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लेखक को अपने समय से पीछे धकेल देती है गुटबंदी

लेखक ने क्या, क्यों और कैसे लिखा जैसे छोटे सवाल उस बड़े फलक को खोलते हैं जहां वह त्रेता जैसा महाकाव्य रच जाता है और गीता जैसे संस्कृतनिष्ठ क्लासिक को हिंदी के गीतात्मक शब्दों से प्रज्ञावेणु में ढाल देता है।

Author September 8, 2017 2:04 AM
रमाकांत शर्मा

लेखक ने क्या, क्यों और कैसे लिखा जैसे छोटे सवाल उस बड़े फलक को खोलते हैं जहां वह त्रेता जैसा महाकाव्य रच जाता है और गीता जैसे संस्कृतनिष्ठ क्लासिक को हिंदी के गीतात्मक शब्दों से प्रज्ञावेणु में ढाल देता है। अभिनव पांडव, राधामाधव, स्वयंप्रभा, वक्रतुंड, अनाद्यसूक्त, ब्लैकहोल, अस्ति, इस्तरी जैसी कालजयी रचनाओं को रचने वाले रमाकांत शर्मा जिन्हें हम उद्भ्रांत के नाम से जानते हैं खुद को मूलत: कवि मानते हैं। कविता के आवेग से निकल कर रचनात्मकता की हर विधा में विस्फोट करने वाले इस बड़े रचनाकार से छोटे सवालों पर बात।
सवाल :आजाद भारत में जन्म और नया बनता देश। वह कौन सा माहौल था जो आपको रचनात्मक लेखन की ओर ले गया।
’मेरा पारिवारिक माहौल पढ़ने-लिखने वाला था। कल्याण, साप्ताहिक हिंदुस्तान से लेकर बच्चों की सभी पत्रिकाएं आती थीं। इसलिए अध्ययन की प्रवृत्ति छोटी उम्र से ही रही जिसने मेरी कल्पनाशक्ति को भी समृद्ध किया। जब मैं छोटा था तो लोग सुभाषचंद्र के बारे में बातें करते थे। वह गुलामी से आजादी में छलांग लगाने का दौर था और घर-बाहर सब जगह हमारे नायकों के किस्से थे, उनकी जुबानी उनकी कहानी भी थी। मैं जब दर्जा आठ में था तो पास के स्कूल में जवाहरलाल नेहरू आए थे। करवट लेते देश में गरीबी, भूख, बेरोजगारी, छुआछूत जैसी तमाम तरह की बुराइयों से मुक्ति की बात हो रही थी। दलितों और स्त्रियों को मुख्यधारा में लाने का सवाल भी उठ रहा था। वह तो पूरे देश के लिए रचनात्मक दौर था जो हर हिंदुस्तानी को रचनात्मक बना रहा था।

सवाल : आप खूब लिखने वाले रचनाकारों में शुमार हैं। गद्य-पद्य सब लिखा। हर विधा की अपनी खासियत होती है। किसी में किरदार के साथ जीना-मरना पड़ता है तो कोई लंबे समय की मांग करता है। अलग-अलग विधाओं संग संवेदनाओं का सामंजस्य कैसे बिठाते हैं?
’मैं शुरू से ही हर विधा का गहन अध्ययन करता रहा हूं। आज भी रोज पांच-छह घंटे का समय पढ़ने के लिए निकाल लेता हूं। यदि किसी रचनाकार ने तमाम विधाओं को आत्मसात किया है तो उसे उसको अभिव्यक्त करने में आसानी होती है। कविता में कल्पनाशीलता होती है, बिना भावनात्मक हुए काव्य नहीं रचा जा सकता है। वहीं कहानी में यथार्थ का चित्रण करना होता है। उपन्यास का फलक वृहद होता है। जीवन विविधताओं से भरा इतना बहुरंगी है कि बस विधा में मुझे एक खास वैचारिक और भावनात्मक स्थिति के तहत जीवन के रंग को ही मूर्त रूप देना होता है।

सवाल : वैसे आप किस विधा के साथ खुद को सबसे ज्यादा सहज मानते हैं।
’मैं खुद को कवि मानता हूं। कविता आती है तो मैं उसे रोक नहीं पाता हूं। अब इसके लिए चाहे रतजगा करना पड़े, थोड़ी देर के लिए सब कुछ से कट जाना पड़े लेकिन मैं कविता के आवेग को रोक नहीं पाता हूं।

सवाल : साहित्यिक खेमेबंदी की बात किए बिना हिंदी रचनाकार का साक्षात्कार अधूरा है। क्या ऐसी कोई चीज हिंदी साहित्य को प्रभावित कर रही है?
’जी, बिलकुल। गुटबंदी हिंदी साहित्य को सौ फीसद प्रभावित कर रही है। तात्कालिक स्वार्थ, पुरस्कार, नियुक्ति इन सबको लेकर गुटबाजी होती है जो श्रेष्ठ और उत्कृष्ट साहित्य को कुछ समय के लिए घटाटोप में छिपा देती है। हालांकि किसी श्रेष्ठ रचना को उसका हक तो मिल ही जाता है लेकिन रचनाकार जिस समय में रच रहा होता है उसका वह समय तो छिन ही जाता है, उसे अपने समय से तो पीछे धकेल ही दिया जाता है।

सवाल : एक लिखने वाला क्या पढ़ता है, यह भी अहम है। आप क्या और क्यूं पढ़ते हैं?
’मैं साहित्य की सारी विधाओं का अध्ययन करता हूं। जितना संभव हो सकता है संस्कृति और दर्शन की पुस्तकें पढ़ता हूं। अलग-अलग समय में प्रासंगिकता के हिसाब से भी अध्ययन करता हूं। एक समय में मैं कविता और क्लासिक भरपूर पढ़ता था। समय के साथ प्राथमिकता बदलती रहती है। हमारे कितने महान साहित्यकार कितने कम समय में चल बसे। अब जब मैं सत्तरवें साल में लिख रहा हूं तो लग रहा है कि बोनस पीरियड मिला हुआ है और इसका भरपूर इस्तेमाल किया जाए। आज भी हर रोज यही सोचता हूं कि जितने अधूरे काम हैं जल्दी से पूरे कर लिए जाएं।

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