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सिनेमा में इतिहास : हंगामा है यों बरपा

भारतीय मिथक और इतिहास कला, साहित्य, संस्कृति और सिनेमा के सर्वाधिक जीवंत उपजीव्य रहे हैं।

पिछले कुछ सालों में ऐतिहासिक घटनाओं और चरित्रों को केंद्र में रख कर फिल्में बनाने का चलन काफी बढ़ा है। ऐसी फिल्मों के प्रति लोगों का सहज आकर्षण बनता है। मगर सिनेमा में इतिहास को ढालना न सिर्फ कठिन काम है, बल्कि जोखिम भरा भी। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों में बनी कई ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की फिल्में विवाद का विषय बनीं। तथ्यों और नजरिए को लेकर। दरअसल, ऐसी फिल्मों में निर्माता अपने राजनीतिक रुझान भी पिरोते देखे जाने लगे हैं, इससे दर्शक और आलोचक दोनों असहज महसूस करते हैं। ऐसा क्या दबाव है जिसकी वजह से निर्माता ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की फिल्में बनाने को प्रवृत्त होते हैं। बता रहे हैं राजकुमार।

भारतीय मिथक और इतिहास कला, साहित्य, संस्कृति और सिनेमा के सर्वाधिक जीवंत उपजीव्य रहे हैं। वर्तमान को ‘आकार’ देने वाले भी और बिगाड़ने वाले भी। कलात्मक भी और अ-कलात्मक भी। विवादास्पद भी मनोरंजक भी। आधुनिक लेखकों, कलाकर्मियों और फिल्मकारों को मिथक और इतिहास आकर्षित करते रहे हैं। क्योंकि मिथकेतिहास जनसामान्य की स्मृतियों में रचे-बसे होते हैं। उसके प्रति गहरा लगाव और आकर्षण होता है। सिनेमा में उन्हीं स्मृतियों को फिर से जीवंत रूप में देखना एक अनोखा अनुभव होता है। समस्या तब होती है या विवादों का तूफान तब उठ खड़ा होता है जब मिथक और इतिहास में नए प्रयोग के साथ जन-अभिरुचियों के विपरीत चीजों को प्रस्तुत किया जाता है; या तथ्यों, घटनाओं या ‘लोक स्वीकृत नैरेटिव्स’ के साथ मनमाना छेड़छाड़ की जाती है।

हालांकि यह भी उतना ही सच है कि साहित्य, कला, सिनेमा या अन्य सर्जनात्मक माध्यम नए दृष्टिकोण, नए प्रयोग, नए सौंदर्यबोध और परंपरागत तौर-तरीकों तथा लीक से हटने से ही विकसित होते हैं। उसमें ‘बहुवचनीयता’ तभी आती है। ‘पाठ की लोकतांत्रिकता’ भी विकसित होती है। लेकिन उसकी न्यूनतम अर्हत्ता यह रहती है कि इतिहास की धारा में बहते हुए तथ्यों या घटनाओं को बिना बिगाड़े नए प्रयोग किए जाएं। जहां तथ्यों या घटनाओं से अलग हटने या छूट लेने की कोशिश हो, वहां जनरुचियों में लोक स्वीकृति का खयाल बना रहे या महत्तर विचार या संदेश संप्रेषित किए जाएं। इसका सर्वाधिक सुंदर उदाहरण के रूप में के. आसिफ की फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ या सत्यजिय राय की ‘शतरंज के खिलाड़ी’, रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’, गोविंद निहलानी की ‘तमस’ या एमएस सथ्यु की ‘गर्म हवा’ सरीखी फिल्मों को याद किया जा सकता है।

के. आसिफ ने ‘मुगल-ए-आजम’ में इतिहास की पूरी धारा ही बदल दी। महान बादशाह अकबर को उन्होंने तंगदिल तानाशाह बादशाह और शासक की तरह प्रस्तुत किया। उसे प्रेम-विरोधी सामंत, बादशाह और पिता दिखाया। वह कला-विरोधी शासक है। उसके राज्य में कला की कोई कद्र नहीं है। पुत्र की कामना में नंगे पांव जलते रेगिस्तान में भटकने वाला पिता उसी पुत्र के प्रेम-विरोध में उसे कठोर मृत्युदंड की घोषणा करता है। प्रेम करने और हुक्म न मानने पर पुत्र के खिलाफ युद्ध लड़ता है। जिस ‘अकबर द ग्रेट’ को इतिहास ने मध्यकाल का हीरो बनाया था, उसे के. आसिफ ने ‘खलनायक’ बना दिया। अकल्पनीय रूप से इतिहास में भारी हस्तक्षेप करके तथा उसमें रद्दोबदल करके के. आसिफ ने नया फिल्मी इतिहास रच दिया।

