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अलविदा ओमः सामान्य सूरत से बनी एक बड़ी मूरत

सौंदर्य और संगीत को प्रधानता देने वाले बॉलीवुड में ओम पुरी जैसे सामान्य चेहरे मोहरे वाले कलाकार के लिए कितनी जगह हो सकती थी? अपनी फिल्म की हर फ्रेम को सुंदर बनाने के लिए जमीन-आसमान एक कर देने वाले फिल्मकारों ने ओम पुरी की जमकर उपेक्षा की।

जानेमाने अभिनेता ओम पुरी का शुक्रवार (6 जनवरी) शाम यहां अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस मौके पर सिनेमा जगत की कई हस्तियां मौजूद थीं। उनका सुबह दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था। वह 66 साल के थे। मुंबई के ओशीवरा श्मशान स्थल पर शुक्रवार शाम 6.45 बजे उनके अंतिम संस्कार की रस्में शुरू हुईं और उनके बेटे इशान ने मुखाग्नि दी।

सौंदर्य और संगीत को प्रधानता देने वाले बॉलीवुड में ओम पुरी जैसे सामान्य चेहरे मोहरे वाले कलाकार के लिए कितनी जगह हो सकती थी? अपनी फिल्म की हर फ्रेम को सुंदर बनाने के लिए जमीन-आसमान एक कर देने वाले फिल्मकारों ने ओम पुरी की जमकर उपेक्षा की। बावजूद इसके पुरी ने बॉलीवुड के साथ ही हॉलीवुड में भी अपनी जगह निकाल ही ली थी।
इसकी वजह भी थी। सन 1969 में मृणाल सेन की फिल्म ‘भुवन शोम’ ने हिंदी सिनेमा के लिए नई जमीन तोड़ने का काम किया था। इसी से हिंदी फिल्मों में समांतर सिनेमा की शुरुआत मानी जाती है। बाद में समांतर सिनेमा आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम जिन कलाकारों के जरिये हुआ उनमें अमरीश पुरी, ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, स्मिता पाटील और शबाना आजमी के नाम खासतौर से उल्लेखनीय कहे जा सकते हैं। ओम पुरी में ऐसा क्या था, जिसके बल पर फिल्मों की दुनिया में उन्हें काम मिलता?उनके आगमन से पहले चॉकलेटी चेहरे वाले राजेश खन्ना का दौर था, जो उतार पर था। इसी दौर में अमिताभ बच्चन उभर रहे थे। पुरी ना तो रोमांटिक फिल्मों के लिए फिट थे, ना एक्शन फिल्मों के लिए। साधारण से चेहरे मोहरे वाले पुणे के टीवी और फिल्म संस्थान के साथ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित इस अभिनेता के लिए अपना कैरियर बनाना काफी मुश्किल काम था।

समांतर सिनेमा आंदोलन ने ओम पुरी और उनके जैसे कई कलाकारों के लिए रास्ता खोल दिया था।चिकने-चुपड़े चेहरे वाले हीरो के दबदबे में समांतर सिनेमा आंदोलन के जरिए सेंध लग चुकी थी। चेहरा बेमानी हो रहा था और प्रतिभा के लिए जगह बन रही थी। ओम पुरी की अभिनय प्रतिभा का श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी, कुंदन शाह जैसे फिल्मकारों ने जमकर इस्तेमाल किया। ‘घासीराम कोतवाल’, ‘गोधूलि’, ‘भूमिका’ जैसी फिल्मों के बाद 1980 में आई फिल्म ‘आक्रोश’ ने सही मानो में ओम पुरी का संघर्ष कम कर दिया था। ओम पुरी की प्रमुख भूमिका वाली इस फिल्म ने समीक्षकों को चौंका दिया था। फिल्म में ओम पुरी के पास संवाद लगभग नहीं थे। उनके पास कुछ था तो एक आदिवासी, लहान्या, की पीड़ा थी। पत्नी के साथ अत्याचार, ताकतवर लोगों के अन्याय और क्रूर व्यवस्था के सामने खुद को असहाय पाने से पैदा हुए आक्रोश को ओम पुरी ने जिस तरह से खूबी से अभिव्यक्त किया था, वह अद््भुत था। इसने कई फिल्मकारों का ध्यान आकर्षित किया था। बाद में निहलानी ने ‘अर्धसत्य’ से लेकर ‘देव’ और धारावाहिक ‘तमस’ में ओम पुरी से बेहतरीन काम करवाया।
समांतर सिनेमा आंदोलन ने ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह समेत कई ऐसे कलाकारों को जमीन दी, जो परंपरागत फॉर्मूला फिल्मों के लिए चिकने चुपड़े नहीं मगर प्रतिभाशाली थे। सौंदर्य और संगीत को सिनेमा समझने वाले सुभाष घई या यश चोपड़ा जैसे फिल्मकारों की फिल्मों के लिए चाहे पुरी फिट ना थे, मगर दूसरे फिल्मकारों को पुरी में अपनी फिल्मों के किरदार नजर आ रहे थे। लिहाजा, समय के साथ ओम और नसीर दोनों ने ही अपना मकाम बना लिया। दोनों में नसीर को कमर्शियल सिनेमा में कहीं ज्यादा सफलता मिल रही थी। ‘हम पांच’, ‘मासूम’, ‘त्रिदेव’, ‘मोहरा’, ‘विश्वात्मा’ के बाद तो लग रहा था कि ओम पुरी कहीं पीछे छूट गए हैं और नसीर आगे बढ़ गए। दोनों की व्यावसायिक स्पर्धा पर जब तब छिटपुट लेख भी उन दिनों छपने लगे थे।

