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शांति और सुकून तलाशती फिल्मों का जमघट

विश्व सिनेमा में इस समय एक स्वर खूब मुखर है - शांति की खोज। गोवा फिल्मोत्सव में आश्चर्यजनक है कि फ्रेंच फिल्मों के स्वर भी यही हैं।

नई दिल्ली | November 26, 2015 2:41 AM

विश्व सिनेमा में इस समय एक स्वर खूब मुखर है – शांति की खोज। गोवा फिल्मोत्सव में आश्चर्यजनक है कि फ्रेंच फिल्मों के स्वर भी यही हैं। फ्रांस की जो दर्जन भर फिल्में दिखाई जा रही हैं उनमें कान फिल्मोत्सव का पैकेज काफी महत्त्वपूर्ण है। कान की तरह गोवा में भी आधी रात में कुछ चर्चित फिल्मों का प्रदर्शन हो रहा है।

कान फिल्मोत्सव की सबसे चर्चित ओदिआर की फ्रेंच फिल्म ‘दीपन’ एक पूर्व तमिल टाइगर की डायरी है। ओदिआर को फ्रांस में कई वजहों से भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। एक तो उन्होंने फ्रांस में कानून-व्यवस्था को अराजक और इंग्लैंड को सबसे अच्छा दिखाया है। दूसरे मुख्य भूमिकाओं में श्रीलंकाई-भारतीय लोगों को लिया है। विश्व सिनेमा में यह पहली बार देखा जा रहा है कि फ्रेंच फिल्म के अधिकतर संवाद तमिल में हैं। नायक की भूमिका निभानेवाले जेसुदासन एंटनीदासन अपनी असल जिंदगी में श्रीलंका के जाफना में तमिल टाइगर रहे हैं जो चेन्नई-थाइलैंड होते हुए 1993 में फ्रांस में राजनीतिक शरण लेते हैं। फिल्म में उनकी नकली पत्नी की भूमिका में चेन्नई की कालीश्वरी श्रीनिवासन हैं जिनका सिनेमा से कोई खास रिश्ता कभी नहीं रहा। वे रंगमंच से जुड़ी रही हैं। बच्ची की भूमिका क्लोदैन वीणासितंबी ने की है।

जाफना के जंगल में आधी रात को मारे गए तमिल टाइगरों के सामूहिक शवदहन के बाद नायक द्वारा चिता में अपनी वर्दी जलाने के दृश्य से फिल्म शुरू होती है। उसे दीपन नाम के एक मृत श्रीलंकाई तमिल परिवार के जाली पासपोर्ट पर एक अनजान युवती को पत्नी और उसके द्वारा गोद ली गई अनाथ बच्ची को बेटी बनाकर पेरिस पहुंचना है। इस खतरनाक यात्रा के बाद दीपन को पेरिस के रिफ्यूजियों के एक ऐसे मोहल्ले की देखभाल का काम मिलता है, जहां गैरफ्रांसीसी गुंडे अपराधी और गैरकानूनी काम करनेवालों का बारी-बारी से राज चलता है। इस रोज-रोज के गैंगवार में अपनी नकली पत्नी और बेटी से बनी नई गृहस्थी को बचाने के लिए उसे फिर से हथियार उठाना पड़ता है। यहां उसे श्रीलंका में ली गई गुरिल्ला ट्रेनिंग काम आती है। साथ-साथ रहते हुए तीनों में सचमुच के परिवार की भावना विकसित होती है। तीन अनजान बाशिंदों का एक परिवार में बदलना ही फिल्म का मर्मस्थल है। युवती को जल्दी ही यह बात समझ आती है कि फ्रांस में वे कभी शांति से नहीं जी सकेंगे। वह नायक से बार-बार लंदन चलने की जिद्द करती है। अंत में हम देखते हैं कि हमारे नायक का नकली परिवार असली परिवार बनकर लंदन में सुखमय जीवन बिता रहा है।

गुइलौम निक्लौ की ‘वैली आफ लव’ हृदयविदारक फिल्म है। हम कैलिफोर्निया की मृत्यु की घाटी में एक ऐसे तलाकशुदा दंपत्ति से मिलते हैं जिन्होंने वर्षों से एक-दूसरे को नहीं देखा है। उनका इकलौता छायाकार बेटा माइकल आत्महत्या करने से पहले दोनों को एक-एक खत लिखता है कि छह माह बाद वह उन्हें डेथ वैली में मिलेगा। उस खत में यात्रा की पूरी योजना है। फिल्म हमें मृत्यु की घाटी की रोमांचित कर देनेवाली एक ऐसी यात्रा पर ले जाती है जिसमें माता-पिता अपने मर चुके बेटे की यादों के साथ-साथ चलते हैं। यात्रा के अंतिम पड़ाव पर पिता को लगता है कि वह सचमुच अपने मृत बेटे से मिलकर लौट रहा है।
निकोलस सादा की फिल्म ‘ताजमहल’ मुंबई में हुए आतंकवादी हमले 26/11 पर है। हमले के दौरान एक अठारह साल की लड़की ताज होटल के अपने कमरे में फंस जाती है। उसके माता पिता बाहर घूमने गए हैं। दोनों के बीच संपर्क का एक ही माध्यम है सेलफोन। यह यूरोपीय दशर्कों के लिए बनाई गई एक थ्रिलर है। मौत को करीब से देखती बेटी और बाहर से उसे बचाने की कोशिश करता उसका परिवार – इसी कशमकश को चुस्ती से दिखाया गया है।

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