हिंदी सिनेमा के इतिहास में अगर किसी विलेन ने हीरो से ज्यादा सुर्खियां बटोरीं, तो वो थे अमजद खान। साल 1975 में रिलीज हुई ‘शोले’ में उनका निभाया गब्बर सिंह लोगों के दिल और दिमाग में बस गया। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जिस भारी, कर्कश और अनगढ़ आवाज ने गब्बर को अमर बनाया, उसी आवाज को शुरुआत में फिल्म के लेखक ने खारिज कर दिया था।

‘शोले’ की कहानी लिखने वाली मशहूर जोड़ी सलीम खान और जावेद अख्तर ने गब्बर को बेहद खौफनाक और प्रभावशाली अंदाज में कागज पर गढ़ा था। बताया जाता है कि शुरुआती स्क्रीन टेस्ट के दौरान अमजद खान की आवाज सुनकर उन्हें लगा था कि ये आवाद किरदार के लिए सही नहीं रहेगी। उन दोनों को अमजद खान की आवाज उनकी आवाज पतली और थोड़ी नाक से निकलती हुई महसूस हुई, जो एक विलेन की भारी-भरकम टोन से अलग थी। लेकिन निर्देशक रमेश सिप्पी ने उनकी आवाज को पहचाना और उन्हें मौका दिया कि वो अपने डायलॉग, ठहराव और पर्सनालिटी पर काम करें और फिर यहीं से शुरुआत हुई गब्बर के किरदार की।

ऐसे किया था खुद को तैयार

अमजद खान ने गब्बर की आवाज को सिर्फ ऊंचा या भारी बनाने की कोशिश नहीं की, बल्कि उसमें एक अजीब-सी ठंडी क्रूरता जोड़ी। “कितने आदमी थे?”, “अरे ओ सांभा…” और “जो डर गया, समझो मर गया” जैसे डायलॉग में उनका ठहराव, शब्दों को चबाकर बोलने का अंदाज और अचानक तेज हंसी इन सबने गब्बर को खौफनाक और यादगार बना दिया।

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जिस वजह से सलीम-जावेद की जोड़ी ने उन्हें रिजेक्ट किया था वो ही आवाज गब्बर की पहचान बन गई। अगर उनकी आवाज बाकियों जैसी होती तो शायद किरदार भी भीड़ में खो जाता। अमजद खान ने साबित किया कि अभिनय सिर्फ आवाज के भारीपन से नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल की कला है।

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जब विलेन बन गया हीरो से बड़ा

‘शोले’ में जहां अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र जैसे सितारे थे, वहीं गब्बर का असर इतना गहरा पड़ा कि फिल्म का सबसे चर्चित चेहरा वही बन गए। बच्चों से लेकर बड़ों तक, गब्बर के डायलॉग रोजमर्रा की भाषा का हिस्सा बन गए। यहां तक कि दशकों बाद भी गब्बर की हंसी और अंदाज की नकल की जाती है।

यादगार बनी अमजद खान की आवाज

कम ही लोग जानते हैं कि अमजद खान को यह भूमिका बड़ी मुश्किल से मिली थी। फिल्म की शुरुआत में दूसरे नामों पर भी विचार हुआ था। लेकिन किस्मत ने साथ दिया और एक ऐसे अभिनेता को मंच मिला, जिसकी आवाज को पहले कमजोरी समझा गया था। वही आवाज बाद में हिंदी सिनेमा की सबसे डरावनी और लोकप्रिय आवाजों में गिनी जाने लगी।

‘शोले’ बनी टर्निंग प्वाइंट

‘शोले’ से अमजद खान ने अपने करियर में नई ऊंचाइयां हासिल कीं, इस फिल्म ने उनको ना केवल प्रोफेशनल लेवल पर मदद की, बल्कि इससे पर्सनल लाइफ में भी काफी सहायता मिली। रमेश सिप्पी की इस फिल्म को साइन करने से ठीक पहले अमजद खान बुरे दौर से गुजर रहे थे, उनके पास बेटे के जन्म के वक्त अस्पताल का बिल भरने के पैसे तक नहीं थे। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…