गुरु दत्त हिंदी सिनेमा के उन महान फिल्मकारों में शामिल हैं, जिनकी फिल्में आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं। 9 जुलाई 1925 को जन्मे गुरु दत्त की आज 101वीं जयंती है। इस मौके पर हम आपको उनकी एक ऐसी फिल्म के बारे में बताने जा रहे हैं जो बड़ी क्लासिक साबित हुई। लेकिन उस फिल्म को पहले काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था।
उनकी ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’, ‘साहिब बीबी और गुलाम’ और ‘चौदहवीं का चांद’ जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने भारतीय सिनेमा को नई पहचान दी। उनकी फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि समाज और इंसानी भावनाओं को भी बेहद खूबसूरती से पर्दे पर दिखाती हैं। यही वजह है कि आज भी उनकी फिल्में दर्शकों और फिल्मकारों के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं।
मगर क्या आप जानते हैं कि उनकी सुपरहिट फिल्म ‘प्यासा’ वो फिल्म थी, जिसे डिस्ट्रीब्यूटर्स खरीदना नहीं चाहते थे। उनकी ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कमर्शियल हिट थी। 1957 में आई इस फिल्म ने करीब 3 करोड़ का कलेक्शन किया था। जो आज के समय में करीब 200 करोड़ के बराबर है।
कर्मशियल सिनेमा के फॉर्मुले पर नहीं बनी थी गुरु दत्त की ‘प्यासा’
इस फिल्म की कहानी एक दुखी और असफल कवि पर आधारित थी। ये एक ऐसी फिल्म थी जो उस समय के कमर्शियल सिनेमा के फॉर्मूले से बिल्कुल अलग थी। ऐसे में ड्रिस्ट्रीब्यूटर्स इस फिल्म पर पैसा लगाने का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। लेकिन गुरु दत्त अपने विजन पर अडिग रहे। उन्होंने फिल्म को उसी रूप में बनाया, जैसा वह चाहते थे।
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एक संघर्ष कर रहे कवि की कहानी थी ‘प्यासा’
दरअसल 1950 के दशक में हिंदी सिनेमा में सामाजिक संदेश वाली फिल्में बनती थीं, लेकिन दर्शकों के बीच रोमांस, पारिवारिक ड्रामा और मनोरंजन वाली फिल्मों का दबदबा अधिक था। ऐसे समय में ‘प्यासा’ जैसी फिल्म का विषय काफी अलग था। फिल्म का हीरो कोई विजेता नहीं, बल्कि एक ऐसा कवि था जो संघर्ष कर रहा है लेकिन समाज उसे बार-बार ठुकरा देता है।
क्यों डिस्ट्रीब्यूटर्स को नहीं था फिल्म पर विश्वास
फिल्म में गरीबी, बेरोजगारी, लालच, दिखावा, स्वार्थ और साहित्य की अनदेखी जैसे गंभीर मुद्दों को दिखाया गया था। इसमें गाने-डांस या पारंपरिक मसाला मनोरंजन कम था। इसी वजह से कई डिस्ट्रीब्यूटर को लगा कि यह फिल्म आम दर्शकों को पसंद नहीं आएगी और बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलेगी। इसलिए शुरुआत में उन्होंने फिल्म खरीदने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई।
गुरु दत्त ने नहीं बदली अपनी सोच
उस दौर में अक्सर निर्माता और निर्देशक डिस्ट्रीब्यूटर की सलाह पर फिल्म में बदलाव कर देते थे, लेकिन गुरु दत्त ने ‘प्यासा’ की कहानी या उसके संदेश से कोई समझौता नहीं किया,क्योंकि उन्हें खुद के काम पर भरोसा था।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत
‘प्यासा’ की सबसे बड़ी ताकत उसकी कहानी के साथ-साथ उसका म्यूजिक भी था। साहिर लुधियानवी के लिखे गीत और एस.डी. बर्मन का संगीत फिल्म की आत्मा बन गए। ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’, ‘जाने वो कैसे लोग थे’, ‘जिन्हें नाज है हिंद पर’ और ‘आज सजन मोहे अंग लगा लो’ जैसे गीत आज भी हिंदी सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ गीतों में गिने जाते हैं।
फिल्म में वहीदा रहमान ने गुलाबो का किरदार निभाया, जबकि माला सिन्हा ने मीना की भूमिका निभाई। जॉनी वॉकर ने भी अहम भूमिका निभाई थी। रिलीज के बाद फिल्म की कहानी, अभिनय, गीत, संवाद और वी.के. मूर्ति की ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमैटोग्राफी की जमकर तारीफ हुई। समय के साथ ‘प्यासा’ सिर्फ एक सफल फिल्म नहीं रही, बल्कि भारतीय सिनेमा की सबसे महान फिल्मों में शामिल हो गई।
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गुरु दत्त का फिल्मी सफर
गुरु दत्त का फिल्मी करियर करीब 18 सालों का रहा। इस दौरान उन्होंने भारतीय सिनेमा को कई अमर फिल्में दीं। वे सिर्फ अभिनेता और निर्देशक नहीं, बल्कि ऐसे दूरदर्शी फिल्मकार थे जिन्होंने अपनी फिल्मों में समाज, प्रेम, अकेलेपन और मानवीय संवेदनाओं को बेहद प्रभावशाली ढंग से पेश किया।
1944 में उन्होंने पुणे की प्रभात फिल्म कंपनी में कोरियोग्राफर और सहायक निर्देशक के रूप में करियर शुरू किया था। यहीं उनकी मुलाकात देव आनंद से हुई थी और यहीं से उनके करियर में चार चांद लग गए। 1951 में देव आनंद की फिल्म ‘बाजी’ से उन्होंने निर्देशन में कदम रखा। पहली ही फिल्म की सफलता ने उन्हें हिंदी सिनेमा के प्रतिभाशाली निर्देशकों की कतार में खड़ा कर दिया। इसके बाद ‘जाल’, ‘आर-पार’, ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ और ‘बाज’ जैसी सफल फिल्में आईं।
1955 में उन्होंने गुरु दत्त फिल्म्स की स्थापना की और 1957 में आई ‘प्यासा’ ने उन्हें अमर बना दिया। समाज की संवेदनहीनता और एक कलाकार के संघर्ष को दिखाने वाली यह फिल्म आज भी भारतीय ही नहीं, विश्व सिनेमा की महानतम फिल्मों में गिनी जाती है।
गुरु दत्त के बारे में
गुरु दत्त का असली नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण था। उनका जन्म कर्नाटक की धरती पर हुआ था, लेकिन जिसकी रचनात्मक विरासत पूरी दुनिया में सराही जाती है। हालांकि उनकी पेशेवर जिंदगी जितनी सफल रही, निजी जिंदगी उतनी ही अकेली और दर्दभरी थी। दो बार प्यार मिलने के बावजूद उन्हें सच्चा सुकून नसीब नहीं हुआ। रिश्तों की उलझनों, मानसिक संघर्षों और भीतर के अकेलेपन ने उन्हें हमेशा घेरकर रखा। यही वजह रही कि करोड़ों दिलों पर राज करने वाला यह महान कलाकार अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव में भी गहरे अकेलेपन से जूझता रहा। उनकी जिंदगी की यह तन्हाई आज भी उनके प्रशंसकों को भावुक कर देती है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…
