाता है

हाल ही में आनंद एल राय की फिल्म ‘तेरे इश्क़ में’ आई। फिल्म देखने के बाद पहला सवाल यही उठता है कि बॉलीवुड आखिर कब समझेगा कि दर्द और ऑब्सेशन से बना रिश्ता प्यार नहीं होता।

हैरानी इस बात की है कि इस फिल्म में कृति सेनन का किरदार खुद साइकोलॉजी की स्टूडेंट है, लेकिन कहानी जिस दिशा में जाती है, वो न सिर्फ डिस्टर्बिंग है बल्कि कई सवाल भी खड़े करती है।

ट्रॉमा बॉन्ड को रोमांटिसाइज़ करती यह कोई पहली फिल्म नहीं है। राजा हिंदुस्तानी, देवदास, रांझणा, तेरे नाम, रॉकस्टार, कबीर सिंह और आशिकी 2- ऐसी कई फिल्में हैं जिन्होंने दर्द को प्रेम का प्रमाण बना दिया।

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ट्रॉमा बॉन्डिंग क्या होती है?

जब हम दर्द को ही प्यार समझ लें, वही ट्रॉमा बॉन्डिंग है। ऐसा रिश्ता जहाँ- दर्द है, डर है, अपमान है, अनिश्चितता है, लेकिन फिर भी हम उस रिश्ते को छोड़ नहीं पाते।

यह एक तरह का इमोशनल नशा होता है। अक्सर ट्रॉमा बॉन्ड से जुड़े लोगों को यह एहसास तक नहीं होता कि वे टॉक्सिक रिश्ते में हैं।

Pain–Relief का खतरनाक साइकल

ट्रॉमा बॉन्डिंग एक पेन और रिलीफ का साइकल है। पहले सामने वाला चोट पहुँचाता है, हम टूट जाते हैं, फिर वही इंसान थोड़ी सी माफी, प्यार या केयर दिखाता है, हमें राहत मिलती है।

यानी जहाँ से दर्द मिला, वहीं से सुकून भी मिला। यही साइकल बार-बार दोहराई जाती है और रिश्ता और मज़बूत लगता जाता है।

क्यों ये प्यार जैसा लगता है?

ट्रॉमा बॉन्ड में इमोशंस बहुत इंटेंस होते हैं। हाई बहुत हाई होता है, लो बहुत लो। दिमाग इसे पैशन समझ लेता है, जबकि असल में यह इमोशनल एडिक्शन होता है। जब बॉलीवुड ट्रॉमा बॉन्डिंग को मोहब्बत बनाता है तो हम शाहरुख खान का “क…क…किरण” कहना प्यार समझते हैं। राजा हिंदुस्तानी में राजा के टॉक्सिक व्यवहार को मोहब्बत का नाम देते हैं।

कबीर सिंह में गुस्सा, एब्यूज़ और फिर इंटेंस प्यार व माफी को प्रेम का नाम दिया गया। देवदास और पारो के दर्द और इमोशनल डिपेंडेंसी को अमर प्रेम बताया गया। आशिकी 2 में सेल्फ-डिस्ट्रक्शन और कुर्बानी को ग्लोरिफ़ाई किया गया, जबकि असल मोहब्बत सुरक्षा और स्थिरता देती है।

जब अनरिज़ॉल्व्ड ट्रॉमा को मोहब्बत का नाम दिया गया

रांझणा में कुंदन के दर्द को उसकी सच्चाई माना गया। वन-साइडेड ऑब्सेशन और रिजेक्शन के बाद भी पीछा करना मोहब्बत बताया गया।

तेरे नाम में वायलेंस और अनस्टेबल बिहेवियर को रोमांटिक बना दिया गया। ये सभी फिल्में सुपरहिट रहीं- और कहीं ना कहीं यहीं से हमारी प्यार की समझ और बिगड़ती चली गई।

सफ़रिंग नहीं, सुकून है मोहब्बत

रॉकस्टार में भी प्यार को सफ़रिंग से जोड़ा गया। जॉर्डन को इंस्पिरेशन खुशी से नहीं, दर्द से मिली। लेकिन दर्द से जुड़ा रिश्ता सच्ची मोहब्बत नहीं, बल्कि ऑब्सेशन है।

बॉलीवुड ने हमें क्या सिखाया?

• ऑब्सेशन मतलब डिवोशन
• जलन को दिया केयर का नाम
• कंट्रोल को कहा गया पैशन
• सफ़रिंग को माना गया प्यार का सबूत

Healing को कहा गया boring

बॉलीवुड ने हमेशा ब्रेकडाउन दिखाया, हीलिंग नहीं। Queen जैसी फिल्में अपवाद हैं, जहाँ टॉक्सिक रिश्ते के बाद नया लड़का नहीं बल्कि खुद से जुड़ना दिखाया गया।

प्यार और ट्रॉमा बॉन्डिंग में फर्क

ट्रॉमा बॉन्डिंग का कॉन्सेप्ट सबसे पहले मनोवैज्ञानिक Donal Dutton और Susan Painter ने दिया था, जिसे बाद में Patrick Carnes ने रिलेशनशिप साइक्लॉजी में लोकप्रिय बनाया। उन्होंने हमें बताया:

• प्यार में सेफ्टी होती है, ट्रॉमा बॉन्डिंग में एंग्ज़ायटी
• प्यार कंसिस्टेंट होता है, ट्रॉमा बॉन्ड अनप्रिडिक्टेबल
• प्यार में रिस्पेक्ट होती है, ट्रॉमा बॉन्ड कंट्रोलिंग
• प्यार में ग्रोथ होती है, ट्रॉमा बॉन्ड सर्वाइवल मोड

भारतीय समाज और ट्रॉमा बॉन्डिंग

भारत में रिश्तों की साइकोलॉजी पर बात वैसे भी कम होती है। कंट्रोलिंग या इमोशनली नेग्लेक्ट करने वाले पैरेंट्स के बीच पले बच्चे अक्सर-अट्रैक्शन को प्यार समझते हैं, और प्यार मिलते ही या तो कंट्रोल करने लगते हैं या टॉक्सिक रिश्तों की तरफ अट्रैक्ट होने लगते हैं। बॉलीवुड जब इस पैटर्न को ग्लोरिफ़ाई करता है, तो लोग सवाल उठाना ही छोड़ देते हैं।

सच यह है कि ज़्यादातर लोग जानबूझकर गलत रिश्तों में नहीं रहते- उन्हें पता ही नहीं होता कि वो रिश्ता टॉक्सिक है।

बॉलीवुड से सवाल

जब तक कबीर सिंह, एनिमल और तेरे नाम जैसी फिल्मों को जस्टिफ़ाई किया जाता रहेगा, लोग अंधेरे में ही रहेंगे। अब वक्त आ गया है कि हिंदी सिनेमा सच्ची मोहब्बत की परिभाषा गढ़े- जहाँ प्यार का मतलब दर्द नहीं, सुकून हो।