गुरु दत्त साहब का नाम हिंदी सिनेमा में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। वह फिल्ममेकर और अभिनेता थे। उनका जन्म कर्नाटक के बेंगलुरु में 9 जुलाई, 1925 को हुआ था और उन्होंने ‘आर पार’, ‘कागज के फूल’, ‘प्यारसा’, ‘बाजी’, ‘साहिब बीबी’ और ‘गुलाम’, ‘चौदहवीं का चांद’, ‘भरोसा’ सहित कई फिल्में बनाई थीं। वहीं, अभिनेता के निजी जीवन की बात करें, तो उन्होंने साल 1953 में दिग्गज सिंगर गीता दत्त से शादी की थी। कहा जाता है कि उस समय वह 28 साल के थे।

एक तरफ गीता जहां बॉलीवुड का बड़ा नाम थीं, वहीं गुरु दत्त संघर्ष कर रहे थे। जब गीता और गुरु दत्त पहली बार मिले, तब गुरु अपनी पहली फिल्म ‘बाजी’ का निर्देशन कर रहे थे, जबकि गीता रॉय उस दौर की सबसे लोकप्रिय गायिकाओं में से एक थीं। उन्हें फिल्म के लिए ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले’ गाना गाने के लिए चुना गया था और यहीं से दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और जल्द ही वे एक-दूसरे को पसंद करने लगे। लेकिन उस समय दोनों की आर्थिक स्थिति में बड़ा अंतर था।

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गीता अपने घर की अकेली कमाने वाली सदस्य थीं और परिवार उनकी कमाई पर निर्भर था। इसलिए वे नहीं चाहते थे कि गीता शादी करें। इसी वजह से दोनों को शादी करने में करीब तीन साल लग गए। गुरु दत्त की बहन ललिता लाजमी ने लेखिका नसरीन मुन्नी कबीर की किताब ‘गुरु दत्त: अ लाइफ इन सिनेमा’ में इस बात का जिक्र किया था। उन्होंने लिखा, “हम सब उन्हें बहुत पसंद करते थे। वह बेहद अच्छी और दिल की साफ बंगाली महिला थीं। बड़ी कार में आती थीं, लेकिन बिल्कुल भी घमंडी नहीं थीं। जब उनकी कोई रिकॉर्डिंग नहीं होती थी, तो घर आकर रसोई में भी मदद करती थीं।”

शादी के बाद बदले हालात

जब दोनों की शादी हुई, तब गुरु दत्त का करियर आगे बढ़ रहा था, लेकिन उन्होंने अभी पूरी तरह इंडस्ट्री में अपनी पहचान नहीं बनाई थी। वहीं गीता पहले से ही बड़ी स्टार थीं। इसी वजह से कई लोगों ने यह अफवाह फैलाई कि गुरु दत्त ने गीता से उनकी शोहरत और पैसे की वजह से शादी की है। गुरु दत्त की मां वसंती पाडुकोण ने ‘इम्प्रिंट’ मैगजीन से बातचीत में कहा था, “लोग और रिश्तेदार कहते थे कि गुरु दत्त ने गीता से उनके पैसे और बड़े नाम की वजह से शादी की है।”

हालांकि, उनका मानना था कि यह बात पूरी तरह गलत थी। लेकिन उन्हें शुरू से ही महसूस होता था कि यह शादी शायद कभी खुशहाल नहीं रह पाएगी। उन्होंने कहा, “मुझे हमेशा लगता था कि गुरु दत्त और गीता की शादी सफल नहीं होगी। एक कारण यह था कि उन दिनों गीता हजारों रुपये कमाती थीं, जबकि गुरु दत्त की आमदनी उनसे काफी कम थी। दूसरा, दोनों बहुत जिद्दी थे और कोई भी झुकने को तैयार नहीं होता था। तीसरा, गुरु दत्त पर परिवार की कई जिम्मेदारियां थीं।”

बढ़ती दूरियां और वहीदा रहमान की चर्चा

समय के साथ दोनों के बीच मतभेद बढ़ने लगे। गुरु दत्त को गीता का दोस्तों का दायरा पसंद नहीं था। उन्हें यह भी पसंद नहीं था कि गीता शराब पीती थीं, जबकि वे खुद भी शराब पीते थे। उनकी मां ने बताया था, “गुरु दत्त महिलाओं का ज्यादा शराब पीना बिल्कुल पसंद नहीं करते थे। कई मामलों में वह पुराने विचारों वाले थे। उन्हें पार्टियां और तथाकथित महिला स्वतंत्रता का दिखावा पसंद नहीं था। वह दिल से भारतीय थे। इसी वजह से गुरु दत्त और गीता धीरे-धीरे एक-दूसरे से दूर होते जा रहे थे। यह देखना बहुत दुखद था, लेकिन किसी में उन्हें फिर से करीब लाने की हिम्मत नहीं थी।”

