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हमारी याद आएगीः और देश भर में गूंज उठी गौहर की आवाज

हिंदुस्तान के गायकों के गाने रिकॉर्ड कर उसका कारोबार करने के लिए ब्रिटिश कंपनी ग्रामोफोन रिकॉर्ड (एचएमवी) ने 1900 के आसपास भारत में दफ्तर खोला। कंपनी के हिंदुस्तानी एजंट विलियम गाइजबर्ग ने एक पुलिस सुपरिंटेंडेंट की मदद ली और राज दरबारों, जमींदारों की बैठकों, थियेटर कंपनियों में गायकों की तलाश शुरू कर दी थी। आखिर में उन्होंने चुना मशहूर गायिका गौहर जान (एंजेलिना योवर्ड) को। दो नवंबर, 1902 में गौहर जान के गाने की रिकॉर्डिंग हुई कलकत्ता में। यह भारत में किसी गाने की पहली रिकॉर्डिंग थी। तीन मिनट के गाने के लिए गौहर जान को तीन हजार रुपए मिले। इसी के साथ संगीत का कारोबार भारत में शुरू हो गया।

Gauhar jaan, Gauhar jaan song,गौहर जान नामी तवायफ थीं। तब मशहूर तवायफें जिस्मानी पेशा नहीं करती थीं।

बीसवीं सदी की शुरुआत में भारत में शास्त्रीय संगीत गायक-गायिकाओं के गाने रिकॉर्ड होकर बिकने लगे थे। इससे शास्त्रीय संगीत को राज दरबारों, जमींदारों और क्षत्रपों की बैठक से निकाल कर जनसामान्य तक पहुंचाने में बड़ी मदद मिली। 1902 में गौहर जान के बाद 1908 में जौहराबाई आगरेवाली से संगीत कंपनी ने साल में पच्चीस गानों का अनुबंध किया ढाई हजार में। पुणे की सुंदराबाई के 180 गाने रिकॉर्ड हुए। इलाहाबाद की जानकीबाई की आवाज के तो लोग दीवाने थे। कुबूलसूरत न होने के कारण वह परदे में रहकर गाती थीं। रीवा के महाराज ने उनकी आवाज पर मुग्ध हो परदा हटाने का निर्देश दे दिया था। जानकीबाई और गौहर जान ने 1911 में दिल्ली दरबार में जार्ज पंचम की ताजपोशी के लिए रखे कार्यक्रम में साथ गाया था। अंगरक्षकों के चलनेवाली जानकीबाई के ग्रामोफोन कंपनी ने 180 गाने रिकॉर्ड किए। इस तरह भारत में संगीत का कारोबार चल निकला, जो 2018 में एक हजार करोड़ रुपए से ऊपर पहुंच गया था। पहली रिकॉर्डिंग के बाद गौहर जान खूब मशहूर हो गईं और उन पर दौलत की बरसात होने लगी थी। इतना नाम हुआ कि गौहर की फोटो माचिस तक पर छपीं।

गौहर जान नामी तवायफ थीं। तब मशहूर तवायफें जिस्मानी पेशा नहीं करती थीं। उनकी शान थी, सम्मान था। राज दरबारों में उन्हें सम्मानजनक पद पर रखा जाता था। एक बार दतिया में कार्यक्रम देने के लिए उन्होंने अपने लिए पूरी ट्रेन की मांग की थी। अंग्रेजी, अरबी, फारसी, बंगाली समेत दस भाषाओं मेें लिख-पढ़ और गाने वाली गौहर जान के 600 गाने रिकॉर्ड हुए।

मंझौले कद की, बोलती आंखों वाली गौहर बहुत खूबसूरत थीं। 1887 में दरभंगा महाराज के दरबार में पहली बार कार्यक्रम पेश करने वाली गौहर जान पर जब दौलत बरसी तो शाहखर्ची बढ़ने लगी, जिसके कई किस्से मशहूर हुए। गौहर जान को रेस खेलने का शौक लगा तो वह मुंबई रेसकोर्स में जाकर घोड़ों पर दांव लगाने लगीं। उन्होंने अपनी पालतू बिल्ली की शादी में 12 हजार रुपए खर्च डाले और जब उस बिल्ली के बच्चे हुए तो 20 हजार की दावत दी थी।

अपने हर गाने की रिकॉर्डिंग पर गौहर खूब बन-संवर कर आती थीं। उन्होंने किसी भी गाने की रिकॉर्डिंग में न तो अपना पहनावा दोहराया, न अपने आभूषण। गौहर की जिंदगी में तीन मर्द आए। जमींदार निमाई सेन, तबलावादक सैयद गुलाम अब्बास और एक गुजराती अमृत वागल नायक। निमाई सेन और अमृत वागल से ज्यादा समय का साथ नहीं रहा, मगर गुलाम अब्बास से उन्होंने निकाह किया। अब्बास और गौहर जान की बनी नहीं और अब्बास ने उन पर ढेरों मुकदमे कर दिए। नतीजा यह हुआ कि गौहर जान ने जो कुछ भी कमाया था, वकीलों की महंगी फीस चुकाने में स्वाहा हो गया। मुफलिसी की हद तक आई गौहर को अगस्त 1928 में मैसुरु के महाराजा कृष्ण राज वाडियार ने सहारा दिया। 1930 में गौहर जान का निधन हो गया।

 

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