वे इतिहास और ऐतिहासिक चरित्रों का इस्तेमाल करते हुए ‘प्रेम, मनुष्यता और कला’ का संसार रचते हैं। वे इतिहास को छेड़कर, तथ्यों को गल्प बना कर कोई राजनीतिक एजेंडा सेट नहीं करते या उसके रास्ते कोई स्वार्थ सिद्धि नहीं करते, बल्कि इतिहास को मानवीय बनाने की कोशिश करते हैं। प्रेम ही समाज में मानवीय करुणा भरता है। प्रेम ही सामंत, बादशाह, राजकुमार और कनीज के बीच के वर्ग-भेद को मिटाता है।

प्रेम में संघर्ष करने और जीने की जिजीविषा होती है। प्रेम ही समाज में बदलाव का बड़ा कारक सिद्ध होता है। के. आसिफ इतिहास की खोल में तथ्यों को पिघलाकर ‘मनुष्यता’, ‘प्रेम’ और संघर्ष को भर देते हैं। यह इतिहास का विरूपण नहीं, बल्कि उसे खींच कर दो कदम आगे लाने की कोशिश है। इतिहास अतीत का दोहराव भर नहीं, बल्कि भविष्य को संवारने और अनंत संभावनाओं से लैस सुंदर और मानवीय दुनिया की कल्पना भी है। के. आसिफ ऐतिहासिक चरित्रों का इस्तेमाल करते हुए संभव ‘मानवीय दुनिया’ की कल्पना करते हैं।

‘शतरंज के खिलाड़ी’ को विशुद्ध सत्यजित राय की फिल्म और लेखन के रूप में देखा जाना चाहिए। सत्यजित राय ने प्रेमचंद की कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के समांतर फिल्म बनाई है। प्रेमचंद ने ईस्ट इंडिया कंपनी की राजनीतिक सत्तात्मक खेल, धूर्तता तथा भारतीय सामंतों की विलासिता और चारित्रिक पतन का अवध में जो प्रक्षेपण दिखाया उसे सत्यजित राय ने उसी मुहावरे में न सिर्फ बदलाव किया, बल्कि 1970 के दशक में भारतीय राजनीति में चल रही तिकड़मबाजी, दाव-पेंच, धूर्तता, शह-मात के खेल में बदल दिया। दोनों इतिहास में दर्ज वाजिदअली शाह के समय की घटनाओं को शतरंज के खेल के माध्यम से भारतीय राजनीतिक अध:पतन को रूपक में बांधते हैं। फिल्म और कहानी के बीच न्यूनतम आवाजाही है। एक किस्म से प्रेमचंद की कहानी का छायाभास भर है। फिल्म की ‘स्वायत्तता’ प्रेमचंद की कहानी से अलग अपनी पहचान बनाती है।

फिल्म में यह औदात्य के. आसिफ या सत्यजित राय की अंत:दृष्टि का कमाल है। लेकिन क्या यही बात हम फिल्म ‘सम्राट पृथ्वीराज’, ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘ताशकंद फाइल्स’, ‘मणिकर्णिका’, ‘तानाजी’, ‘केजीएफ चैप्टर-1’, ‘केसरी’, ‘द गाजी अटैक’, ‘बाजीराव मस्तानी’, ‘पानीपत’, ‘पद्मावत’, ‘मोहनजोदाड़ो’ या ‘अशोका’ आदि के संदर्भ में कह सकते हैं? क्या ये फिल्में अपनी कलात्मक सौंदर्य के लिए चर्चा में रहीं या खास राजनीतिक एजेंडा रचने की विफलता की शिकार हुई।

बदला दौर बदला मिजाज

नब्बे के दशक में दो बातें एक साथ हुर्इं। एक तो नवउदारवादी अर्थव्यवस्था लागू हुई और दूसरी तरफ दक्षिणपंथ का तेज राजनीतिक उभार हुआ। इसमें एक नई तरह की आक्रामकता आई। तेज सामाजिक बिखराव को समेटने के लिए आशुतोष गोवारिकर ने फिल्म ‘लगान’ बनाई। इस फिल्म ने ‘लगान’ के बहाने ‘राष्ट्रवाद’ को उभारा। ‘लगान से मुक्ति’ का एजेंडा ब्राहमण और दलित, हिंदू-मुसलमान-सिख सबको एक पिच और ग्राउंड पर उतारा। संगठित भारतीय की जीत ब्रिटिश उपनिवेश के खिलाफ होती है। यह फिल्म क्रिकेट के रूपक में सामाजिक और राजनीतिक विभाजन के खिलाफ ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ उत्पन्न करता है। जाति-वर्ण और धर्म के विभाजन के खिलाफ एक मुहिम की तरह फिल्म को रचा जाता है। आशुतोष गोवारिकर ने अपनी कई फिल्में इतिहास के राष्ट्रवादी एजेंडे के भीतर ही बनाई। मसलन, पानीपत, मोहेनजोदाड़ो, जोधा-अकबर, स्वदेश आदि।

