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सबरंग,बॉक्स ऑफिस: बॉलीवुड के पीछे दबे पांव आता हॉलीवुड

कोरोना संक्रमण के बाद सिनेमाघर आधी क्षमता के साथ खोलने का नियम लागू हुआ, तो कारोबार की हालत पतली हो गई।

Bollywoodकोरोना काल में सिनेमाघर आधी क्षमता के साथ चलने से कारोबार की हालत नाजुक।

आधे धंधे से पूरी लागत कैसे निकलेगी? सो कई महंगी फिल्मों के निर्माताओं ने अपनी फिल्मों का प्रदर्शन स्थगित कर दिया और रिलीज के लिए छोटे बजट की फिल्मों के साथ हॉलीवुड की डब फिल्में आगे आ गर्इं। हॉलीवुड की एक फिल्म ‘वंडर वुमन 1984’ ने भारत में बॉक्स आॅफिस पर एक हफ्ते में 11 करोड़ रुपए की कमाई की। इससे फिल्मकारों को उम्मीद की किरण नजर आ रही है कि दर्शक सिनेमाघरों में लौटेंगे और उनकी अटकी पड़ी फिल्में अपनी लागत निकाल लेंगी।

तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, बांग्ला और मराठी छोड़ दें तो ज्यादातर प्रादेशिक भाषाओं के सिनेमा को हिंदी फिल्मों ने हाशिए पर डाल रखा है। यही काम धीरे-धीरे ही सही हॉलीवुड की फिल्में हिंदी फिल्मों के लिए करती नजर आ रही हैं।

बीते कई सालों से हॉलीवुड की डब फिल्में देश में अच्छा कारोबार कर रही हैं। हालांकि भारतीय फिल्मों का कारोबार भी लगातार बढ़ रहा है। 80 साल पहले 1941 में ‘जिंदगी’ फिल्म ने बॉक्स आॅफिस पर 50 लाख का कारोबार कर फिल्म वालों को चौंका दिया था।

एक करोड़ का कारोबार करने वाली पहली फिल्म ‘किस्मत’ (1943) थी। कारोबार को दस करोड़ तक पहुंचने में 17 साल लगे जब ‘मुगले आजम’ (1960) रिलीज हुई। दस करोड़ से सौ करोड़ तक पहुंचने में 34 साल लगे जब 1994 में ‘हम आपके हैं कौन’ (129 करोड़) आई। किसी फिल्म का कारोबार 2009 में दो सौ करोड़ पर पहुंचा ‘3 ईडियट्स’ से। मल्टीप्लेक्स शुरू हो गए। मात्र चार साल, 2013, में ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ 301 करोड़ का कारोबार कर रही थी।

अगले साल ‘पीके’ 400 करोड़ को उलांघ गई, तो दो साल बाद ‘दंगल’ ने 500 करोड़ से ज्यादा का कारोबार किया। 2017 में बॉक्स आॅफिस पर ‘बाहुबली 2: द कन्क्लूजन’ ने 14 सौ करोड़ का कारोबार कर भारतीय सिनेमा में अभूतपूर्व छलांग लगाई।

हॉलीवुड की रफ्तार

मगर हॉलीवुड भी बॉलीवुड से पीछे नहीं है। वह दबे पांव बॉलीवुड के पीछे-पीछे चल रहा है। 1991 में हॉलीवुड फिल्म ‘प्रेटी वूमन’ ने भारतीय बॉक्स आॅफिस पर 50 लाख का कलेक्शन किया था। यानी 1941 की ‘जिंदगी’ 50 साल पहले इतना कारोबार कर चुकी थी।

मगर जो हॉलीवुड फिल्में भारतीय टिकट खिड़की पर पचास साल पीछे थीं उन्होंने आने वाले सालों में तेजी से अपनी पैठ बनाई। 50 लाख का कारोबार करने वाली हॉलीवुड फिल्में 16 सालों बाद 2007 की ‘स्पाइडर मैन 3’ (108 करोड़) से सौ करोड़ी क्लब में शामिल हो गई।

फिर 2015 में ‘जुरासिक वर्ल्ड’ (145 करोड़), 2016 में ‘द जंगल बुक’ (258 करोड़) 2019 में ‘द एवेंजर्स-एंडगेम’ (446 करोड़) जैसी फिल्मों ने साबित किया कि हॉलीवुड दबे पांव बॉलीवुड के एकदम पीछे आ खड़ा हुआ है और हॉलीवुड की फिल्मों का दर्शक वर्ग लगातार फूलता जा रहा है।

कोरोना ने खेल के नियम बदले

ऐसे में खेल के नियम बदल जाएं तो संभावना होती है कि पीछे रहने वाला आगे आ जाए। 2020 में आधी क्षमता के साथ थियेटरों को खोलने का नियम बनने के बाद चोटी के सितारों की महंगी फिल्मों के निर्माताओं ने अपनी फिल्मों का प्रदर्शन स्थगित कर दिया क्योंकि 50 फीसद सीटें खाली रखकर उनके लिए फिल्म की लागत निकालना भारी था।

हॉलीवुड और दक्षिण भारतीय फिल्मों को सिर्फ डबिंग और पब्लिसिटी खर्च पर बड़ा बाजार मिल रहा है। कुछेक लाख खर्च करके हॉलीवुड की फिल्मों को हिंदी, तमिल, तेलुगू, मलयालम, बंगाली, मराठी ही नहीं भोजपुरी तक में हॉलीवुड दिखा रहा है।

लागत कम होने से कम कारोबार में भी ऐसी फिल्में मुनाफा कमा लेती हैं। टीवी पर दक्षिण की डब फिल्मों की बाढ़ का यही कारण है। इस वजह से ही 25 दिसंबर 2020 को रिलीज हुई ‘वंडर वुमन 1984’ हफ्ते भर में 11 करोड़ का धंधा कर भी चर्चा पा रही हैं।

क्या करेंगे निर्माता

हर आपदा अवसर लेकर आती हैं। क्या हिंदी फिल्मों के निर्माता औने पौने दाम में अपनी फिल्में ओटीटी पर लेकर आएंगे। या वे बहुभाषी फिल्में बनाएंगे। मसलन हिंदी फिल्म को तमिल तेलुगू, कन्नड़, मराठी, गुजराती आदि भाषाओं में डब कर प्रादेशिक बाजार में बड़े पैमाने पर घुसेंगे।

भारतीय सिनेमा कारोबार की शुरुआत में, 1930-40 के दशक में, कलकत्ता के न्यू थियेटर्स से लेकर पुणे के प्रभात स्टूडियो तक बहुभाषी फिल्में बनाते रहे हैं। तो क्या फिल्मकार अपने अतीत से सीख कर कोरोना का मुकाबला करेंगे?

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