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हिंदी सिनेमा में ताजा हवा के झोंके की तरह यह ‘भोर’

‘भोर’ समाज के आखिरी पायदान पर जानवर-सी हालत में जी रहे मुसहर समाज का सिनेमाई क्लाइडोस्कोप है। यहां गांव के मुखिया ठाकुर साहब और उनका परिवार हिंसक खलनायक नही है। वे संरक्षक है। ताड़ी, ट्रैक्टर और बॉलीवुड की सिंफनी में सूअर, कीचड़ और मिट्टी का रोमांस है।

Author November 27, 2018 6:12 AM
फिल्म का एक दृश्य।

भारत के 49वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह गोवा के भारतीय पैनोरमा में दिखाई गई युवा फिल्मकार कामाख्या नारायण सिंह की फीचर फिल्म ‘भोर’ अपनी सादगी , संदेश और सचाई के कारण सराही जा रही है। इसे देखने के लिए खासतौर पर आईं गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा का कहना है कि यह फिल्म बहुत दिनों तक याद रहेगी। ‘भोर’ निर्देशक कामाख्या नारायण सिंह की पहली ही फिल्म है, जिसमें मुख्य भूमिका सुप्रसिद्ध रंगकर्मी अरविद गौड़ की बेटी सावेरी गौड़ ने निभाई है। ‘भोर’ समाज के आखिरी पायदान पर जानवर-सी हालत में जी रहे मुसहर समाज का सिनेमाई क्लाइडोस्कोप है। यहां गांव के मुखिया ठाकुर साहब और उनका परिवार हिंसक खलनायक नही है। वे संरक्षक है। ताड़ी, ट्रैक्टर और बॉलीवुड की सिंफनी में सूअर, कीचड़ और मिट्टी का रोमांस है। जब बुधनी पढ़ाई में जिले में टॉप करती है तो स्कूल के प्रिंसिपल की मिठाई को ठुकराते हुए उसका ससुर अपने बेटे सुगन से पूछता है कि क्या उसने किसी मुसहर को मिठाई खाते देखा है? बहुत ही मामूली खर्चे में बनी ‘भोर’ हिंदी सिनेमा में ताजा हवा की तरह है। सभी कलाकारों को गांव के असली चरित्रों के साथ महीनों की ट्रेनिंग दी गई। उन्हें मुसहर समाज के जीवन का अभ्यास कराया गया। तब जाकर कही असली मुसहर जीवन की तासीर बन पड़ी।

बुधनी की समस्या यह है कि वह पढ़ना चाहती है जबकि उसका पिता उसकी शादी पर अड़ा है। उसका होनेवाला पति सुगन उसे आश्वासन देता है कि वह उसकी पढ़ाई शादी के बाद भी बंद नहीं होने देगा। पर दूसरी समस्या तब आती है कि बुधनी भोर में दूसरी औरतों के साथ खुले में शौच करने जाने से इनकार कर देती है। सुगन उसके लिए कमरे में ही ईट-मटके से कामचलाउ शौचालय बना देता है और हर सुबह मटके को खुद ही बस्ती से बाहर फेंक आता है। सुगन के सहयोग से बुधनी जिले में टॉप कर जाती है । जिले के कलेक्टर उसे बुला कर सम्मानित करते हैं और पूछते हैं कि वे उसके लिए क्या कर सकते है? बुधनी की एक ही ख्वाहिश है कि उसके घर में शौचालय बन जाए। कलेक्टर इसके लिए उसे 25 हजार रुपए देते हैं।

सुगन और उसका बाप उस पैसे को मुसहर टोला में बाईजी का नाच और गांव वालों को खिलाने-पिलाने में उड़ा देता है । विरोध करने पर बुधनी की पिटाई होती है। वह हिम्मत नही हारती और अंतत़: अस्थाई शौचालय बनवाकर ही दम लेती है। प्रधानमंत्री मन की बात में बुधनी का नाम ले लेते है। उसके इंटरव्यू के लिए पत्रकार मुसहर टोला पहुंच रहे हैं। तब तक सुगन बुधनी के साथ रोजगार की तलाश में दिल्ली जा चुका होता है। वहां की अवैध झुग्गियों का अलग नरक है, जहां सार्वजनिक शौचालयों की हालत बहुत खराब है। अपने गांव से विस्थापित ये लोग अब रेल की पटरियों के किनारे खुले में शौच करने को मजबूर हैं। बुधनी को मीडिया स्टार तो बना देता है पर उसकी आगे कोई मदद नही करता। अवैध झुग्गी बस्ती को बुलडोजर से गिरा दिया जाता है। अब बुधनी पति के साथ दुबारा विस्थापित होकर अपने गांव पेंगरी लौट रही है।

भारतीय पैनोरमा की गैर फीचर फिल्मों में गौतम पांडे और डोएल त्रिवेदी की फिल्म ‘ग्यामो-क्वीन आॅफ द माउंटेंस’ मादा हिम तेंदुआ की तलाश में हमें लद्दाख की 13,500 मीटर ऊंची पहाड़ियों पर ले जाती है। गौतम पांडे मशहूर वाइल्ड लाइफ फिल्मकार माइक पांडे के बेटे हैं। जान की बाजी लगाकर दिल दहलाने वाली स्थितियों में कैमरा ट्रैप के सहारे मादा हिम तेंदुआ ग्यामो की गतिविधियों का फिल्मांकन आसान काम नहीं है। पहाड़ियों में दूर दूर तक उसके पदचिह्नों की तलाश और महीनों उसके निकलने का इंतजार काफी रोमांचक है ।

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