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हमारी याद आएगीः एक ही राह के ‘मुसाफिर’, जो दोबारा कभी नहीं मिले

फिल्मी दुनिया कलाकारों और तकनीशियनों की प्रतिभा से नहीं बल्कि अपनी जरूरतों के हिसाब से चलती है। यही कारण है कि हीरो बनने आए मुकेश को यह दुनिया गायक बना देती है और गायक बनने आए राज खोसला को निर्देशक। हृषिकेश मुखर्जी, जो विज्ञान और गणित की पढ़ाई करने के बाद न्यू थियेटर्स में प्रयोगशाला सहायक के रूप में काम कर रहे थे, के साथ भी यही हुआ। उन्होंने फिल्मी दुनिया में शुरुआत मेंकैमरामैन, संपादक, पटकथाकार के रूप में काम किया। बाद में यही फिल्मी दुनिया उन्हें एक निर्देशक के रूप में सामने लेकर आई। ‘अनाड़ी’, ‘आनंद’, ‘सत्यकाम’, ‘चुपके चुपके’, ‘गोलमाल’, ‘बाबर्ची’, ‘नमक हराम’ जैसी फिल्में बनाने वाले हृषिदा की कल 14वीं पुण्यतिथि थी।

दिलीप कुमार ने ‘मधुमति’ के दौरान हृषिदा को फिल्म निर्देशक बनने की सलाह दी।

हृषिकेश मुखर्जी (30 सितंबर, 1922-27 अगस्त, 2006)

‘एक आदमी है। वह फिल्म का मुख्य किरदार है। फिर एक घर है। बड़ा-सा। उसमें कई कमरे हैं। उसका मालिक जिसे किराए से देता है। तो होता यह है कि एक के बाद एक परिवार उसमें आते हैं। रहते हैं। चले जाते हैं। इस दौरान उस घर में परिवार के लोगों का जन्म होता है। शादियां होती हैं। मौत भी होती है। मतलब किसी ‘मुसाफिर’ की तरह उस घर में लोगों का आना-जाना लगा रहता है। घर अपनी जगह बना रहता है, लोगों की यादों को अपने सीने में दबाए। यह कहानी जो है वह जन्म, विवाह और मृत्यु के इर्दगिर्द घूमती है। तुम इस कहानी को लिखो और इसका निर्देशन करो।’

1957-1958 के दौरान ‘मधुमति’ के फिल्मांकन के बीच इसके हीरो दिलीप कुमार ने एक कहानी का उपरोक्त ‘आइडिया’ संपादक हृषिकेश मुखर्जी को खाली वक्त में सुनाया। एक पल के लिए हृषिदा ने दिलीप कुमार की ओर देखा। फिर कहा, ‘पक्की बात। यह फिल्म नहीं चलेगी।’ दिलीप कुमार बात अनसुनी करते हुए कहने लगे, ‘अगर तुम इस कहानी को लिखते हो। इसका निर्देशन करते हो, तो मैं इस फिल्म में काम करने के लिए तैयार हूं।’ दिलीप कुमार तब मुंबई फिल्मजगत में चोटी के हीरो थे क्योंकि ‘जुगनू’, ‘जोगन’, ‘बाबुल’, ‘हलचल’, ‘दीदार’, ‘अमर’, ‘उड़न खटोला’ जैसी उनकी फिल्में हिट थीं।

बिमल राय की ‘मधुमति’ में हृषिदा संपादक थे। राय ने उन्हें फरवरी 1950 में कोलकाता से मुंबई बुला लिया था। इस दौरान बिमल राय की ‘मां’, ‘दो बीघा जमीन’, ‘परिणिता’, ‘बिराज बहू’ और ‘देवदास’ जैसी फिल्मों का संपादन करने के साथ हृषिदा ने संगीतकार सलिल चौधरी की कहानी ‘रिक्शावाला’ पर 24 पन्नों की पटकथा भी लिखी थी, जिस पर ‘दो बीघा जमीन’ बनी। दिलीप कुमार ने ‘मधुमति’ के दौरान हृषिदा को फिल्म निर्देशक बनने की सलाह दी। ना-नुकुर के बाद आखिर हृषिदा तैयार हो गए। उन्होंने ऋत्विक घटक के साथ मिलकर ‘मुसाफिर’ की कहानी लिखी। ‘मुसाफिर’ बनी और जैसी भविष्यवाणी हृषिदा ने की थी, फिल्म टिकट खिड़की पर टें बोल गई।

दरअसल जन्म, विवाह और मौत पर लिखी गईं तीन अलग-अलग कहानियों को ‘मुसाफिर’ में डाल दिया था। हृषिदा के साथ कलाकारों के इतने अच्छे संबंध थे कि सुचित्रा सेन ने ‘मुसाफिर’ में मात्र पांच हजार रुपए में काम किया था। और कुछ कलाकार तो दो-दो हजार रुपए में उनके साथ काम करके खुश थे। बाद में हृषिदा ने कई सफल फिल्में बनाईं मगर हमेशा अपनी फिल्मों का बजट तार्किक रखा।

यह अद्भुत संयोग रहा कि अपनी पहली फिल्म ‘मुसाफिर’ की असफलता के बाद हृषिदा ने अशोक कुमार, राज कपूर, देव आनंद, धर्मेंद्र, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन जैसे कलाकारों के साथ काम किया और 40 फिल्मों का निर्देशन किया, मगर ‘मुसाफिर’ के बाद दिलीप कुमार के साथ फिर काम नहीं किया। और यह भी संयोग ही है कि हृषिदा की पहली फिल्म ‘मुसाफिर’ की ही तरह आखिरी फिल्म ‘झूठ बोले कौवा काटे’ भी टिकट खिड़की पर असफल साबित हुई थी।

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