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हमारी याद आएगीः रविंद्र जैन का नीम रोशनी में पला संगीत

बड़ा होकर यही बच्चा रवींद्र जैन के नाम से मुंबई फिल्मजगत तक पहुंचा और उसकी विलक्षण प्रतिभा से न सिर्फ फिल्मों को सुरीलापन मिला बल्कि ‘रामायण’ जैसे धारावाहिक ने उसे घर-घर पहुंचाया। जैन के कैरियर में ताराचंद बड़जात्या की राजश्री प्रोडक्शन और राज कपूर की आरके फिल्म्स का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

एक ओर ‘रामायण’ से रवींद्र जैन घर-घर तक पहुंचे, तो दूसरी ओर राजश्री की ‘सौदागर’, ‘अंखियों के झरोखों से’, ‘गीत गाता चल’, ‘नदिया के पार’ जैसी सामाजिक, पारिवारिक फिल्मों के उनके गाने खूब चले।

एक ओर ‘रामायण’ से रवींद्र जैन घर-घर तक पहुंचे, तो दूसरी ओर राजश्री की ‘सौदागर’, ‘अंखियों के झरोखों से’, ‘गीत गाता चल’, ‘नदिया के पार’ जैसी सामाजिक, पारिवारिक फिल्मों के उनके गाने खूब चले। गीतकार, गायक और संगीतकार के रूप में रवींद्र जैन ने हिंदी सिनेमा में उल्लेखनीय काम किया। आज रवींद्र जैन की 76वीं जयंती है।

सन 1944 की 28 फरवरी को अलीगढ़ के पंडित इंद्रमणि जैन के यहां पैदा बच्चा रोया तो मगर उसने आंखें नहीं खोली। डॉक्टर आया। शल्यक्रिया से पलकें खोल दीं। चेतावनी दी कि तेज रोशनी और पढ़ने के तनाव से बच्चे को बचाएं। तो हुआ यह कि पांच जमात पढ़ने के बाद बच्चे को पढ़ने-लिखने से दूर कर दिया। पिता ने हारमोनियम पकड़ा दी। सोचा आंखों पर दबाव नहीं पड़ेगा, संगीत से मानसिक शांति मिलेगी। इस तरह अलीगढ़ के मंदिरों के भजन, साहित्यिक रुचि वाले भाई की सोहबत के साथ बच्चे की नीम रोशन आंखों में शब्द और संगीत पलने लगा।

बड़ा होकर यही बच्चा रवींद्र जैन के नाम से मुंबई फिल्मजगत तक पहुंचा और उसकी विलक्षण प्रतिभा से न सिर्फ फिल्मों को सुरीलापन मिला बल्कि ‘रामायण’ जैसे धारावाहिक ने उसे घर-घर पहुंचाया। जैन के कैरियर में ताराचंद बड़जात्या की राजश्री प्रोडक्शन और राज कपूर की आरके फिल्म्स का महत्वपूर्ण योगदान रहा। किस्सा मशहूर है कि दिल्ली की एक बैठक में जब जैन ने बंद आंखों से ‘एक राधा एक मीरा…’ गाया, तो राज कपूर ने गाना खत्म होते ही जैन से पूछा, यह गाना किसी को दिया तो नहीं। इसे मैं इस्तेमाल करूंगा। मेरी अगली फिल्म का संगीत तुम दोगे। कपूर ने तुरंत सवा रुपया रवींद्र जैन को देकर यह गाना बुक कर लिया था।

1971 की ‘मेरा नाम जोकर’ में कैरियर का सबसे बड़ा दांव हारने के बाद राज कपूर अस्त्र-शस्त्र विहीन हो गए थे। बड़ा आर्थिक नुकसान झेला था। मगर शोमैन ने फिर एक और दांव खेला ‘बॉबी’ (1973) के रूप में। नया हीरो (ऋषि कपूर), नई हीरोइन (डिंपल कापड़िया), नए गायक (नरेंद्र चंचल, शैलेंद्र सिंह)। न शैलेंद्र-हसरत, न मुकेश, न शंकर-जयकिशन। जयकिशन का निधन हो चुका था। आरके में आए लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने ‘बॉबी’ अपने संगीत के दम पर निकाली थी, सो राज ने 1978 में ‘सत्यं शिवं सुंदरम’ और 1982 में ‘प्रेम रोग’ उन्हें ही सौंपी और निराश नहीं हुए। बावजूद इसके लक्ष्मी-प्यारे को भूल पहाड़ों के हुस्न और संगीत में डूबे राज कपूर रवींद्र जैन को ‘राम तेरी गंगा मैली’ में लाए। इसने डायमंड जुबिली मनाई और बोनस में राज ने रवींद्र जैन को अगली फिल्म ‘हिना’ दी। ‘हिना’ की तैयारी के लिए महीने भर कश्मीर घुमाया। लोणी के फॉर्म हाउस में अपने हाथों से बना बैगन का भुर्ता भी खिलाया। बावजूद इसके कि जैन होने के कारण दादू बैगन नहीं खाते थे।

लक्ष्मीकांत की मेंडोलिन और प्यारेलाल की वायलिन ने सिंफनियों को अपने अंदाज में ढाला तो फिल्मजगत उनका दीवाना हो गया। वे चोटी के संगीतकार थे। उन्हें सरका कर कपूर कैम्प में घुसना आसान नहीं था। जैन ने यह किया और इससे पहले भी कर चुके थे 1964 में। राजश्री प्रोडक्शन ने नए कलाकारों को लेकर ‘दोस्ती’ शुरू की थी। कोई संगीत देने को राजी नहीं था। तब लक्ष्मी-प्यारे ने ‘राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताती है…’ और ‘चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे…’ जैसे गानों से ‘दोस्ती’ हिट करवा कर राजश्री को फिल्मजगत में जमा दिया। राजश्री के साथ लक्ष्मी-प्यारे ने ‘तकदीर’ (1967), ‘जीवन मृत्यु’ (1969) ‘उपहार’ (1970),‘पिया का घर’ (1971) जैसी सुरीली फिल्में की। बावजूद इसके राजश्री के सेठजी ने 1973 में ‘सौदागर’ से रवींद्र जैन को मौका दिया, जो राजश्री में 35 सालों तक जमे रहे। इस तरह लक्ष्मीकांत की मेंडोलिन और प्यारेलाल की वायलिन के सुरों पर नीम रोशन आंखों में पले रवींद्र जैन के सुर भारी पडे़ थे।

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