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हमारी याद आएगीः सोने के पदक से सोने की लंका तक

अरोड़ा को जिस ‘यादों की बरात’ से सफलता मिली थी, उसे हिंदी फिल्मों की पहली मसाला फिल्म माना जाता है। 1973 में अमिताभ की ‘जंजीर’ से एक्शन फिल्मों और धर्मेंद्र की ‘यादों की बरात’ से मसाला फिल्मों का दौर साथ-साथ शुरू हुआ था।

अभिनेता विजय अरोड़ा 75वीं जयंती पर खास रिपोर्ट

पुणे के फिल्म और टीवी संस्थान ने भारतीय सिनेमा को कई महत्वपूर्ण कलाकार और तकनीशियन दिए। यहां से अभिनेता डैनी निकले, तो डेविड धवन भी। सतीश कौशिक निकले तो संजय लीला भंसाली भी। संस्थान के शत्रुघ्न सिन्हा फिल्मों में छाए, तो जया भादुड़ी का नाम पूछते पूछते हृषिकेश मुखर्जी पुणे संस्थान जा पहुंचे थे। वजह यह थी कि सिनेमा की दुनिया को जैसे प्रशिक्षित कलाकार और तकनीशियन चाहिए थे, वे इस संस्थान ने तैयार करके दिए। इसी संस्थान से अभिनय में गोल्ड मैडल लेकर निकले थे अभिनेता विजय अरोड़ा, जिनकी आज 75वीं जयंती है। पहली मसाला फिल्म ‘यादों की बरात’ और धारावाहिक ‘रामायण’ में दहाड़ते इंद्रजीत यानी मेघनाथ की भूमिका ने अरोड़ा को घर घर पहुंचा दिया था।
फिल्मों की दुनिया में लगातार मेहनत करने के बावजूद कोई हुनरमंद पहचान बनाने को तरस जाता है, तो कोई बिना किसी खास मेहनत के रातोरात करोड़ों दिलों की धड़कनें बन जाता है। 1973 में विजय अरोड़ा जब जीनत अमान के साथ ‘यादों की बरात’ में ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को…’ गाते नजर आए तो लगा था कि वह जल्दी ही हिट हीरो बन जाएंगे। फिल्म सुपर हिट थी इसलिए चार फिल्में कर चुके विजय अरोड़ा को राजेश खन्ना की टक्कर का कलाकार माना जा रहा था। फिल्मजगत में सफलता के अलावा किसी की पूछ नहीं होती। तो हुआ यूं कि कुछ फिल्मों ने औसत कारोबार किया और देखते ही देखते अरोड़ा मल्टीस्टारर फिल्मों की छोटी-मोटी भूमिकाओं में समेट दिए गए।

पुणे फिल्म संस्थान से अभिनय में सोने का पदक लेकर बाहर निकले विजय अरोड़ा की पहली फिल्म थी ‘जरूरत’, जिसे बनाया था ‘चेतना’ (1970) जैसी बोल्ड फिल्म बनाने वाले निर्देशक बीआर इशारा ने। इसमें एक नई लड़की सायरा अली को लिया गया था, जिसे बाद में रीना राय के नाम से जाना गया। इशारा ने पुणे फिल्म संस्थान से डैनी को लिया और सायरा अली (रीना राय) को हीरोइन बना ‘नई दुनिया नए लोग’ शुरू की थी, जो लटक गई। तब इशारा ने रीना राय को विजय अरोड़ा की हीरोइन बनाकर झटपट नई फिल्म ‘जरूरत’ शुरू कर दी। ‘नई दुनिया नए लोग’ दो साल बाद रिलीज हुई।

अरोड़ा को जिस ‘यादों की बरात’ से सफलता मिली थी, उसे हिंदी फिल्मों की पहली मसाला फिल्म माना जाता है। 1973 में अमिताभ की ‘जंजीर’ से एक्शन फिल्मों और धर्मेंद्र की ‘यादों की बरात’ से मसाला फिल्मों का दौर साथ-साथ शुरू हुआ था। इसके बाद अरोड़ा को राजेश खन्ना की ‘रोटी’ और ऋषि कपूर की ‘सरगम’, जैसी कई सफल फिल्मों में छोटी भूमिकाएं करके संतोष करना पड़ा। कहां जीनत अमान के हीरो और कहां छिटपुट भूमिकाओं में एक-दो सीन। जिस विजय अरोड़ा का भविष्य उज्ज्वल नजर आ रहा था, वह गुमनामी में जा रहे थे।

लेकिन फिल्मों की दुनिया में किसकी किस्मत कब बदल जाए, कहा नहीं जा सकता। पुणे फिल्म संस्थान से अभिनय में गोल्ड मैडल लेकर निकले सुभाष घई हीरो के रूप में नहीं निर्देशक के रूप में खूब चले। फिल्म संस्थान से अरोड़ा को जो सोने का तमगा मिला था, उसकी चमक फीकी पड़ती जा रही थी। ‘यादों की बरात’ आए 16 साल गुजर गए। लोग अरोड़ा को भूलने लगे थे। अचानक वक्त बदला। पुणे संस्थान से सोने का पदक लेकर निकले अरोड़ा सीधे सोने की लंका में पहुंच गए। 1989 में रामानंद सागर ने टीवी धारावाहिक ‘रामायण’ बनाया तो उसमें अरोड़ा को मेघनाद की भूमिका मिली। भूमिका थी तो छोटी, मगर जिस तेवर के साथ अरोड़ा ने उसने निभाया, उसने वापस उन्हें चर्चा में ला दिया। ‘रामायण’ से अरोड़ा भी घर घर पहुंचे, फिर भुला दिए गए। दस साल बाद 1999 में वह संजय दत्त की हिट फिल्म ‘वास्तव’ से चर्चा में आए थे, जिसमें वह एक्टर नहीं कैमरामैन थे।

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