समय के साथ गुरु दत्त को गीता के करियर से भी दिक्कत होने लगी। उनका मानना था कि अब गीता पहले जैसी बड़ी स्टार नहीं रहीं, इसलिए उन्हें सिर्फ उनकी फिल्मों के लिए ही गाना चाहिए। तब तक हालात पूरी तरह बदल चुके थे। अब गुरु दत्त गीता से कहीं ज्यादा मशहूर हो चुके थे। लेखक बिमल मित्र ने अपनी किताब बिनिद्रा में लिखा कि उन्होंने एक बार गुरु दत्त से पूछा था कि वह गीता को दूसरी फिल्मों में गाने से क्यों रोकते हैं।

इस पर गुरु दत्त ने कहा कि गीता पहले जैसी सफल नहीं रहीं और जब कोई कलाकार अपने शिखर पर पहुंच जाए, तो उसे रुक जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा, “लेकिन मैं उन्हें अपनी सभी फिल्मों में गाने देता हूं।” इस पर बिमल मित्र ने उनकी इस सोच पर सवाल उठाया था।

गीता के लिए सिर्फ उनके करियर में दखल ही परेशानी की वजह नहीं थी। पूरे फिल्म जगत की तरह उन्होंने भी गुरु दत्त और वहीदा रहमान के रिश्ते की चर्चाएं सुन रखी थीं। गीता अपने पति और वहीदा के कथित रिश्ते के बारे में जानने के लिए कई लोगों से पूछताछ करने लगीं। तब तक दोनों दो बेटों के माता-पिता भी बन चुके थे। एक बार गीता, गुरु दत्त के करीबी दोस्त और लेखक-अभिनेता अबरार अल्वी के घर भी पहुंच गईं।

उन्होंने उनसे सीधे पूछा कि क्या उन्हें गुरु दत्त और वहीदा के रिश्ते के बारे में कुछ पता है। अबरार ने इस बात से साफ इनकार कर दिया, जबकि उन्हें मालूम था कि गुरु और वहीदा का रिश्ता सिर्फ पेशेवर नहीं माना जाता था। अबरार अल्वी गुरु दत्त के बेहद करीबी दोस्तों में थे और उनके जीवन के आखिरी वर्षों में लगभग हमेशा उनके साथ ही रहते थे।

गीता और गुरु दत्त के रिश्ते की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गीता को अपने पति पर भरोसा नहीं रह गया था। यासिर उस्मान की किताब ‘गुरु दत्त: एन अनफिनिश्ड स्टोरी’ में गुरु दत्त की मां वसंती पाडुकोण के हवाले से लिखा गया है कि गीता स्वभाव से जलन महसूस करने वाली और गुस्सैल थीं। साथ ही वह लोगों की बातों में जल्दी आ जाती थीं, इसलिए कई लोग इसका फायदा उठाने की कोशिश करते थे।

एक बार गीता ने खुद एक चिट्ठी लिखी और उस पर वहीदा रहमान के नाम से हस्ताक्षर कर दिए। सत्या सरन की किताब ‘टेन इयर्स विद गुरु दत्त: अबरार अल्वीज जर्नी’ में अबरार अल्वी ने बताया कि गुरु दत्त ने उन्हें वह चिट्ठी दिखाई थी। वह एक प्रेम पत्र जैसी लग रही थी, जिसमें लिखा था कि गुरु दत्त एक तय जगह पर आकर वहीदा से मिलें।

गुरु दत्त को पूरा यकीन था कि वहीदा ऐसा पत्र कभी नहीं लिख सकतीं। उन्हें शक हुआ कि इसके पीछे गीता हैं। सच जानने के लिए वह अबरार के साथ उस जगह पहुंचे। वहां उन्होंने गीता की कार आते देखी। अबरार ने लिखा, “मुझे लगता है यह पहली बार था। उस रात घर लौटकर गुरु दत्त ने गीता से इस बारे में बात की और बाद में उन्होंने खुद मुझसे माना कि उन्होंने गुस्से में उन पर हाथ उठा दिया था।”

क्या आप चाहते हैं कि मैं वहीदा रहमान से भी बदतर दिखूं: गीता

इसी दौरान गीता को आर्थिक झटके भी लगे। उनके भाई ने उनकी तरफ से ‘सैलाब’ नाम की फिल्म बनाई, लेकिन फिल्म में उनका सारा पैसा डूब गया। वर्षों तक परिवार का सहारा बनने के बाद गीता खुद आर्थिक संकट में आ गईं। घर में भी हालात अच्छे नहीं थे। उन्हें यह स्वीकार करना मुश्किल हो रहा था कि गुरु दत्त उन्हें छोड़कर वहीदा रहमान को अपनी प्रेरणा मानने लगे थे। अपनी शादी बचाने की कोशिश में गुरु दत्त ने गीता के साथ एक बंगाली फिल्म ‘गौरी’ बनाने का फैसला किया।

