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ऊंची जाति किस तरह करती है महिलाओं का शोषण उसे दिखती है जीवी अय्यर की फिल्म इष्टि

जी प्रभु ने जिस साहस और कलात्मकता के साथ फिल्म बनाई है वह काबिले-तारीफ है।
Author November 24, 2016 08:13 am
इष्टि ।

भारतीय पैनोरामा की उद्घाटन फिल्म ‘इष्टि:’ इन दिनों कई कारणों से चर्चा में है। संस्कृत भाषा मे बनी यह चौथी फिल्म है। जीवी अय्यर ने सबसे पहले 1983 मे पहली संस्कृत फिल्म बनाई थी। उन्होंने ही 1993 में दूसरी संस्कृत फिल्म भगवद्गीता बनाई। इसके 22 साल बाद विनोद मतकरी ने 2015 में तीसरी संस्कृत फिल्म प्रियवासनम बनाई, जिसे केरल अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के आयोजकों ने फिल्म पर जान-बूझकर हिंदुत्व का प्रचार करने का आरोप लगाकर दिखाने से मना कर दिया था, जबकि प्रियवासनम को पिछले साल भारत के 46वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह गोवा में भारतीय पैनोरामा की उद्घाटन फिल्म बनाया गया था। अचरज होता है कि ये चारों संस्कृत फिल्में केरल में ही बनी हैं। तीन फिल्में तो प्राचीन हिंदू परंपरा के बारे में सकारात्मक नजरिए से बनाई गई हैं, लेकिन चौथी फिल्म इष्टि: आज के समय की बात करती हुई परंपरा का आलोचनात्मक दृश्य रचती है। यह पहली संस्कृत फिल्म है जो आज के सामाजिक सवालों से टकराती है। फिल्म का स्त्रीवादी नजरिया उसे और महत्त्वपूर्ण बना देता है। इसके लेखक-निर्देशक-प्रोड्यूसर जी प्रभु चेन्नै के लोयला कॉलेज में संस्कृत पढ़ाते हैं।

केरल के नंबूदरी ब्राह्मण समुदाय के पुरुष दूसरे समुदाय की स्त्रियों से सहवास कर सकते हैं, पर किसी भी जिम्मेदारी से इनकार करते है। इस कुप्रथा की शिकार स्त्रियों के पास सदियों से कोई विकल्प नहीं था। नंबूदरियों की नई पीढ़ी ने इस प्रथा का विरोध किया। फिल्म का ढांचा रंगमंचीय और यथार्थवादी है। कम से कम प्रापर्टी का इस्तेमाल किया गया है। पारंपरिक परिधान जिसमें सफेद साड़ी-धोती , सहज अभिनय पुराने मकान, हवन-पूजा पद्धतियां, सतत जलती हुई हवि की आग, मशाल और सूरज की रोशनी , निरीह चेहरे-सब कुछ स्वाभाविक लगता है। कोई स्पेशल इफेक्ट नहीं, न कोई शोर, चीख पुकार, बस मद्धिम पार्श्व संगीत और कम से कम संवाद दृश्यों को दिल तक पहुंचाते हैं।

रामाविक्रमन नंबूदरी 71 साल की उम्र में घर में दो-दो पत्नियों के होते हुए भी दहेज के लालच में 17 साल की श्रीदेवी से तीसरा विवाह करते है। वे सोमयाजी हैं और उनकी इच्छा है कि वे ऐसा अनुष्ठान करें कि हवन कुंड की आग कभी न बुझे और इसी पवित्र आग से उनका अंतिम संस्कार हो। इस धार्मिक अनुष्ठान में स्त्रियों का कोई हिस्सा नहीं है। यहां तक कि उनका प्रवेश भी वर्जित है। नंबूदरी ब्राह्मण समुदाय में घर के मुखिया के पास ही सारी संपत्ति, सारे अधिकार होते हैं। वे पढ़ाई-लिखाई को धर्म विरोधी मानते हैं। उनके बच्चे रट्टा मारकर वेद मंत्रों का पाठ तो कर सकते हैं, पर लिख- पढ़ नहीं सकते। 17 साल की पत्नी और 71 साल के पति की सुहागरात की कल्पना सहज ही की जा सकती है। रामाविक्रमन का छोटा भाई नारायणन हर रात नीची जाति की स्त्रियों के पास जाता है और कभी-कभी बूढ़े नंबूदरियों की जवान पत्नियों को भी संतुष्ट करता है। उन्हीं स्त्रियों में से एक से जन्मा नारायणन का बच्चा इलाज न करा पाने से मर जाता है क्योंकि रामाविक्रमन उसे यह कहते हुए पैसे देने से मना कर देता है कि नीच जाति की औरतों से जन्मे बच्चों की जिम्मेदारी नंबूदरियों की नहीं है। बेटे की मृत्यु के गहरे दुख और उसकी मां के साथ हुए अन्याय से आहत नारायणन अपना जनेऊ जलाते हुए कहता है-कुत्ते या बिल्ली के रूप मे जनम लेना अच्छा है, पर नंबूदरी ब्राह्मण समुदाय में जन्म नहीं लेना चाहिए।

रामाविक्रमन का जवान बेटा रामन नंबूदरी उस समय विद्रोह कर देता है जब उसकी बहन लछमी की शादी एक 73 साल के बूढ़े नंबूदरी ब्राह्मण से होने वाली है जिसकी पहले से ही चार पत्नियां हैं। एक दृश्य में श्रीदेवी रामन और लछमी को सूप में बिछे चावल पर हाथ से अ आ इ ई लिखना सिखा रही है। उसके खिलाफ साजिश रची जाती है। यह अफवाह फैलाई जाती है कि श्रीदेवी और रामन में अनैतिक संबंध हैं। नंबूदरियों की पंचायत में उसका पति भी उसके खिलाफ हो जाता है। वह अपने बड़े बेटे को जाति बाहर कर घर से निकाल देता है। आहत श्रीदेवी सबके सामने मंगलसूत्र तोड़कर रामाविक्रमन के हाथ मे देते हुए कहती है-धर्म का पालन केवल वेद रटने से नहीं, मनुष्य बनने से होता है। अब मैं आजादी के साथ खुली हवा में सांस ले सकती हूं। वह घर से निकलते हुए अपने सिर से विवाहिता का प्रतीक सफेद चादर उतार फेंकती है और बंधे हुए केश ऐसे खोलती है जैसे मुक्ति का परचम लहरा रहा हो। अंतिम दृश्य में रामाविक्रमन जब हवन मंडप में जाता है तो कुंड की आग बुझ चुकी है।
जी प्रभु ने जिस साहस और कलात्मकता के साथ फिल्म बनाई है वह काबिले-तारीफ है। संस्कृत भाषा में ऐसी फिल्म बनाने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। फिल्म का एक-एक फ्रेम किसी सुंदर पेंटिंग की तरह लगता है। कावलम नारायण पणिक्कर की मंडली के कलाकार नेदुमणि वेणु ने प्रमुख नंबूदरी रामाविक्रमन की भूमिका को अविस्मरणीय बना दिया है। संस्कृत सिनेमा के इतिहास मे इष्टि: को हमेशा याद रखा जाएगा।

 

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