मगर खरगोश और कछुए की कहानी की तरह धीरे धीरे चलते हुए घर में कछुए पालने का शौक रखने वाले ओम पुरी ने नसीर को पीछे छोड़ दिया। 1991 में एन चंद्रा की फिल्म ‘नरसिम्हा’ में पुरी को बापजी के किरदार में द्रविड़ मुनेत्र कषगम प्रमुख करुणानिधि का गेटअप देकर पेश किया गया। इस फिल्म ने पुरी के लिए कमर्शियल फिल्मों के दरवाजे और डॉमनिक लॉपियरे के उपन्यास ‘सिटी आॅफ जॉय’ पर बनी इसी नाम की फिल्म ने पुरी के लिए अंग्रेजी फिल्मों के दरवाजे खोल दिए। 1994 में ‘वूल्फ’, 96 में ‘द घोस्ट एंड द डार्कनेस’ 97 ‘माय सन द फैनेटिक’, 98 में ‘सच ए लॉन्ग जर्नी’, 99 में ‘ईस्ट इज ईस्ट’ से लेकर आगामी फिल्म ‘वाइसरॉय हाउस’ तक लगातार ओम पुरी को ब्रिटिश, अमेरिकी अंग्रेजी फिल्में मिलती रहीं। कछुआ प्रेमी पुरी देश-विदेश में समान रूप व्यस्त हो चुके थे। श्याम बेनेगल के धारावाहिक ‘भारत एक खोज’ में दर्जनों किरदार निभाने वाले ओम पुरी ने खुद को चरित्र भूमिकाओं के साथ हास्य भूमिकाओं में भी साबित किया। ‘जाने भी दो यारो’, ‘चाची 420’, ‘मालामाल वीकली’, ‘सिंह इज किंग’, ‘मेरे बाप पहले आप’, ‘हेराफेरी’ जैसी कई फिल्मों में ओम पुरी ने साबित किया कि वह हास्य भूमिकाएं भी बखूबी कर सकते हैं। उनके हास्य धारावाहिक ‘कक्काजी कहिन’ को भी अच्छी लोकप्रियता मिली थी। 1991 में अभिनेता अन्नू कपूर की बहन सीमा कपूर से पुरी की शादी ज्यादा समय तक नहीं चल पाई। 1993 में उन्होंने पत्रकार नंदिता पुरी से शादी की। नंदिता ने ओम की जीवनी ‘अनलाइकली हीरो’ में ओम के जीवन के निजी प्रसंगों को सार्वजनिक कर बताया कि ओम के बहुत कम उम्र में महिलाओं से संबंध रहे हैं। पुरी को इससे बहुत चोट लगी। इसके साथ ही नंदिता-ओम के संबंधों में दरार आने लगी। नंदिता ने ओम के खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला दर्ज करवा दिया और फिर दोनों में अलगाव हो गया। शहीद सैनिकों को लेकर पुरी की टिप्पणी से जब देश भर में हंगामा मचा तो उन्होंने इसका प्रायश्चित भी किया और सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने में जरा भी संकोच नहीं किया।

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