‘जोधा अकबर’ भारतीय संस्कृति की गंगा-जमुनी तहजीब के तहत बनाई गई। इतिहास के अंत के दौर में वे इतिहास को पुनर्निमित करते हैं। लघुवृत्तांतों के चलन के दिनों में महावृत्तांत रचते हैं। वे अकबर की महानता को पुन: प्रक्षेपित करते हैं। उसे हिंदू संस्कृति और मुसलिम संस्कृति का वाहक बना कर। अकबर को हिंदुस्तान के सच्चे और दूरगामी सोच के बादशाह की तरह पेश करते हैं। संवाद भी इस तरह रखे गए हैं जिसमें वह कहता है कि हम लुटेरे नहीं हैं। यह हमारी मातृभूमि है। उसके फैसले हिंदुओं के लिए भी सुकुनदेह हैं। वे मध्यकाल का महावृत्तांत ‘जोधा अकबर’ के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। के. आसिफ के यहां अकबर प्रेम-विरोधी चरित्र है, तो आशुतोष गोवारिकर के यहां मानवीय और प्रेम से परिपूर्ण।

मलिक मुहम्मद जायसी की रचना ‘पदमावत’ पर कई फिल्में बनीं। जसवंत झावेरी ने ‘महारानी पद्मिनी’ (1964) में बनाई। मणि कौल ने ‘द क्लाउड डोर’ 1994 में और संजय लीला भंसाली ने ‘पद्मावती’ 1918 में बनाई। जसवंत झावेरी ने साहित्य, इतिहास और मिथक से सर्वाधिक छूट लेकर विश्व युद्धों और तात्कालिक भारत-चीन युद्धों की छाया में फिल्म का निर्माण किया। साहित्य बहुत पीछे छूट गया और इतिहास को भी तोड़ा-मरोड़ा गया। बादल, अलाउद्दीन की गोद में दम तोड़ते हुए कहता है- युद्ध लड़ने वाला व्यक्ति अगर बच्चे को अपना बच्चा मान ले, तो दुनिया में कोई बच्चा यतीम न रहे। पद्मिनी और अलाउद्दीन की मलिका दोनों एक-दूसरे की पति की रक्षा के लिए बगावत करती हैं और तलवारों के सामने अपने को खड़ा करती हैं।

दोनों बहनापे के एक ‘नए रिश्ते’ में बंधी हैं। उनकी रणनीतियां सियासी कुर्सी को षड्यंत्र के शिकार रूप में दिखाती है। अलाउद्दीन पत्नी के कहने पर युद्ध रोकने निकलता है, लेकिन तब तक रतनसेन मारा जाता है। लेकिन वह अलाउद्दीन की बांहों में दम तोड़ता है। अलाउद्दीन उसे मित्र संबोधित करता है और कहता है- ‘हमारी यह फतह इतिहास की सबसे बड़ी शिकस्त है।’ जाहिर है यह फिल्म मध्यकालीन बर्बरताओं और अत्यचारों की कथा नहीं कहती, बल्कि उस कथा की खोल फाड़कर आजाद भारत में एक नए बनते हुए रिश्ते और मानव मूल्यों की कथा कहती है। न्याय और इंसाफ की आवाजें उठती हैं। युद्ध की मर्दवादी सोच का प्रतिकार करती यह फिल्म स्त्रियों और बच्चों के हक में खड़ा रहने का संदेश देती है।

मगर यही बात हम संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ के संदर्भ में नहीं कह सकते। यह फिल्म नए सिरे से राजनीति को प्रक्षेपित करता है। जायसी ने ‘हिंदू-तुरकन भई लड़ाई’ जैसे तथ्य से आगे बढ़ कर प्रेम की कहानी जग में रहे- के रूप में कथा प्रस्तावित किया। भंसाली की दृष्टि ने शुरू से ही अलाउद्दीन के चरित्र को बर्बर, हिंसक, आतताई, लुटेरा, धूर्त, हत्यारा, स्त्रीखोर की तरह चिह्नित किया। यह साहित्य से बाहर आजकल की राजनीतिक फिजाओं में फैले पूर्वाग्रहों पर आधारित कल्पना की देन है। फिल्म में दो अलग संस्कृतियों की टकराहट भी साफ देखी जा सकती है। जबकि संजय लीला भंसाली की फिल्में शुरू से ही ‘प्रेम की त्रासदी’ को अभिव्यक्त करते हुए आगे बढ़ी है। ‘देवदास’ से लेकर ‘बाजीराव मस्तानी’ तक में प्रेम की त्रासदी है। पद्मावत भी प्रेम की त्रासदी ही है, लेकिन फिल्म के नैरेटिव में तात्कालिक राजनीतिक हलचल का दबाव है। जायसी दिखाते हैं कि रतनसेन एक हिंदू राजा के हाथों मारा गया, लेकिन भंसाली उसे उलट देते हैं।

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