होली का त्योहार शुरुआत से ही सिनेमा का हिस्सा रहा है। होली और दिवाली के पर्व ऐसे हैं, जिन्हें हिंदी फिल्मों में दिखाया जा चुका है। आज के दौर में त्योहार का जश्न पर्दे पर दिखाना कोई मुश्किल बात नहीं है, लेकिन समस्या उस समय खड़ी होती है, जब होली के रंगों को दिखाने के लिए रंगीन फिल्में ही नहीं होती थी। जी हां, हम बात उस दौर की कर रहे हैं, जब ब्लैक एंड व्हाइट पदे पर होली के रंगों को दिखाया जाता था। आइए इन मूवीज के बारे में थोड़ा विस्तार से जान लेते हैं।
1930 से लेकर 1940 के दौरान भारतीय सिनेमा में ज्यादातर ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों को शूट किया जाता था। उस समय रंगीन त्योहार को पर्दे पर उतारना मेकर्स के लिए एक बड़ी चुनौती था। इन तमाम परेशानियों के बीच मेकर्स ने रंगों के त्योहार को पर्दे पर दिखाने का अनौखा तरीका निकाला था।
बाद में जब तकनीक में सुधार हुआ, तो पैनक्रोमैटिक फिल्में आई, जिनमें अलग-अलग रंगों के ग्रे के अधिक रिलेटेबल शेड्स में बदलना संभव साबित किया। इसका सबसे बड़ा प्रभाव होली फिल्मों के सीन्स पर ज्यादा पड़ा। उस समय फिल्मों में रंग सीधे तौर पर नजर नहीं आते थे, और इस वजह से कलाकारों के कपड़ों और सेट को अलग-अलग डिजाइन चुने जाते थे, जिससे पर्दे पर ब्लैक एंड व्हाइट में अलग-अलग टोन पैदा हो पाएं। उदाहरण के तौर पर समझा दें कि पीला लाइट पर्दे पर ग्रे बन जाता था। इस तरह फिल्मों में अलग-अलग रंग दिखाने के लिए मेकर्स को तरकीब लगानी पड़ती थी।
यह भी पढ़ें: 7 मिनट 36 सेकेंड का वो सुपरहिट गाना, 67 साल बाद भी नहीं उतरा खुमार
भारत की पहली रंगीन फिल्म कौन-सी थी
साल 1937 में आई किसान कन्या भारत की पहली रंगीन फिल्म थी। इससे पहले हिंदी सिनेमा की ज्यादातर फिल्में ब्लैक एंड व्हाइट आती थीं। इससे पहले मूवीज में हाथ से रंग भरकर कुछ सीन्स को रंगीन बनाया जाता था। खैर, आज का सिनेमा बहुत ज्यादा आधुनिक हो चुका है, और अब वीएफएक्स तकनीक का इस्तेमाल करना बेहद आम हो गया है।
यह भी पढ़ें: Bollywood Celebs Holi 2026: होली के रंगों में डूबा बॉलीवुड, इन सितारों ने धूम-धाम से मनाया त्योहार
