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फिल्म हेलिकॉप्टर इला की समीक्षा: मां-बेटे का ‘मुश्किल’ पर खूबसूरत रिश्ता

‘हेलिकॉप्टर इला’ में काजोल बनी हैं सिंगल मदर इला रायतुरकर। इला अपने बल पर अपने बेटे विवान को पालती है। अब सवाल यह उठता है कि इला का पति कहां है तो जवाब यह है कि इला का पति अरुण (तोता रॉय चौधरी) उसे छोड़कर चला गया है। अरुण के घर छोड़ने की वजह भी बड़ी ही हास्यास्पद है।

निर्देशक- प्रदीप सरकार, कलाकार-काजोल, ऋद्धि सेन, तोता रॉय चौधरी, नेहा धूपिया।

अगर कॉलेज में पढ़ने वाले किसी लड़के की मां उसी के कॉलेज और कक्षा में दाखिला ले ले तो क्या हालात होंगे। जाहिर है लड़के को शर्मिंदगी होगी। लेकिन वो कर भी क्या सकता है क्योंकि मां तो आखिर मां होती है। अब दर्शकों को यही देखना है कि मां और बेटे एक-दूसरे के साथ कैसे निभाएंगे, कॉलेज में भी और घर में भी। जी हां, कुछ ऐसी ही कहानी है इस हफ्ते रिलीज हुई फिल्म ‘हेलीकॉप्टर इला’ की, जिसमें इला यानी मां बनी हैं काजोल और उनके टीनएज बेटे बने हैं ऋद्धि सेन। जहां तक फिल्म का मामला है, तो मां-बेटे की यह जोड़ी दर्शकों को पसंद आएगी या नहीं, यह तो आने वाले दिनों में ही पता चल पाएगा। ‘हेलिकॉप्टर इला’ में काजोल बनी हैं सिंगल मदर इला रायतुरकर। इला अपने बल पर अपने बेटे विवान को पालती है। अब सवाल यह उठता है कि इला का पति कहां है तो जवाब यह है कि इला का पति अरुण (तोता रॉय चौधरी) उसे छोड़कर चला गया है। अरुण के घर छोड़ने की वजह भी बड़ी ही हास्यास्पद है।

अरुण के परिवार में कोई भी पुरुष चालीस साल की उम्र से ज्यादा नहीं जीता है। इसलिए मरने की आशंका से वह घर छोड़कर चला जाता है। खैर, अरुण के जाने के बाद इला अकेले अपने बेटे विवान (ऋद्धि सेन) की परवरिश करती है। अकेली मां होने के कारण वह बेटे को लेकर काफी पोजेसिव रहती है, जिससे उसके बेटे को एक मिनट का भी चैन नहीं मिलता। युवावस्था में इला काफी अच्छा गाना गाती थी, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों की वजह उसका यह शौक बीच में ही खत्म हो गया। हर वक्त की जासूसी से परेशान विवान इला से कहता है कि अपने लिए कुछ करो और मेरी जिंदगी में दखल मत दो। लेकिन मां तो मां है, वो बेटे के कॉलेज और उसी की कक्षा में दाखिला ले लेती है। इसके बाद शुरू होती है कॉलेज से लेकर घर तक मां-बेटे की किचकिच।

‘हेलिकॉप्टर इला’ शुरुआती हिस्से में काफी बोर करती है। इस हिस्से को इतनी जल्दबाजी में दिखाया गया है कि दर्शकों का मन ही नहीं लगता। मध्यांतर के बाद फिल्म थोड़ी सी संभलती है और अंत में जाकर दूसरी बॉलीवुड फिल्मों की तरह जज्बाती हो जाती है। शुरुआती दृश्यों में तो लगता है कि मां यानी इला बिल्कुल झक्की है और अपने झक्कीपन की वजह से अपने बेटे की जिंदगी बर्बाद कर रही है। काजोल उस उम्र में पहुंच गई हैं, जहां अभिनेत्रियों का करियर नई दिशा में मुड़ जाता हैं, लेकिन शायद वह अभी भी इस जिद पर अड़ी हैं कि वो फिल्मों में लीड रोल ही करेंगी।

हालांकि इस बात में शक नहीं है कि वह इस कदर फिट हैं कि कॉलेज में दूसरे लड़के-लड़कियों की मां बिल्कुल नहीं लगती हैं। जैसे आमिर खान ने अपनी उम्रदराज छवि को तोड़ते हुए ‘थ्री इडियट्स’ में इंजीनियरिंग स्टूडेंट का किरदार निभाया था, काजोल भी उसी तरह उम्र की छवि तो तोड़ती हैं। निर्देशक प्रदीप सरकार ने एक गलती यह की है कि फिल्म के शुरुआती हिस्सों को ठीक से संवारा नहीं है। इसलिए बड़ी देर तक दर्शकों को फिल्म पकाऊ लगती है, ऐसे में अगर दर्शक आधी फिल्म के बाद सिनेमा हॉल छोड़कर जाने लगें तो हैरानी नहीं होगी। आनंद गांधी के गुजराती नाटक ‘बेटा कागदू’ पर आधारित यह फिल्म थोड़ी और तैयारी के साथ बनाई जाती तो बेहतर बनती।

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