गीता अभिनेत्री नहीं थीं, लेकिन गुरु दत्त ने उन्हें फिल्म की मुख्य भूमिका दी और खुद हीरो बनने का निर्णय लिया। फिल्म की शूटिंग कोलकाता में शुरू हुई। लेखक नबेंदु घोष ने अपनी आत्मकथा ‘एका नौकर यात्री’ में लिखा है कि शूटिंग के शुरुआती दिनों में एक दिन पूरी यूनिट गीता का इंतजार कर रही थी। गुरु दत्त अधीर हो रहे थे। जब गीता आखिरकार सेट पर पहुंचीं, तो गुरु दत्त उनके मेकअप से बेहद नाराज हो गए। उनका मानना था कि गीता ने जानबूझकर उनके निर्देशों को नजरअंदाज किया है।

दोनों के बीच सबके सामने जोरदार बहस शुरू हो गई। आखिर में गीता ने गुस्से में कहा, “आप क्या चाहते हैं? कि मैं वहीदा रहमान से भी बदतर दिखूं।” यह सुनते ही सेट पर सन्नाटा छा गया। शूटिंग रद्द कर दी गई और कुछ समय बाद फिल्म भी बंद कर दी गई। इसके बाद गुरु दत्त मुंबई लौट आए और ‘कागज के फूल’ पर काम शुरू कर दिया।

शराब की लत ने गीता के करियर को नुकसान पहुंचाया

आने वाले वर्षों में गुरु दत्त के करियर को भी कुछ झटके लगे, लेकिन गीता का करियर और तेजी से नीचे जाने लगा। कभी वह इंडस्ट्री की सबसे बड़ी गायिकाओं में थीं, लेकिन अब उन्हें बहुत कम गाने मिल रहे थे। वह गुरु दत्त की फिल्मों के बाहर भी काम पाने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन शराब की लत उनकी छवि को नुकसान पहुंचाने लगी थी।

गुरु दत्त की बहन ललिता लाजमी ने यासिर उस्मान से कहा था, “धीरे-धीरे गीता के शराब की लत की बातें सुनाई देने लगीं। हालांकि मैंने उन्हें कभी खुलेआम शराब पीते नहीं देखा। शुरुआत नींद की गोलियों से हुई थी और बाद में कुछ दूसरी दवाओं तक बात पहुंच गई।”

रिश्ता फिर जुड़ा, लेकिन ज्यादा समय तक नहीं

दूसरी तरफ गुरु दत्त अपने जीवन की भावनात्मक उथल-पुथल से थक चुके थे। उन्होंने अपनी शादी को एक और मौका देने का फैसला किया और वहीदा से दूरी बना ली। इसके बाद गुरु दत्त और गीता फिर साथ आए और दूसरी बार हनीमून मनाने श्रीनगर गए। कुछ समय बाद उनकी बेटी नीना का जन्म हुआ। लेकिन रिश्ते में आई यह नई शुरुआत ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी।

1963 तक गुरु दत्त, गीता और उनके दो बेटे पाली हिल वाले अपने बंगले को छोड़ चुके थे। गीता का मानना था कि यह घर उनके वैवाहिक जीवन के लिए अशुभ साबित हो रहा है। परिवार कुछ समय के लिए दूसरे फ्लैट में रहने लगा, लेकिन जल्द ही गुरु दत्त अलग रहने लगे। गुरु दत्त के भाई आत्माराम ने नसरीन मुन्नी कबीर से बातचीत में कहा था कि गुरु दत्त शायद सामान्य शादीशुदा जीवन के लिए बने ही नहीं थे।

उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि वह सामान्य वैवाहिक जीवन जीने के लिए बने थे। शायद उन्हें ऐसे जीना चाहिए था जैसे फ्रांस में लोग रहते हैं, जहां दो लोग साथ रहते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि शादीशुदा हों। लेकिन गुरु दत्त परंपराओं से भी जुड़े हुए थे।

यह सिर्फ बेवफाई का मामला नहीं था, बात उससे कहीं ज्यादा जटिल थी। उन्हें परिवार या समाज के प्रति ज्यादा जिम्मेदारी महसूस नहीं होती थी। वह पार्टियों और पारिवारिक समारोहों से दूर रहते थे। गीता मिलनसार स्वभाव की थीं, इसलिए उनके लिए यह सब बहुत मुश्किल था।

20 और 30 की उम्र में गुरु दत्त दिन-रात काम करते थे। अगर उनका कहीं जाने का मन होता, तो वह स्टूडियो से सीधे कार लेकर लोनावला निकल जाते और किसी को बताते भी नहीं थे। इससे कई गलतफहमियां पैदा होती थीं। गीता बहुत अच्छी और बेहद प्रतिभाशाली थीं, लेकिन बौद्धिक स्तर पर दोनों एक-दूसरे से मेल नहीं खाते थे।”

गुरु दत्त की मौत के बाद टूट गई थीं गीता

वैवाहिक समस्याओं के बावजूद गीता के मन में गुरु दत्त के लिए प्यार आखिर तक बना रहा। उनके बेटे अरुण ने बताया था कि 1964 में गुरु दत्त की मौत के बाद गीता को नर्वस ब्रेकडाउन हो गया था। कई महीनों तक वह किसी को पहचान भी नहीं पाती थीं। गुरु दत्त के निधन के लगभग आठ साल बाद, 1972 में गीता दत्त की भी मौत हो गई।

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